चैत्र नवरात्रि: ब्रह्मचारिणी पूजा
ब्रह्मचारिणी पूजा क्या है
चैत्र शुक्ल द्वितीया, यानी चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन, माँ ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। वे तप और संयम का रूप हैं, इसलिए व्रत रखने वाले आज के दिन को अपने संकल्प को मज़बूत करने का दिन मानते हैं।
कथा और स्वरूप
हिमालय की पुत्री पार्वती ने नारद जी की सलाह पर शिव को पाने के लिए हज़ारों वर्ष तप किया। पहले केवल फल-फूल, फिर बेलपत्र और आख़िर में पत्ते तक खाना छोड़ दिया, इसलिए उनका एक नाम अपर्णा पड़ा। इसी तपस्विनी रूप को ब्रह्मचारिणी कहते हैं, यानी ब्रह्म में आचरण करने वाली। माँ सफ़ेद वस्त्र पहने, नंगे पैर चलती हैं, दाएँ हाथ में जपमाला और बाएँ में कमंडल लिए।
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
चैत्र नवरात्रि में देवी धाम
दूसरे दिन तक देवी मंदिरों में भीड़ पूरे ज़ोर पर आ जाती है। मिर्ज़ापुर के विंध्याचल में माँ विंध्यवासिनी के दर्शन के लिए पूर्वांचल, बिहार और मध्य प्रदेश से लोग पैदल और गाड़ियों से पहुँचते हैं, और कई परिवार अष्टभुजा और काली खोह की त्रिकोण परिक्रमा भी करते हैं। जम्मू की वैष्णो देवी, हिमाचल की नैना देवी और ज्वाला जी में भी यही हाल रहता है। दर्शन के नियम और समय हर साल बदलते हैं, इसलिए निकलने से पहले मंदिर प्रबंधन की ताज़ा जानकारी देख लें। देवी स्थानों के बारे में 51 शक्तिपीठ में और पढ़ें।
आज क्या करें
- माँ को सफ़ेद फूल, चमेली या कमल चढ़ाएँ।
- भोग में चीनी या मिश्री चढ़ाने की परंपरा है; प्रसाद में मिश्री बाँटें।
- आज जपमाला से नवार्ण मंत्र या 'ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः' का जाप करना अच्छा माना जाता है।
- व्रत में सेंधा नमक, कुट्टू, साबूदाना और फल लें; पूरी सूची नवरात्रि व्रत में क्या खाएं में।
सभी नौ रूपों के भोग नवदुर्गा के नौ रूप में और नवरात्रि की नवमी राम नवमी पेज पर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
चैत्र नवरात्रि में ब्रह्मचारिणी पूजा कब है?
माँ ब्रह्मचारिणी को क्या भोग लगाएं?
माँ ब्रह्मचारिणी का नाम अपर्णा क्यों पड़ा?
चैत्र नवरात्रि में विंध्याचल कब जाएं?
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