अक्षय तृतीया पर क्या करें, क्या खरीदें

अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल तृतीया को आती है और माना जाता है कि इस दिन किए गए दान, जप और शुभ कार्य का फल कभी क्षय नहीं होता। इस दिन जल से भरा घड़ा, सत्तू, पंखा और छाता दान करने, सामर्थ्य के अनुसार सोना-चाँदी या नए बर्तन खरीदने और बिना मुहूर्त देखे विवाह जैसे शुभ काम करने की परंपरा है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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अक्षय तृतीया वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आती है, और राजस्थान, मालवा और गुजरात में इसे आखा तीज कहते हैं। इस दिन का सबसे बड़ा महत्व यह है कि पूरा दिन ही शुभ मुहूर्त माना जाता है, और मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, जप और अच्छा काम कभी "क्षय" नहीं होता। 2026 में अक्षय तृतीया 19 अप्रैल को थी और 2027 में 9 मई को है। पूजा का शुभ समय अक्षय तृतीया पृष्ठ पर देखें।

'अक्षय' का अर्थ

"क्षय" यानी घटना या नष्ट होना, और "अक्षय" यानी जो कभी न घटे। मत्स्य पुराण समेत कई पुराणों में कहा गया है कि इस तिथि पर किया गया स्नान, दान, जप, हवन और पितरों का तर्पण अक्षय फल देता है। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि शास्त्र "अक्षय" फल दान और पुण्य कर्म के लिए बताते हैं; सोना खरीदने की परंपरा बाद में लोक में जुड़ी। इसलिए अक्षय तृतीया का असली सार है देना, केवल ख़रीदना नहीं।

पौराणिक प्रसंग: परशुराम, गंगा, चार धाम

  • परशुराम जयंती: भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया को माना जाता है। कई सालों में परशुराम जयंती अक्षय तृतीया के दिन या उससे एक दिन पहले पड़ती है, क्योंकि उसमें प्रदोष काल की तृतीया देखी जाती है।
  • त्रेता युग का आरंभ: यह तिथि युगादि तिथियों में गिनी जाती है; मान्यता है कि इसी दिन त्रेता युग शुरू हुआ।
  • गंगा अवतरण: एक परंपरा के अनुसार इसी दिन माँ गंगा धरती पर आईं।
  • सुदामा और अक्षय पात्र: लोक कथाओं में कहा जाता है कि सुदामा इसी दिन द्वारका में श्रीकृष्ण से मिले थे, और वनवास में पांडवों को सूर्यदेव से मिला अक्षय पात्र भी इसी तिथि से जोड़ा जाता है।
  • चार धाम के कपाट: उत्तराखंड में गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट परंपरा से अक्षय तृतीया पर खुलते हैं, और केदारनाथ व बद्रीनाथ के कपाट इसके कुछ दिन आसपास खुलते हैं। केदारनाथ की तिथि महाशिवरात्रि पर और बद्रीनाथ की वसंत पंचमी पर घोषित होती है, और ये हर साल बदलती हैं। यात्रा की तैयारी के लिए चार धाम यात्रा गाइड देखें।
  • बांके बिहारी के चरण दर्शन: वृंदावन में साल भर बांके बिहारी जी के चरण वस्त्रों से ढके रहते हैं; केवल अक्षय तृतीया के दिन चरण दर्शन होते हैं और उन पर चंदन का लेप होता है। इसके बारे में बांके बिहारी मंदिर लेख में पढ़ें।

क्या दान करें

अक्षय तृतीया गर्मी की शुरुआत में आती है, इसलिए इस दिन के दान भी गर्मी से राहत देने वाले हैं। ये चीज़ें किसी ज़रूरतमंद, मंदिर या ब्राह्मण को दी जाती हैं:

  • जल से भरा मिट्टी का घड़ा (मटका), ऊपर से ढका हुआ, साथ में गुड़ या शक्कर
  • सत्तू, जौ, गुड़ और चना
  • खरबूजा, ककड़ी, आम जैसे मौसमी फल
  • हाथ का पंखा, छाता, चप्पल
  • सूती कपड़े, अनाज
  • प्याऊ लगाना या किसी प्याऊ में पानी के घड़े रखवाना
  • पक्षियों के लिए छत पर पानी का बर्तन और दाना

घर में पितरों के नाम एक घड़ा भरकर दान करने की परंपरा भी कई परिवारों में है। दान की मात्रा नहीं, भाव और ज़रूरतमंद तक पहुँचना मायने रखता है।

सोना-चाँदी और ख़रीदारी

पिछले कुछ दशकों में अक्षय तृतीया सोना ख़रीदने का दिन बन गई है, और ज्वेलरी की दुकानों पर इस दिन ख़ास भीड़ रहती है। सोना ख़रीदना शुभ माना जाता है, पर इसके लिए कर्ज़ लेना या बजट बिगाड़ना ठीक नहीं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार इनमें से कुछ भी ख़रीदें:

  • सोने या चाँदी का छोटा सिक्का, चाँदी की पायल या बिछिया
  • पीतल या ताँबे के नए बर्तन, पानी का नया मटका
  • मुट्ठी भर जौ, जिसे परंपरा में "सोने के समान" माना गया है
  • नई किताबें, बच्चों के लिए पढ़ाई का सामान
  • तुलसी या कोई फलदार पौधा
  • नया व्यापार, नया बही-खाता, या खेती के नए औज़ार

लोक में इस दिन उधार लेने-देने और झगड़े से बचने की बात कही जाती है, ताकि साल भर वही "अक्षय" न हो जाए। ख़रीदी गई चीज़ को पहले लक्ष्मी-नारायण के सामने रखकर पूजा करें, फिर उपयोग करें।

अबूझ मुहूर्त: विवाह

पंचांग में साल के साढ़े तीन मुहूर्त "अबूझ" या स्वयंसिद्ध माने जाते हैं, जिनमें शुभ काम के लिए अलग से मुहूर्त निकालने की ज़रूरत नहीं होती: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, अक्षय तृतीया, विजयादशमी, और आधा दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का। इसीलिए अक्षय तृतीया पर उत्तर भारत में सबसे ज़्यादा शादियाँ होती हैं, साथ ही गृह प्रवेश, मुंडन, सगाई और नए व्यापार की शुरुआत भी।

फिर भी एक बारीकी जान लें: जिस साल अक्षय तृतीया के आसपास गुरु या शुक्र अस्त हों, उस साल कई पंडित विवाह के लिए इस दिन को भी नहीं लेते। विवाह मुहूर्त कैसे निकाला जाता है, यह विवाह मुहूर्त कैसे निकालें लेख में समझाया गया है। दिन के चौघड़िया और राहुकाल आज के पंचांग में देखें।

घर पर अक्षय तृतीया की पूजा

  1. सुबह स्नान करें; हो सके तो पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
  2. लक्ष्मी-नारायण की तस्वीर पर पीले फूल, चंदन, अक्षत और तुलसी चढ़ाएँ।
  3. जौ या गेहूँ, सत्तू, गुड़ और ककड़ी-खरबूजे का भोग लगाएँ।
  4. "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करें या विष्णु सहस्रनाम पढ़ें।
  5. भरा हुआ घड़ा और सत्तू दान के लिए अलग रखें और दोपहर से पहले दे दें।

राजस्थान की आखा तीज

राजस्थान में आखा तीज केवल त्योहार नहीं, खेती के नए साल की शुरुआत है। किसान इस दिन हल और बैलों की पूजा करते हैं, और गाँवों में बुज़ुर्ग हवा की दिशा और शकुन देखकर आने वाली बारिश का अनुमान लगाते हैं। घरों में बाजरे या गेहूँ का खीचड़ा और इमली का शरबत (इमलाणी) बनता है। बीकानेर में आखा तीज शहर का स्थापना दिवस भी है, और उस दिन पूरा शहर छतों पर पतंग उड़ाता है। इस दिन सामूहिक विवाह सम्मेलन भी होते हैं। यह भी याद रखें कि बाल विवाह क़ानूनन अपराध है और इस दिन प्रशासन इस पर विशेष नज़र रखता है; शुभ दिन का सम्मान बच्चों के अधिकारों का सम्मान करके ही होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अक्षय तृतीया पर क्या खरीदना शुभ है?

सोना-चाँदी का सिक्का, पीतल-ताँबे के बर्तन, नया मटका, जौ, किताबें और पौधे ख़रीदना शुभ माना जाता है। अपनी सामर्थ्य से ज़्यादा या कर्ज़ लेकर ख़रीदारी न करें।

अक्षय तृतीया पर क्या दान करें?

जल से भरा घड़ा, सत्तू, जौ, गुड़, खरबूजा, पंखा, छाता, चप्पल और सूती कपड़े का दान इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है।

अक्षय तृतीया को अबूझ मुहूर्त क्यों कहते हैं?

यह साल के साढ़े तीन स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में से एक है, इसलिए विवाह, गृह प्रवेश या नए काम के लिए अलग से मुहूर्त निकालने की ज़रूरत नहीं मानी जाती।

अक्षय तृतीया कब आती है?

अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल तृतीया को आती है। 2026 में यह 19 अप्रैल को थी और 2027 में 9 मई को है।

आखा तीज क्या है?

राजस्थान, मालवा और गुजरात में अक्षय तृतीया को आखा तीज कहते हैं। राजस्थान में इस दिन किसान हल पूजन करते हैं और नए कृषि वर्ष की शुरुआत होती है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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