अक्षय तृतीया
अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। "अक्षय" का अर्थ है जो कभी क्षय न हो, इसलिए माना जाता है कि इस दिन किया गया दान, जप, स्नान और शुभ काम का फल कम नहीं होता। राजस्थान और मालवा में इसे आखा तीज कहते हैं।
क्या है और क्यों मनाते हैं
पुराणों में इस तिथि को युगादि तिथि कहा गया है, यानी त्रेता युग का आरंभ इसी दिन से जोड़ा जाता है। भगवान परशुराम का जन्म भी इसी तिथि पर माना जाता है, इसलिए कई घरों में परशुराम जयंती साथ में मनती है। बद्रीनाथ धाम के कपाट भी आम तौर पर इसी समय के आसपास खुलते हैं। सबसे बड़ी बात, इसे "अबूझ मुहूर्त" माना जाता है, यानी विवाह, गृह प्रवेश या नया काम शुरू करने के लिए अलग से मुहूर्त नहीं निकलवाना पड़ता।
किस तिथि को
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया। शुक्ल पक्ष होने से पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में महीना एक ही रहता है। जिस दिन सूर्योदय के बाद पूर्वाह्न में तृतीया रहे, वही दिन लिया जाता है; तिथि दो दिन छूए तो पंचांग में बताया गया दिन मानें। रोज़ की तिथि आज का पंचांग में देख सकते हैं।
कैसे मनाते हैं
- सुबह गंगा या घर पर स्नान करके भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की पूजा, तुलसी दल और जौ के साथ।
- जल से भरा मिट्टी का घड़ा, पंखा, सत्तू, गुड़, खरबूजा, छाता और चप्पल का दान, क्योंकि गर्मी का मौसम होता है।
- बहुत से परिवार सोना-चाँदी या नया बर्तन खरीदते हैं; यह परंपरा है, ज़रूरी नियम नहीं।
- राजस्थान में आखा तीज पर बड़ी संख्या में विवाह होते हैं और किसान नए कृषि वर्ष का शगुन देखते हैं।
क्या करें, क्या न करें, इसकी पूरी सूची अक्षय तृतीया पर क्या करें लेख में है। पूजा के बाद लक्ष्मी जी की आरती गाई जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अक्षय तृतीया किस तिथि को होती है?
अक्षय तृतीया पर किसकी पूजा करें?
क्या अक्षय तृतीया पर सोना खरीदना ज़रूरी है?
अक्षय तृतीया को अबूझ मुहूर्त क्यों कहते हैं?
आखा तीज और अक्षय तृतीया में क्या अंतर है?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
