2026

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी 2026

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मुख्य विवरण

दिल्ली के लिए

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी क्या है

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी के विघ्नराज रूप की पूजा होती है। उत्तर भारत में यह संकष्टी पितृ पक्ष के बीच में पड़ती है, इसलिए इस दिन घरों में एक साथ चतुर्थी का श्राद्ध और शाम को गणेश व्रत, दोनों होते हैं।

विघ्नराज रूप का अर्थ

विघ्नराज यानी विघ्नों के राजा। मान्यता है कि जो विघ्नों का स्वामी है, वही उन्हें हटा भी सकता है: गलत राह पर चलने वालों के आगे वे रुकावट डालते हैं और सच्चे भक्तों के रास्ते से रुकावट हटाते हैं। मुद्गल पुराण में विघ्नराज अवतार शेषनाग पर सवार होकर ममासुर, यानी "मेरा-मेरा" वाले मोह और आसक्ति, का नाश करते हैं। पितृ पक्ष में, जब हम अपने गए हुए लोगों को याद करते हैं, आसक्ति छोड़ने का यह संदेश और भी गहरा लगता है। संकटनाशन स्तोत्र में "सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं" नाम आता है।

किस तिथि को

पूर्णिमांत पंचांग में आश्विन कृष्ण चतुर्थी; अमांत पंचांग में यही भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी है। व्रत उस दिन होता है जब चंद्रोदय के समय चतुर्थी हो। इस पूरे पखवाड़े के बारे में पितृ पक्ष पृष्ठ देखें।

कैसे मनाते हैं

  • जिनके पितरों की तिथि चतुर्थी है, वे दोपहर में श्राद्ध और तर्पण करते हैं; श्राद्ध विधि देखें।
  • व्रती दिन भर फलाहार रखते हैं; शाम को गणेश जी को दूर्वा, मोदक, सिंदूर और लाल फूल चढ़ाते हैं।
  • संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा और गणेश चालीसा का पाठ।
  • चंद्रोदय पर अर्घ्य देकर पारण।

पितृ पक्ष में भी गणेश पूजा और संकष्टी व्रत पर कोई रोक नहीं है; बस नई खरीदारी और उत्सव वाले काम टाले जाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विघ्नराज संकष्टी कब होती है?
पूर्णिमांत पंचांग में आश्विन कृष्ण चतुर्थी को, जो पितृ पक्ष के बीच पड़ती है। अमांत में इसे भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी कहते हैं।
क्या पितृ पक्ष में संकष्टी व्रत रख सकते हैं?
हाँ, पितृ पक्ष में गणेश पूजा और व्रत पर कोई रोक नहीं है। श्राद्ध दोपहर में और गणेश पूजा शाम को की जा सकती है।
विघ्नराज का क्या अर्थ है?
विघ्नों के राजा। माना जाता है कि वे गलत राह पर रुकावट डालते हैं और भक्तों के रास्ते से रुकावटें हटाते हैं।
चतुर्थी श्राद्ध और संकष्टी एक साथ हों तो क्या करें?
पहले दोपहर में पितरों का श्राद्ध और ब्राह्मण भोजन करें, खुद व्रत जारी रखें, और शाम को गणेश पूजा व चंद्र अर्घ्य के बाद भोजन करें।
पूजा में क्या चढ़ाएँ?
दूर्वा की 21 गाँठें, मोदक या लड्डू, सिंदूर, लाल फूल और गुड़।

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