नारद जयंती
नारद जयंती देवर्षि नारद के प्राकट्य का दिन है। उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार यह ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा को, यानी बुद्ध पूर्णिमा के अगले दिन मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु और नारद मुनि की पूजा, भजन-कीर्तन और दान का महत्व है।
नारद मुनि कौन हैं
नारद जी ब्रह्मा जी के मानस पुत्र माने जाते हैं। हाथ में वीणा और मुख पर "नारायण नारायण" लिए वे तीनों लोकों में घूमते हैं और देवताओं, ऋषियों और असुरों के बीच संदेश पहुँचाते हैं। ध्रुव, प्रह्लाद और वाल्मीकि जैसे भक्तों को राह दिखाने वाले वही थे। उनके नाम से जुड़ा नारद भक्ति सूत्र भक्ति मार्ग का छोटा पर बहुत आदरणीय ग्रंथ है। लोक-कथाओं में उन्हें कलह करवाने वाला भी कहा जाता है, पर पुराणों में उनकी हर बात के पीछे किसी का कल्याण छिपा होता है।
किस तिथि को
पंचांग की गणना में यह वैशाख पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण प्रतिपदा है। पूर्णिमांत पंचांग (उत्तर भारत) में इसे ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा कहते हैं, जबकि अमांत पंचांग में यही तिथि वैशाख कृष्ण प्रतिपदा कहलाती है; दिन एक ही है, बस महीने का नाम बदलता है। जिस दिन सूर्योदय पर प्रतिपदा हो, वही दिन लिया जाता है।
कैसे मनाते हैं
- सुबह स्नान करके भगवान विष्णु और नारद जी का स्मरण करें, पीले फूल, तुलसी और चंदन चढ़ाएँ।
- विष्णु सहस्रनाम, नारद भक्ति सूत्र या भागवत का कोई अंश पढ़ें और ॐ जय जगदीश हरे आरती करें।
- गर्मी का मौसम होने से जल से भरा घड़ा, पंखा, सत्तू और फल दान करने की परंपरा है।
- कई लोग इस दिन व्रत रखते हैं और शाम को फलाहार करते हैं।
एक दिन पहले पड़ने वाली बुद्ध पूर्णिमा के साथ इस पर्व को जोड़कर देखें, और तिथि का समय आज के पंचांग में मिलाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नारद जयंती कब मनाई जाती है?
नारद जयंती पर किसकी पूजा करें?
नारद जयंती पर क्या दान करें?
नारद मुनि किसके पुत्र थे?
नारद भक्ति सूत्र क्या है?
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