भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी
भालचंद्र संकष्टी क्या है
भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की चौथ है, जो होली के कुछ ही दिन बाद आती है। इस दिन गणेश जी के "भालचंद्र" रूप — माथे (भाल) पर चंद्रमा धारण करने वाले गणपति — की पूजा होती है। संकष्टी होने के कारण व्रत रात को चंद्र दर्शन और अर्घ्य के साथ पूरा होता है, इसलिए चंद्रमा से जुड़ा यह नाम इस दिन और भी सार्थक लगता है।
किस तिथि को
पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार यह चैत्र कृष्ण चतुर्थी है — होली के बाद चौथा-पाँचवाँ दिन। अमांत पंचांग में यही तिथि फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी कहलाती है, क्योंकि वहाँ फाल्गुन महीना अमावस्या पर खत्म होता है। व्रत उसी दिन रखें जिस रात चंद्रोदय के समय चतुर्थी हो।
भालचंद्र नाम की कथा
लोक परंपरा के अनुसार एक बार चंद्रमा ने गणेश जी के गज-मुख और बड़े पेट का उपहास किया। गणेश जी ने उसे शाप दिया कि जो उसे देखेगा, उस पर कलंक लगेगा। चंद्रमा के क्षमा माँगने पर उन्होंने शाप हल्का किया और उसे अपने माथे पर स्थान दिया — तभी से वे भालचंद्र कहलाए। यही कथा गणेश चतुर्थी कथा में चंद्र दर्शन दोष के रूप में भी आती है।
पूजा कैसे करें
दिन भर फलाहार या निर्जल व्रत रखें। शाम को गणेश जी को दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर और मोदक चढ़ाएँ, संकष्टी व्रत कथा सुनें और आरती करें। चंद्रमा निकलने पर जल, दूध और अक्षत से अर्घ्य दें और फिर प्रसाद लें। यह संकष्टी चैत्र नवरात्रि से ठीक पहले के पखवाड़े में आती है, इसलिए कई परिवार इसी दिन से नए संवत की तैयारी शुरू कर देते हैं। मासिक तिथियाँ संकष्टी चतुर्थी कैलेंडर पर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भालचंद्र संकष्टी कब आती है?
भालचंद्र का अर्थ क्या है?
क्या इस दिन चंद्रमा देखना ठीक है?
व्रत में क्या खाएं?
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