शरद पूर्णिमा (आश्विन पूर्णिमा)
आश्विन पूर्णिमा क्या है
आश्विन महीने की पूर्णिमा को उत्तर भारत में शरद पूर्णिमा कहते हैं। मान्यता है कि साल में केवल इसी रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी चाँदनी में अमृत जैसा गुण होता है। इसीलिए लोग रात में खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखते हैं और सुबह उसे प्रसाद के रूप में खाते हैं।
इसी रात को कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं। लोक मान्यता है कि देवी लक्ष्मी रात में घूमकर पूछती हैं, "को जागर्ति?" यानी कौन जाग रहा है, और जागकर पूजा करने वालों पर कृपा करती हैं। ब्रज में इसे रास पूर्णिमा कहा जाता है, क्योंकि श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास इसी रात रचाया था।
किस तिथि को
आश्विन शुक्ल पूर्णिमा। शरद पूर्णिमा का व्रत, चंद्र पूजा और खीर उस रात को मानी जाती है जब चंद्रोदय के समय पूर्णिमा हो; कोजागरी लक्ष्मी पूजा के लिए आधी रात (निशीथ) में पूर्णिमा होना ज़रूरी माना गया है। स्नान-दान उदया तिथि से होता है, इसलिए कभी-कभी ये दो दिन में बँट जाते हैं।
कैसे मनाते हैं
- दिन में व्रत, शाम को लक्ष्मी-नारायण और चंद्रमा की पूजा।
- दूध, चावल और चीनी की खीर बनाकर छलनी या जालीदार कपड़े से ढककर चाँदनी में रखना; सुबह परिवार में बाँटना। इसका कारण शरद पूर्णिमा पर खीर चाँदनी में क्यों रखते हैं में पढ़ें।
- साहूकार की दो बेटियों वाली शरद पूर्णिमा व्रत कथा सुनना।
- रात में जागरण, भजन और लक्ष्मी जी की आरती।
और क्या होता है इस दिन
महर्षि वाल्मीकि जयंती भी इसी पूर्णिमा को मनाई जाती है। इसी दिन से कार्तिक स्नान शुरू करने की परंपरा है, जो कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है। बंगाल, ओडिशा और असम में यह दिन लक्ष्मी पूजा का मुख्य दिन है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शरद पूर्णिमा पर खीर चाँदनी में क्यों रखते हैं?
कोजागरी पूर्णिमा और शरद पूर्णिमा में क्या अंतर है?
शरद पूर्णिमा पर किसकी पूजा होती है?
शरद पूर्णिमा का व्रत कैसे खोलें?
क्या इस दिन वाल्मीकि जयंती भी होती है?
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