आषाढ़ गुप्त नवरात्रि: ब्रह्मचारिणी पूजा
आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का दूसरा दिन
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का दूसरा दिन होता है, जिसमें नवदुर्गा के दूसरे रूप माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। यही तिथि पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा की भी है, इसलिए उत्तर भारत के कई घरों में आज सुबह देवी पूजा और शाम को भगवान जगन्नाथ का स्मरण दोनों होते हैं।
माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप
शिव को पति रूप में पाने के लिए पार्वती ने जो लंबा तप किया, उसी रूप को ब्रह्मचारिणी कहते हैं। पहले फल-फूल, फिर सूखे बेलपत्र, और आख़िर में पत्ते भी छोड़ देने से वे "अपर्णा" कहलाईं। माँ सफ़ेद वस्त्र में, नंगे पाँव, दाहिने हाथ में जप-माला और बाएँ में कमंडल लिए हैं।
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
गुप्त नवरात्रि में इस दिन का महत्व
ब्रह्मचारिणी स्वयं तप और संयम की देवी हैं, और गुप्त नवरात्रि का पूरा भाव भी यही है — बिना दिखावे के, भीतर की साधना। तंत्र परंपरा में साधक इन दिनों दस महाविद्याओं (काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी (षोडशी), भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला) की उपासना करते हैं, और दूसरे दिन से जप का नियम पक्का किया जाता है: रोज़ एक ही समय, एक ही आसन, एक ही संख्या। कुछ ही दिनों बाद देवशयनी एकादशी से चातुर्मास शुरू होगा, जो खुद संयम के चार महीने हैं; ब्रह्मचारिणी की पूजा उसकी अच्छी तैयारी मानी जाती है।
पूजा और भोग
- कलश के सामने सफ़ेद फूल चढ़ाकर ध्यान मंत्र और "ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः" का जाप करें।
- शक्कर या मिश्री का भोग लगाएँ — मान्यता है कि इससे परिवार की आयु बढ़ती है।
- संध्या को जय अम्बे गौरी आरती करें।
पिछले दिन की पूजा शैलपुत्री पूजा पर है, और नौ रूपों का परिचय नवदुर्गा के नौ रूप में।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आषाढ़ गुप्त नवरात्रि के दूसरे दिन किसकी पूजा होती है?
क्या इसी दिन जगन्नाथ रथयात्रा होती है?
माँ ब्रह्मचारिणी को क्या भोग लगाएं?
गुप्त नवरात्रि में जप कैसे करें?
ब्रह्मचारिणी की पूजा से क्या फल मिलता है?
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