रोज़ घर पर पूजा करने के लिए बड़े विधान की ज़रूरत नहीं है। सुबह नहाकर साफ़ कपड़े पहनें, पूजा घर में दीपक जलाएं, भगवान को जल, चंदन, फूल और भोग अर्पित करें, फिर आरती करके हाथ जोड़कर क्षमा माँग लें। यही पंचोपचार पूजा है, जो ज़्यादातर उत्तर भारतीय घरों में पीढ़ियों से चलती आ रही है।
नीचे पूजा घर की व्यवस्था से लेकर सुबह का पूरा क्रम, शाम की संध्या और भागदौड़ वाले दिनों के लिए 10 मिनट की पूजा तक सब कुछ दिया गया है, ताकि आप अपने घर की परंपरा के हिसाब से इसे अपना सकें।
पूजा घर: दिशा और सजावट
वास्तु और पुराने घरों की परंपरा दोनों में पूजा का स्थान उत्तर-पूर्व कोना यानी ईशान कोण माना जाता है। अगर फ़्लैट में यह संभव न हो तो कोई भी साफ़, शांत कोना चुन लें जहाँ रोज़ आराम से बैठ सकें। पूजा करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर की ओर हो, यह सबसे सहज व्यवस्था है।
- चौकी या आला: भगवान को ज़मीन पर सीधे न रखें, लकड़ी की छोटी चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं।
- मूर्तियाँ कम और साफ़: घर के मंदिर में छोटी मूर्तियाँ या चित्र रखें। एक ही देवता की कई मूर्तियाँ भरने के बजाय कुलदेवता, गणेश जी, लक्ष्मी जी और अपने इष्ट देव काफ़ी हैं। खंडित मूर्ति को सम्मान से बहते जल या पीपल के नीचे विसर्जित कर दें।
- ज़रूरी सामान पास रखें: तांबे का लोटा, छोटी घंटी, दीपक, अगरबत्ती स्टैंड, रोली, चावल (अक्षत), चंदन, कलावा, माचिस, और एक छोटी थाली।
- आसन: कुश, ऊन या सूती आसन पर बैठें। रोज़ उसी आसन का इस्तेमाल करें।
पूजा घर में बासी फूल, सूखी माला और जली हुई अगरबत्ती की राख रोज़ हटा दें। साफ़-सफ़ाई ही इस कोने की असली सजावट है।
सुबह की पूजा का क्रम
सुबह की पूजा सूर्योदय के आसपास करना सबसे अच्छा माना जाता है, पर नौकरी और बच्चों के स्कूल वाले घरों में जो समय रोज़ निभ सके, वही सही समय है। किसी ख़ास दिन का शुभ समय जानना हो तो आज का पंचांग देख लें।
- स्नान और शुद्धि: नहाकर साफ़ कपड़े पहनें। पूजा घर में थोड़ा गंगाजल छिड़कें। गंगाजल न हो तो साफ़ जल में तुलसी का एक पत्ता डालकर छिड़क लें।
- आचमन: दाहिनी हथेली में तीन बार थोड़ा-थोड़ा जल लेकर पिएं और "ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः" बोलें। फिर हाथ धो लें।
- दीपक जलाएं: घी या तिल के तेल का दीपक जलाकर भगवान की दाहिनी ओर रखें।
- गणेश स्मरण: किसी भी पूजा से पहले "ॐ गं गणपतये नमः" बोलकर गणेश जी को प्रणाम करें।
- संकल्प (मन में): रोज़ की पूजा में लंबा संकल्प ज़रूरी नहीं। बस मन में कहें कि आप परिवार की कुशलता के लिए यह पूजा कर रहे हैं।
- जल और स्नान: छोटी मूर्तियों या लड्डू गोपाल को जल से स्नान कराएं और साफ़ कपड़े से पोंछें। चित्र हो तो फूल से जल के छींटे दें।
- चंदन, रोली, अक्षत: भगवान को चंदन या रोली का तिलक लगाएं और कुछ अक्षत चढ़ाएं।
- फूल और तुलसी: ताज़े फूल चढ़ाएं। विष्णु, कृष्ण और राम जी को तुलसी दल ज़रूर दें, लेकिन गणेश जी पर तुलसी नहीं चढ़ाई जाती।
- धूप-दीप: अगरबत्ती या धूप जलाकर भगवान के सामने घुमाएं।
- भोग: मिश्री, गुड़, फल, मेवा या घर में बना सादा प्रसाद रखें, ऊपर तुलसी दल डालें और थोड़ी देर बाद उठा लें।
- मंत्र या पाठ: अपने इष्ट का मंत्र 11 या 108 बार जपें, या हनुमान चालीसा, गायत्री मंत्र जैसा कोई छोटा पाठ करें।
- आरती और क्षमा प्रार्थना: आरती करें, फिर हाथ जोड़कर कहें कि पूजा में कोई भूल हुई हो तो क्षमा करें।
बहुत से परिवारों में पूजा से पहले या बाद में सूर्य को जल चढ़ाने की भी परंपरा है। तांबे के लोटे में जल, थोड़ा रोली और अक्षत डालकर उगते सूरज को अर्घ्य दिया जाता है।
दीपक, धूप और भोग
दीपक
घी का दीपक देवताओं के लिए सबसे उत्तम माना गया है। घी न हो तो तिल या सरसों का तेल चलता है। रुई की बत्ती रोज़ बदल दें। शनिवार और मंगलवार को कई घरों में हनुमान जी के लिए सरसों के तेल का अलग दीपक जलाया जाता है।
धूप और अगरबत्ती
पुराने घरों में लोबान, गुग्गुल या कपूर की धूप जलाई जाती थी। आजकल अगरबत्ती आम है। एक बात ध्यान रखें कि धुआँ बंद कमरे में न भरे, खिड़की थोड़ी खुली रखें।
भोग
भोग में वही रखें जो सात्त्विक हो और घर में बना हो या साफ़ हो। लहसुन-प्याज़ वाला खाना भोग में नहीं रखा जाता। रोज़ के लिए मिश्री-इलायची, गुड़ का टुकड़ा, केला या कोई मौसमी फल काफ़ी है। भोग लगाने के बाद उसे प्रसाद के रूप में परिवार में बाँट दें, फेंकें नहीं।
आरती कैसे करें
आरती की थाली में घी का दीपक या कपूर, थोड़े फूल, अक्षत और घंटी रखें। आरती शुरू करने से पहले शंख बजाने की परंपरा भी है, खासकर शाम को।
- आरती घड़ी की सुई की दिशा में घुमाई जाती है। आम चलन है: चरणों के आगे चार बार, नाभि के आगे दो बार, मुख के आगे एक बार, और फिर पूरे विग्रह के आगे सात बार।
- आरती गाते समय घंटी बाएँ हाथ से बजाएं।
- आरती के बाद थाली पर हाथ फेरकर अपनी आँखों और माथे से लगाएं, और परिवार को भी आरती दें।
- सबसे ज़्यादा गाई जाने वाली आरती ॐ जय जगदीश हरे है, जो किसी भी दिन गाई जा सकती है। वार के हिसाब से भी आरती चुन सकते हैं, सोमवार को शिव जी, मंगलवार को हनुमान जी और शुक्रवार को लक्ष्मी जी की।
आरती के नियम विस्तार से जानने के लिए आरती कैसे करें वाला लेख पढ़ें।
शाम की संध्या
उत्तर भारत के घरों में सूरज ढलते ही दीया-बाती करने की परंपरा है। इसे संध्या या "दिया जलाना" कहते हैं। इसमें लंबी पूजा नहीं होती।
- हाथ-मुँह धोकर पूजा घर में घी या तेल का दीपक जलाएं।
- आँगन या बालकनी में रखी तुलसी के पास भी एक दीपक रखें। तुलसी से जुड़ी सावधानियाँ तुलसी के नियम में पढ़ें।
- मुख्य द्वार पर एक दीपक या कम से कम बिजली की रोशनी जरूर हो, ऐसी मान्यता है कि शाम को लक्ष्मी जी का आगमन होता है।
- संभव हो तो शंख बजाएं और छोटी आरती या भजन कर लें।
शाम की पूजा के बाद भगवान को सुलाने की परंपरा भी कई घरों में है, खासकर जहाँ लड्डू गोपाल की सेवा होती है। रात को उनके आगे जल का गिलास और थोड़ा भोग रख दिया जाता है।
जल्दी में हों तो 10 मिनट की पूजा
हर दिन एक जैसा नहीं होता। सुबह की ट्रेन हो, बच्चा बीमार हो या घर में मेहमान हों, तब भी पूजा छोड़ने के बजाय यह छोटा क्रम अपनाएं:
- हाथ-मुँह धोकर (नहाना संभव न हो तो) पूजा घर में दीपक जलाएं।
- भगवान को जल के छींटे दें, एक फूल या तुलसी दल चढ़ाएं।
- मिश्री या गुड़ का भोग रखें।
- "ॐ नमः शिवाय" या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" जैसा अपना मंत्र 11 बार बोलें।
- छोटी आरती करें और प्रणाम करके उठ जाएं।
शास्त्रों में मानस पूजा का भी ज़िक्र है, यानी मन ही मन भगवान को स्नान, वस्त्र, फूल और भोग अर्पित करना। यात्रा में या अस्पताल में हों तब यही पूजा है।
कुछ आम सवालों के व्यावहारिक जवाब
- मासिक धर्म के दिनों में: परिवारों की परंपरा अलग-अलग है। जहाँ महिलाएँ इन दिनों पूजा घर में नहीं जातीं, वहाँ घर का कोई और सदस्य दीपक जला देता है।
- सूतक या पातक में: जन्म या मृत्यु के सूतक में मूर्ति छूकर पूजा नहीं की जाती, केवल मन में नाम जप चलता है।
- कोई सामग्री न हो: फूल न हों तो अक्षत चढ़ाएं, घी न हो तो तेल, भोग न हो तो जल या मिश्री। भाव सबसे बड़ी सामग्री है।

