आरती पूजा का वह हिस्सा है जिसमें घी के दीपक या कपूर की लौ को भगवान की मूर्ति या चित्र के सामने गोल घुमाया जाता है, साथ में घंटी बजती है और आरती गाई जाती है। सही क्रम यह माना जाता है कि दीपक पहले चरणों पर चार बार, फिर नाभि पर दो बार, फिर मुख पर एक बार और फिर पूरे विग्रह पर सात बार घुमाया जाए। आरती हमेशा पूजा के आख़िर में होती है, और सुबह-शाम दोनों समय की जा सकती है।
आरती का अर्थ
आरती शब्द संस्कृत के आरात्रिक से आया है, जिसका भाव है अंधेरे को दूर करना। शास्त्रों में इसे नीराजन भी कहते हैं। पूजा में जो कुछ कमी रह गई हो, मंत्र छूट गया हो या क्रम बिगड़ गया हो, वह आरती से पूरी मानी जाती है; स्कन्द पुराण में भी ऐसा भाव मिलता है कि मंत्रहीन और क्रियाहीन पूजा भी नीराजन से पूर्ण हो जाती है। इसीलिए जो लोग रोज़ लंबी पूजा नहीं कर पाते, वे भी दिया जलाकर आरती ज़रूर करते हैं। घर की रोज़ की पूजा का पूरा क्रम रोज़ घर पर पूजा कैसे करें लेख में है।
आरती की थाली में क्या हो
- घी का दीपक: एक बाती, पाँच बाती (पंचमुखी) या सात बाती का। विषम संख्या में बातियाँ रखने का चलन है।
- कपूर की टिकिया, अलग छोटी कटोरी या कपूरदानी में
- रोली या कुमकुम, अक्षत, कुछ फूल
- घंटी (थाली के साथ या दूसरे हाथ में)
- जल से भरा छोटा लोटा या आचमनी
- शंख, अगर घर में बजाने का चलन हो
- थोड़ा प्रसाद: मिश्री, बताशे, फल या मेवा
थाली पीतल, ताँबे या चाँदी की हो तो अच्छा, पर स्टील की थाली में भी आरती पूरी तरह मान्य है। थाली पर स्वस्तिक बनाकर बीच में दीपक रखें। कुछ न हो तो: घी न हो तो तिल या सरसों का तेल चलेगा; कपूर न हो तो केवल दीपक से आरती करें; घंटी न हो तो ताली बजाकर गाएँ।
घुमाने का क्रम: चरण, नाभि, मुख, पूरा विग्रह
यह क्रम पूजा-पद्धति की किताबों में सबसे प्रचलित है:
- थाली दाहिने हाथ में लें और बाएँ हाथ से घंटी बजाते रहें।
- दीपक को भगवान के चरणों के सामने चार बार घुमाएँ।
- फिर नाभि के सामने दो बार घुमाएँ।
- फिर मुख के सामने एक बार घुमाएँ।
- आख़िर में चरणों से सिर तक पूरे विग्रह के सामने सात बार घुमाएँ।
कुल मिलाकर चौदह बार। घुमाने की दिशा घड़ी की सुई की तरह (दक्षिणावर्त) रखें। कई लोग दीपक से हवा में ॐ की आकृति भी बनाते हैं, यह भी अच्छा है। बहुत से परिवारों में यह गिनती नहीं होती और पूरी आरती गाते हुए दीपक बस घुमाया जाता रहता है; इससे आरती अधूरी नहीं होती। भाव गिनती से बड़ा है।
आरती खड़े होकर करें। घर में पति-पत्नी, बच्चे सब हों तो एक व्यक्ति थाली घुमाए और बाकी ताली या घंटी बजाकर साथ गाएँ। मंदिर में आरती चल रही हो तो पुजारी के बाद ही अपनी थाली घुमाएँ।
कपूर या घी की बाती
दोनों ही मान्य हैं, और अधिकतर घरों में दोनों साथ होते हैं: पहले घी के दीपक से आरती, फिर आख़िर में कपूर जलाकर। कपूर पूरी तरह जलकर कुछ नहीं छोड़ता, इसलिए उसे अहंकार के पूरी तरह मिट जाने का प्रतीक माना जाता है। शिव जी की आरती में कपूर का विशेष महत्व है, और आरती के बाद ‘कर्पूरगौरं करुणावतारं’ श्लोक बोलने का चलन है।
- कपूर असली (भीमसेनी या देसी) लें; बहुत धुआँ देने वाला सस्ता कपूर बंद कमरे में परेशानी करता है।
- कपूर जलाते समय हाथ और कपड़ों का ध्यान रखें, खासकर रेशमी साड़ी और दुपट्टे का।
- दीपक या कपूर को फूँक मारकर न बुझाएँ। उसे अपने आप शांत होने दें, या ज़रूरत हो तो हाथ से हवा करके बुझाएँ।
आरती के बाद
- आरती पूरी होने पर थाली के चारों ओर थोड़ा जल घुमाकर नीचे छोड़ें; इसे आरती शांत करना कहते हैं।
- पहले आरती भगवान को अर्पित करें, फिर परिवार के लोगों की ओर ले जाएँ।
- हर व्यक्ति दोनों हथेलियाँ लौ के ऊपर रखकर फिर आँखों और सिर से लगाए।
- पुष्पांजलि दें, यानी हाथ में फूल लेकर भगवान को अर्पित करें।
- क्षमा प्रार्थना करें: पूजा में जो भूल हुई हो, उसके लिए भगवान से क्षमा माँगें।
- प्रसाद बाँटें। आरती के बाद तुरंत मंदिर का पर्दा न खींचें; दीपक थोड़ी देर जलने दें।
आरती में होने वाली आम गलतियाँ
- पूजा शुरू होते ही आरती कर देना। आरती पूजा, भोग और प्रार्थना के बाद आती है।
- दीपक उलटी दिशा (वामावर्त) में घुमाना, या बहुत तेज़ी से घुमाना कि लौ बुझ जाए।
- थाली इतनी ऊँची उठाना कि भगवान का मुख ही ढक जाए; थाली छाती से मुख की ऊँचाई तक रखें।
- बैठे-बैठे या लेटे हुए आरती करना, जब तक तबीयत की मजबूरी न हो।
- आरती लेते समय जूते-चप्पल पहने रहना।
- टूटी बाती या कल का बचा तेल-घी इस्तेमाल करना; हर बार नई बाती और ताज़ा घी लें।
किसकी कौन-सी आरती
उत्तर भारत के घरों में ये आरतियाँ सबसे ज़्यादा गाई जाती हैं। हर आरती के पूरे बोल और अर्थ हमारे आरती संग्रह में हैं:
| देवता / अवसर | प्रचलित आरती | खास दिन |
|---|---|---|
| विष्णु, हर पूजा के आख़िर में | ॐ जय जगदीश हरे | गुरुवार, एकादशी, सत्यनारायण कथा |
| गणेश, हर पूजा के आरंभ में | जय गणेश जय गणेश देवा | बुधवार, चतुर्थी |
| दुर्गा माँ | जय अम्बे गौरी | नवरात्रि, अष्टमी, शुक्रवार |
| शिव जी | ॐ जय शिव ओंकारा | सोमवार, प्रदोष, सावन |
| लक्ष्मी माँ | ॐ जय लक्ष्मी माता | दिवाली, शुक्रवार |
| हनुमान जी | आरती कीजै हनुमान लला की | मंगलवार, शनिवार |
| राम जी | आरती कीजै श्री रघुवर जी की | राम नवमी |
| कृष्ण जी | आरती कुंजबिहारी की | जन्माष्टमी |
कई घरों में पूजा की शुरुआत गणेश आरती से और अंत ॐ जय जगदीश हरे से होता है, बीच में उस दिन के देवता की आरती। एक साथ कई आरतियाँ गानी हों तो दीपक बीच में न बुझने दें; ज़रूरत हो तो घी डालते रहें।

