तुलसी के पत्ते रविवार, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति, ग्रहण के समय और सूर्यास्त के बाद नहीं तोड़े जाते। जल की बात करें तो ज़्यादातर उत्तर भारतीय घरों में रविवार और एकादशी को तुलसी में जल नहीं दिया जाता। बाकी दिनों में सुबह जल और शाम को दीपक, यही तुलसी की रोज़ की सेवा है।
ये नियम किसी डर से नहीं, बल्कि तुलसी को घर की सदस्य और देवी मानने के भाव से बने हैं। नीचे हर नियम के पीछे की मान्यता और व्यावहारिक तरीका दिया गया है।
तुलसी का धार्मिक स्थान
पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में तुलसी को विष्णुप्रिया कहा गया है। कथा के अनुसार वृंदा नाम की पतिव्रता स्त्री ही तुलसी के रूप में पूजी गईं और भगवान विष्णु ने उन्हें अपने शालिग्राम रूप के साथ सदा रहने का वरदान दिया। यही कारण है कि कार्तिक में तुलसी और शालिग्राम का विवाह होता है। पूरी कथा तुलसी विवाह कथा में पढ़ सकते हैं।
घरों में दो तरह की तुलसी मिलती है: हरे पत्तों वाली राम तुलसी और गहरे बैंगनी पत्तों वाली श्याम (कृष्ण) तुलसी। पूजा में दोनों का एक जैसा महत्व है। विष्णु, कृष्ण, राम और सत्यनारायण भगवान का भोग तुलसी दल के बिना अधूरा माना जाता है।
रोज़ जल और दीपक
- सुबह जल: नहाने के बाद तांबे या पीतल के लोटे से तुलसी की जड़ में धीरे-धीरे जल दें। पत्तों पर ज़ोर से पानी न डालें।
- परिक्रमा: जल देकर तीन या सात बार परिक्रमा करें। गमला दीवार से सटा हो तो अपनी जगह पर घूमकर प्रणाम कर लें।
- शाम का दीपक: सूर्यास्त के समय तुलसी के पास घी या तिल के तेल का दीपक रखें। कार्तिक में यह दीपक पूरे महीने रोज़ जलाया जाता है।
- मंत्र: जल देते समय "महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्यवर्धिनी। आधि व्याधि हरा नित्यं तुलसी त्वं नमोऽस्तु ते॥" बोला जाता है। याद न हो तो "ॐ तुलसी देव्यै नमः" काफ़ी है।
- आरती: गुरुवार या एकादशी की शाम तुलसी माता की आरती गाने की परंपरा कई घरों में है।
किन दिनों जल नहीं देते
लोक मान्यता है कि रविवार को तुलसी विश्राम करती हैं और एकादशी को वे भगवान विष्णु के लिए निर्जल व्रत रखती हैं, इसलिए इन दिनों जल नहीं दिया जाता। सूर्यास्त के बाद भी जल नहीं दिया जाता। यह परंपरा पूरे देश में एक-सी नहीं है; कुछ वैष्णव संप्रदायों में रोज़ जल दिया जाता है। गर्मी में पौधा सूखने लगे तो रविवार से एक दिन पहले थोड़ा ज़्यादा पानी दे दें और गमला छाँव में रख दें। पौधे की देखभाल भी सेवा ही है।
पत्ते कब न तोड़ें
इन दिनों और समयों में तुलसी दल नहीं तोड़ा जाता:
- रविवार
- एकादशी और द्वादशी
- अमावस्या और पूर्णिमा
- संक्रांति के दिन (हर महीने की सूर्य संक्रांति)
- सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय और सूतक में
- सूर्यास्त के बाद और रात में
- बिना नहाए, या जूते-चप्पल पहनकर
इन दिनों के लिए पत्ते एक दिन पहले तोड़कर रख लें। तुलसी दल बासी नहीं माना जाता, इसलिए धोकर अगले दिन भी चढ़ाया जा सकता है। गिरे हुए साफ़ पत्ते भी भोग में डाले जा सकते हैं।
तोड़ने का तरीका
- नहाकर, हाथ जोड़कर तुलसी से अनुमति माँगें।
- नाखून से नोचने के बजाय उँगलियों से हल्के से पत्ता या मंजरी अलग करें।
- एक-एक पत्ता तोड़ने के बजाय डंठल के ऊपरी हिस्से से दो-तीन पत्तों का गुच्छा लेना बेहतर है, इससे पौधा भी घना होता है।
- उतने ही पत्ते लें जितनी ज़रूरत हो।
किन देवताओं पर तुलसी नहीं चढ़ती
| देवता | तुलसी? | क्या चढ़ाएं |
|---|---|---|
| विष्णु, कृष्ण, राम, सत्यनारायण, हनुमान जी | हाँ, ज़रूर | तुलसी दल भोग पर रखें |
| गणेश जी | नहीं | दूर्वा, लाल फूल |
| शिव जी | परंपरा से नहीं | बेलपत्र, धतूरा, आक |
| देवी (दुर्गा, लक्ष्मी) | आम तौर पर नहीं | लाल फूल, कमल, गुड़हल |
गणेश जी के बारे में ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा है कि तुलसी ने तपस्या में लीन गणेश जी से विवाह का प्रस्ताव रखा, उन्होंने मना किया और दोनों में शाप का आदान-प्रदान हुआ। शिव जी के बारे में वृंदा-जलंधर प्रसंग को कारण बताया जाता है। हनुमान जी को तुलसी की माला और तुलसी दल प्रिय माने जाते हैं, क्योंकि वे राम जी के भक्त हैं।
सूखा पौधा हो जाए तो
सर्दी, ज़्यादा पानी या कीड़े लगने से तुलसी सूख जाना आम बात है। इसे अपशकुन मानकर घबराने की ज़रूरत नहीं।
- सूखे पौधे को हाथ जोड़कर धीरे से निकालें।
- उसे बहते जल में प्रवाहित करें, या घर के बगीचे की मिट्टी में दबा दें। कूड़े में न फेंकें।
- सूखी लकड़ी से कई लोग तुलसी की माला या दीपक की बत्ती का आधार बनाते हैं।
- नया पौधा किसी शुभ दिन, जैसे गुरुवार या कार्तिक के महीने में, लगाएं। एकादशी और रविवार को पौधा लगाने से बचा जाता है।
- सर्दी में रात को गमले पर पतला कपड़ा ढक दें और पानी कम कर दें।
कार्तिक में तुलसी पूजा
कार्तिक मास तुलसी का महीना है। शरद पूर्णिमा के बाद से कार्तिक पूर्णिमा तक महिलाएँ रोज़ सुबह तुलसी में जल देती हैं और शाम को दीपक जलाती हैं। कई जगह तुलसी के गमले को गेरू और चूने से सजाया जाता है और उसके चारों ओर रंगोली बनती है। स्नान और दीपदान के नियम कार्तिक मास के नियम में विस्तार से हैं।
कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इसकी विधि देवउठनी एकादशी पूजा विधि में है। इसी के आसपास, एकादशी या द्वादशी को, तुलसी-शालिग्राम विवाह होता है, जिसकी पूरी सामग्री और क्रम तुलसी विवाह विधि में दिया गया है।
एकादशी और तुलसी
एकादशी को तुलसी तोड़ना और जल देना दोनों वर्जित हैं, लेकिन भगवान को तुलसी चढ़ाना ज़रूरी है। इसलिए दशमी को ही पत्ते तोड़कर रख लिए जाते हैं। व्रत वाले दिन खाने-पीने के नियम एकादशी में क्या खाएं, क्या नहीं में देखें।

