ग्रहण का सूतक सूर्य ग्रहण से 12 घंटे (चार प्रहर) पहले और चंद्र ग्रहण से 9 घंटे (तीन प्रहर) पहले शुरू होता है और ग्रहण ख़त्म होने (मोक्ष) के साथ समाप्त होता है। सूतक केवल तभी माना जाता है जब ग्रहण आपके इलाके में दिखाई दे। इस दौरान मंदिरों के कपाट बंद रहते हैं, भोजन पकाना-खाना टाला जाता है और जप-पाठ किया जाता है।
सूर्य और चंद्र ग्रहण
सूर्य ग्रहण हमेशा अमावस्या को होता है, जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आकर सूर्य को ढक लेता है। चंद्र ग्रहण हमेशा पूर्णिमा को होता है, जब पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है। पुराणों में इसे राहु-केतु से जोड़ा गया है: समुद्र मंथन के बाद अमृत बँटते समय स्वरभानु नाम का असुर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया, सूर्य-चंद्र ने उसे पहचान लिया और भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर अलग कर दिया। सिर राहु और धड़ केतु कहलाया, जो तभी से सूर्य-चंद्र को "ग्रसते" हैं।
ग्रहण के तीन मुख्य समय होते हैं:
- स्पर्श: ग्रहण की शुरुआत
- मध्य: ग्रहण का सबसे गहरा क्षण
- मोक्ष: ग्रहण का अंत
आने वाले ग्रहणों की तारीख़, ये तीनों समय और भारत में दिखेगा या नहीं, यह सब ग्रहण कैलेंडर में देखें।
सूतक कब से
| ग्रहण | सूतक कब शुरू | कब ख़त्म |
|---|---|---|
| सूर्य ग्रहण | ग्रहण स्पर्श से 12 घंटे (4 प्रहर) पहले | ग्रहण मोक्ष के साथ |
| चंद्र ग्रहण | ग्रहण स्पर्श से 9 घंटे (3 प्रहर) पहले | ग्रहण मोक्ष के साथ |
| उपच्छाया (पेनुम्ब्रल) चंद्र ग्रहण | सूतक नहीं माना जाता | - |
उदाहरण के लिए, अगर चंद्र ग्रहण रात 9 बजे शुरू होना है तो सूतक दोपहर 12 बजे से लग जाएगा। उपच्छाया ग्रहण में चाँद केवल थोड़ा धुंधला होता है और उसका कोई हिस्सा कटा हुआ नहीं दिखता, इसलिए धार्मिक रूप से उसे ग्रहण नहीं गिना जाता।
किसे छूट है
परंपरा में बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमार लोगों और गर्भवती महिलाओं के लिए सूतक के नियम ढीले रखे गए हैं। उनके लिए खाने-पीने की रोक बहुत बाद से, केवल ग्रहण के आसपास के कुछ घंटों के लिए मानी जाती है, और ज़रूरत हो तो वे भोजन और दवा ले सकते हैं। दवा कभी न छोड़ें।
दिखाई न देने वाले ग्रहण का सूतक
यह सबसे आम सवाल है। नियम सीधा है: जहाँ ग्रहण दिखाई नहीं देता, वहाँ सूतक और ग्रहण के नियम लागू नहीं होते। कई बार ग्रहण दुनिया के किसी और हिस्से में होता है, या भारत में तब होता है जब हमारे यहाँ दिन है और चाँद क्षितिज के नीचे है। ऐसे में मंदिर खुले रहते हैं और घर में रोज़ की तरह पूजा-भोजन होता है।
कभी-कभी ग्रहण भारत के एक हिस्से में दिखता है और दूसरे में नहीं, जैसे पूर्वोत्तर में दिखे पर गुजरात में नहीं। इसलिए अपने शहर के हिसाब से जानकारी लें। अपने शहर का सूर्योदय, चंद्रोदय और तिथि आज के पंचांग में मिल जाएगी।
क्या करें, क्या न करें
सूतक और ग्रहण के दौरान क्या करें
- पहले से बने भोजन, दूध, दही, पानी और अचार में तुलसी के पत्ते या कुशा डाल दें। तुलसी सूतक लगने से पहले ही तोड़कर रख लें।
- ग्रहण के समय भगवान का नाम, गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र या अपने इष्ट का जप करें। मान्यता है कि ग्रहण में किया जप कई गुना फल देता है।
- मंत्र-सिद्धि की साधना करने वाले लोग इसी समय को चुनते हैं।
- दान के लिए अनाज, कपड़े या दक्षिणा पहले से अलग रख लें।
क्या न करें
- सूतक में मूर्तियों को छूना और पूजा-घर में विधिवत पूजा टाली जाती है; मंदिरों के कपाट भी बंद रहते हैं। मन में स्मरण और जप चलता रहता है।
- ग्रहण के दौरान भोजन पकाना और खाना परंपरा में टाला जाता है (ऊपर बताई छूट के साथ)।
- नया काम, ख़रीदारी या शुभ कार्य इस समय नहीं किए जाते।
- सूर्य ग्रहण को नंगी आँखों से, धूप के चश्मे से या कैमरे से सीधे न देखें। इससे आँखों को स्थायी नुकसान हो सकता है। केवल प्रमाणित ग्रहण-चश्मे या पिनहोल प्रोजेक्शन से देखें। चंद्र ग्रहण को देखना आँखों के लिए सुरक्षित है।
गर्भवती महिलाओं के लिए परंपराएँ
उत्तर भारत के कई घरों में गर्भवती महिलाओं से ग्रहण के समय कुछ परंपराएँ निभाने को कहा जाता है, जैसे घर के भीतर रहना, ग्रहण को सीधे न देखना, कैंची-चाकू या सुई का काम न करना और जप करते रहना। इन्हें श्रद्धा और सावधानी के भाव से निभाया जाता है, डर के भाव से नहीं।
ध्यान रखने वाली बात यह है कि गर्भवती महिला को भूखा-प्यासा न रखें, ज़रूरी दवाएँ समय पर लें और लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठे रहने के बजाय आराम से रहें। सेहत से जुड़ी किसी भी चिंता में अपनी डॉक्टर की सलाह को ही प्राथमिकता दें।
ग्रहण के बाद
- मोक्ष के बाद स्नान करें। संभव हो तो गंगा या किसी पवित्र नदी में, नहीं तो नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर।
- घर और पूजा-स्थान में गंगाजल छिड़कें, भगवान की मूर्तियों को स्नान कराएँ और नए वस्त्र या फूल चढ़ाएँ।
- पहले से रखा दान दें। चंद्र ग्रहण के बाद चावल, दूध, चीनी जैसी सफ़ेद चीज़ों और सूर्य ग्रहण के बाद गेहूँ, गुड़ या तांबे का दान करने का चलन है।
- ताज़ा भोजन बनाएँ। जिस भोजन में तुलसी डाली गई थी, उसे बहुत से परिवार फिर भी इस्तेमाल कर लेते हैं, पर पका हुआ भोजन बाहर नहीं फेंका जाता, गाय या पशुओं को दे दिया जाता है।
- मंदिर शुद्धिकरण के बाद ही कपाट खोलते हैं, इसलिए ग्रहण के बाद दर्शन को जाएँ तो थोड़ा रुककर जाएँ।
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