त्रैलोक्यविजय श्री प्रत्यंगिरा कवचं
जय धूम्रभीमाकारा सहस्रवदनाश्रिता ।
जलपिंगळलोलाक्षी ज्वालाजिह्वा च नित्यशः ॥1॥
निष्ठुरान् बंधयेद्देवी तत्क्षणं नागपाशकैः ।
भृकुटी भीषणान् वत्स्यात् धत्ते पादप्रहारतः ॥2॥
वामेऽरिमर्दनो दंडो दक्षिणो वज्रभीषणो ।
प्रेतशिरकरो रुद्रध्यानोद्दामरमारकं ॥3॥
अनंत तक्षकौ देव्या कंकणं च विराजिते ।
वासुकी कंठहारश्च कर्कटी कटिमेखला ॥4॥
श्लिष्टो पद्म महापद्मौ पाद्यो कृत नूपुरौ ।
रुंडमाल करे भूषा गोनसः कर्णमंडले ॥5॥
गृहाभेतृपटेधृत्वा जाता दानवघातिनी ।
स्वयं सैन्याऽभयदा देवी परसैन्य भयंकरी ॥6॥
नो यक्षैरखिलैर्न राक्षसगणैर्नो शाकिनी शक्तये [शतै]
नो वा चेटकखेटकैर्नवमहाभूतैः प्रभूतैरपि ।
नापि व्यंतर मुद्गरे फलगणैर्नो मंत्रयंत्रैः परै
देवी त्वच्चरणार्चतां परिभवः प्रत्यंगिरे शक्यते ॥7॥
इति त्रैलोक्यविजय श्री प्रत्यंगिरा कवचं॥
अर्थ
त्रैलोक्यविजय श्री प्रत्यंगिरा कवचम् देवी प्रत्यंगिरा के भयंकर और रौद्र रूप को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। यह कवच भक्तों को सभी प्रकार की बुरी शक्तियों, तांत्रिक प्रयोगों, शत्रुओं और नकारात्मक प्रभावों से बचाने वाला एक अभेद्य सुरक्षा कवच है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि देवी की दिव्य शक्ति का आह्वान है जो भक्त के चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षा घेरा बना देता है। यह कवच देवी के धूम्रभीमाकार, सहस्त्रवदन, ज्वालाजिह्वा और नागपाशधारिणी रूप का वर्णन करता है, जो भक्तों की हर विपत्ति से रक्षा करता है।
इस कवच में, प्रत्यंगिरा देवी का वर्णन उनके हजारों मुखों (सहस्त्र वदन), अग्नि के समान प्रज्वलित जिह्वा (ज्वालाजिह्वा) और भयंकर रूप के साथ किया गया है। उनकी दृष्टि अग्नि के समान ज्वलंत है, जो शत्रुओं को क्षण भर में नागपाशों से बांधने की क्षमता रखती है। उनकी भृकुटियाँ (भौं) भीष्म और भयानक हैं। उनके हाथों में दंड, वज्र, प्रेतशिरा और शूल जैसे आयुध शोभायमान हैं, जो उनकी संहारक शक्ति को दर्शाते हैं। उनके कंगन के रूप में अनंत और तक्षक नाग, कंठहार के रूप में वासुकी नाग और कमरबंद के रूप में कर्कटी (एक भयंकर शक्ति) विराजमान हैं। उनके चरणों में पद्म नूपुर, कानों में गोनस (एक प्रकार का सर्प) और हाथों में रुंडमाला (कपालों की माला) सुशोभित है, जो उनके उग्र स्वरूप को उजागर करता है।
प्रत्यंगिरा देवी स्वयं दानवों का संहार करने वाली हैं। वे अपने भक्तों की सेना को साहस प्रदान करती हैं और शत्रु सेना में भय उत्पन्न करती हैं। यह कवच भक्तों को देवी की अद्वितीय सुरक्षा प्रदान करता है। कवच स्पष्ट रूप से कहता है कि यक्ष, राक्षस, शाकिनी, भूत, या कोई भी तांत्रिक मंत्र-यंत्र या काला जादू प्रत्यंगिरा देवी के चरणों की पूजा करने वाले भक्त को हानि नहीं पहुंचा सकता। यह तीनों लोकों में विजय दिलाने वाला कवच है, जो भक्तों को सभी सिद्धियाँ और निर्भयता प्रदान करता है। देवी की कृपा से भक्त के चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षा कवच बन जाता है, जिसे कोई भी नकारात्मक शक्ति भेद नहीं सकती।
इस कवच का नियमित पाठ भक्तों को दिव्य सुरक्षा प्रदान करता है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है। यह न केवल बाहरी शत्रुओं से बल्कि आंतरिक भय और नकारात्मक विचारों से भी मुक्ति दिलाता है, मन को शांति और स्थिरता प्रदान करता है। देवी का यह उग्र रूप अंततः भक्तों का परम कल्याण करता है, उन्हें सभी प्रकार की बुरी शक्तियों से बचाता है और विजय तथा समृद्धि प्रदान करता है।
प्रयोजन और लाभ (Benefits):- शत्रु नाश और सुरक्षा: यह शत्रुओं से उत्पन्न होने वाले भय, बुरी नज़र, तांत्रिक प्रयोगों और नकारात्मक ऊर्जाओं से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है।
- त्रैलोक्य विजय: इस कवच के पाठ से भक्त तीनों लोकों में सम्मान, शक्ति और सफलता प्राप्त करता है, जिससे वह जीवन के सभी क्षेत्रों में विजय प्राप्त करने में सक्षम होता है।
- रोग मुक्ति: शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति दिलाकर उत्तम स्वास्थ्य और शांति प्रदान करता है।
- भूत-प्रेत बाधा निवारण: भूत, प्रेत, पिशाच और अन्य दुष्ट शक्तियों की बाधाओं को जड़ से समाप्त करता है, विशेष रूप से रात में पाठ करने पर इसका प्रभाव अधिक होता है।
- निर्भयता और साहस: भक्तों को साहस, आत्मविश्वास और मानसिक दृढ़ता प्रदान करता है, जिससे वे किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
त्रैलोक्यविजय श्री प्रत्यंगिरा कवचम् क्या है?
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
त्रैलोक्यविजय श्री प्रत्यंगिरा कवचम् के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
प्रत्यंगिरा कवच का पाठ कौन कर सकता है?
इस कवच का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस कवच का मूल या उद्गम क्या है?
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