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श्री प्रत्यंगिरा कवचं (जगन्मंगळकं)

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श्री प्रत्यंगिरा कवचं (जगन्मंगळकं)

श्रीदेव्युवाच ।
देव देव महादेव सर्वज्ञ करुणानिधे ।
प्रत्यंगिरायाः कवचं सर्वरक्षाकरं नृणां ॥1॥

जगन्मंगळकं नाम प्रसिद्धं भुवनत्रये ।
सर्वरक्षाकरं नॄणां रहस्यमपि तद्वद ॥2॥

श्रीशिव उवाच ।
शृणु कळ्याणि वक्ष्यामि कवचं शत्रुनिग्रहं ।
परप्रेषितकृत्यादि तंत्रशल्यादिभक्षणं ॥3॥

महाभिचारशमनं सर्वकार्यप्रदं नृणां ।
परसेनासमूहे च राज्ञामुद्दिश्य मंडलात् ॥4॥

जपमात्रेण देवेशि सम्यगुच्चाटनं भवेत् ।
सर्वतंत्रप्रशमनं कारागृहविमोचनं ॥5॥

क्षयापस्मारकुष्ठादि तापज्वरनिवारणं ।
पुत्रदं धनदं श्रीदं पुण्यदं पापनाशनं ॥6॥

वश्यप्रदं महाराज्ञां विशेषाच्छत्रुनाशनं ।
सर्वरक्षाकरं शून्यग्रहपीडाविनाशनं ॥7॥

बिंदुत्रिकोणं त्वथ पंचकोणं
दळाष्टकं षोडशपत्रयुक्तं ।
महीपुरेणावृतमंबुजाक्षी
लिखेन्मनोरंजनमग्रतोपि ॥8॥

महीपुरात्वूर्वमेव द्वात्रिंशत्पत्रमालिखेत् ।
अंतरे भूपुरं लेख्यं कोणाग्रे क्षां समालिखेत् ॥9॥

भद्रकाळीमनुं लेख्यं मंत्रं प्रत्यंगिरात्मकं ।
भद्रकाळ्युक्तमार्गेण पूज्यां प्रत्यंगिरां शिवां ॥10॥

रक्तपुष्पैः समभ्यर्च्य कवचं जपमाचरेत् ।
सकृत्पठनमात्रेण सर्वशत्रून् विनाशयेत् ॥11॥

शत्रवश्च पलायं ते तस्य दर्शनमात्रतः ।
मासमात्रं जपेद्देवि सर्वशत्रून् विनाशयेत् ॥12॥

अथ कवचं –
यां कल्पयंती प्रदिशं रक्षेत्काळी त्वथर्वणी ।
रक्षेत्कराळात्वाग्नेय्यां सदा मां सिंहवाहिनी ॥13॥

याम्यां दिशं सदा रक्षेत्कक्षज्वालास्वरूपिणी ।
नैरृत्यां रक्षतु सदा मास्मानृच्छो अनागसः ॥14॥

वारुण्यां रक्षतु मम प्रजां च पुरुषार्थिनी ।
वायव्यं रक्षातु सदा यातुधान्यो ममाखिलाः ॥15॥

दंष्ट्राकराळवदना कौबेर्यां बडबनला ।
ईशान्यां मे सदा रक्षेद्वीरांश्चान्यान्निबर्हय ॥16॥

उग्रा रक्षेदधोभागे मायामंत्रस्वरूपिणी ।
ऊर्ध्वं कपालिनी रक्षेत् क्षं ह्रीं हुं फट् स्वरूपिणी ॥17॥

अधो मे विदशं रक्षेत्कुरुकुळ्ला कपालिनी ।
विप्रचित्ता सदा रक्षेत् दिवारात्रं विरोधिनी ॥18॥

कुरुकुळ्ला तु मे पुत्रान् बांधवानुग्ररूपिणी ।
प्रभादीप्त गृहा रक्षेत् मातापुत्रान् समातृकान् ॥19॥

स्वभृत्यान् मे सदा रक्षेत्पायात् सा मे पशून् सदा ।
अजिता मे सदा रक्षेदपराजित कामदा ॥20॥

कृत्या रक्षेत्सदाप्राणान् त्रिनेत्रा काळरात्रिका ।
फालं पातु महाक्रूरा पिंगकेशी शिरोरुहान् ॥21॥

भ्रुवौ मे क्रूरवदना पायाच्चंडी प्रचंडिका ।
श्रोत्रयोर्युगळं पातु तदा मे शंखकुंडला ॥22॥

प्रेतचित्यासना देवी पायान्नेत्रयुग्मं मम ।
मम नासापुटद्वंद्वं ब्रह्मरोचिष्ण्वमित्रहा ॥23॥

कपोलं मे सदा पातु भृगवश्चाप सेधिरे ।
ऊर्ध्वोष्ठं तु सदा पातु रथस्येव विभुर्धिया ॥24॥

अधरोष्ठं सदा पातु आज्ञातस्ते वशो जनः ।
दंतपंक्तिद्वयं पातु ब्रह्मरूपा कराळिनी ॥25॥

वाचं वागीश्वरी रक्षेद्रसनां जननी मम ।
चुबुकं पातु मेंद्राणी तनूं ऋच्छस्व हेळिका ॥26॥

कर्णस्थानं मम सदा रक्षतां कंबुकंधरा ।
कंठध्वनिं सदा पातु नादब्रह्ममयी मम ॥27॥

जठरं मेंगिरः पुत्री मे वक्षः पातु कांचनी ।
पातु मे भुजयोर्मूलं जातवेदस्वरूपिणी ॥28॥

दक्षिणं मे भुजं पातु सततं काळरात्रिका ।
वामं भुजं वामकेशी परायंती परावती ॥29॥

पातु मे कूर्परद्वंद्वं मनस्तत्वाभिधा सती ।
वाचं वागीश्वरी रक्षेद्रसनां जननी मम ॥30॥

वज्रेश्वरी सदा पातु प्रकोष्ठयुगळं मम ।
मणिद्वयं सदा पातु धूम्रा शत्रुजिघांसया ॥31॥

पायात्करतलद्वंद्वं कदंबवनवासिनी ।
वामपाण्यंगुळी पातु हिनस्ति परशासनं ॥32॥

सव्यपाण्यंगुळी पातु यदवैषि चतुष्पदी ।
नाभिं नित्या सदा पातु ज्वालाभैरवरूपिणी ॥33॥

पंचास्यपीठनिलया पातु मे पार्श्वयोर्युगं ।
पृष्ठं प्रज्ञेश्वरी पातु कटिं पृथुनितंबिनी ॥34॥

गुह्यमानंदरूपाव्यादंडं ब्रह्मांडनायकी ।
पायान्मम गुदस्थानमिंदुमौळिमनः शुभा ॥35॥

बीजं मम सदा पातु दुर्गा दुर्गार्तिहारिणी ।
ऊरू मे पातु क्षांतात्मा त्वं प्रत्यस्य स्वमृत्यवे ॥36॥

वनदुर्गा सदा पातु जानुनी वनवासिनी ।
जंघिकांडद्वयं पातु यश्चजामीश पातु नः ॥37॥

गुल्फयोर्युगळं पातु योऽस्मांद्वेष्टि वधस्व तं ।
पदद्वंद्वं सदाव्यान्मे पदाविस्फार्य तच्छिरः ॥38॥

अभिप्रेहि सहस्राक्षं पादयोर्युगळं मम ।
पायान्मम पदद्वंद्वं दहन्नग्निरिव ह्रदं ॥39॥

सर्वांगं सर्वदा पातु सर्वप्रकृतिरूपिणी ।
मंत्रं प्रत्यंगिरा देवी कृत्याश्च सहृदो सुहृत् ॥40॥

पराभिचारकृत्यात्म समिद्धं जातवेदसं ।
परप्रेषितशल्यात्मे तमितो नाशयामसि ॥41॥

वृक्षादि प्रतिरूपात्मा शिवं दक्षिणतः कृधि ।
अभयं सततं पश्चाद्भद्रमुत्तरतो गृहे ॥42॥

भूतप्रेतपिशाचाद्यान् प्रेषितान् जहि मां प्रति ।
भूतप्रेतपिशाचादि परतंत्रविनाशिनी ॥43॥

पराभिचारशमनी धारणात्सर्वसिद्धिदां ।
भूर्जपत्रे स्वर्णपत्रे लिखित्वा धारयेद्यदि ॥44॥

सर्वसिद्धिमवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् ।
एकावृत्तिं जपेद्देवि सर्वऋग्जपदा भवेत् ॥45॥

भद्रकाळी प्रसन्नाऽभूदभीष्टफलदा भवेत् ।
बंदीगृहे सप्तरात्रं चोरद्रव्येऽष्टरात्रकं ॥46॥

महाज्वरे सप्तरात्रं उच्चाटे मासमात्रकं ।
महाव्याधिनिवृत्तिः स्यान्मंडलं जपमाचरेत् ॥47॥

पुत्रकार्ये मासमात्रं महाशत्रुत्वमंडलात् ।
युद्धकार्ये मंडलं स्याद्धार्यं सर्वेषु कर्मसु ॥48॥

अस्मिन्यज्ञे समावाह्य रक्तपुष्पैः समर्चयेत् ।
नत्वा न कुर्तु मर्हासि इषुरूपे गृहात्सदा ॥49॥

शास्तालये चतुष्पथे स्वगृहे गेहळीस्थले ।
निखनेद्यं त्रिशल्यादि तदर्थं प्रापयाशुमे ॥50॥

मासोच्छिष्टश्च द्विपदमेतत्किंचिच्चतुष्पदं ।
माज्ञातिरनुजानस्यान्मासावेशि प्रवेशिनः ॥51॥

बले स्वप्नस्थले रक्षेद्यो मे पापं चिकीर्षति ।
आपादमस्तकं रक्षेत्तमेव प्रतिधावतु ॥52॥

प्रतिसर प्रतिधाव कुमारीव पितुर्गृहं ।
मूर्धानमेषां स्फोटय वधाम्येषां कुले जही ॥53॥

ये मे मनसा वाचा यश्च पापं चिकीर्षति ।
तत्सर्वं रक्षतां देवी जहि शत्रून् सदा मम ॥54॥

खट् फट् जहि महाकृत्ये विधूमाग्नि समप्रभे ।
देवि देवि महादेवि मम शत्रून्विनाशय ॥55॥

त्रिकालं रक्ष मां देवि पठतां पापनाशनं ।
सर्वशत्रुक्षयकरं सर्वव्याधिविनाशनं ॥56॥

इदं तु कवचं ज्ञात्वा जपेत्प्रत्यंगिरा ऋचं ।
शतलक्षं प्रजप्त्वापि तस्य विद्या न सिध्यति ॥57॥

मंत्रस्वरूपकवचमेककालं पठेद्यदि ।
भद्रकाळी प्रसन्नात्मा सर्वभीष्टं ददाति हि ॥58॥

महापन्नो महारोगी महाग्रंथ्यादिपीडिने ।
कवचं प्रथमं जप्त्वा पश्चादृग्जपमाचरेत् ॥59॥

पक्षमात्रात् सर्वरोगा नश्यंत्येव हि निश्चयं ।
महाधनप्रदं पुंसां महादुःस्वप्ननाशनं ॥60॥

सर्वमंगळदं नित्यं वांछितार्थफलप्रदं ।
कृत्यादि प्रेषिते ग्रस्ते पुरस्ताज्जुहुयाद्यदि ॥61॥

प्रेषितं प्राप्य झडिति विनाशं प्रददाति हि ।
स्वगृह्योक्तविधानेन प्रतिष्ठाप्य हूताशनं ॥62॥

त्रिकोणकुंडे चावाह्य षोडशैरुपचारतः ।
यो मे करोति मंत्रेण खट् फट् जहीति मंत्रतः ॥63॥

हुनेदयुतमात्रेण यंत्रस्य पुरतो द्विजः ।
क्षणादावेशमाप्नोति भूतग्रस्तकळेबरे ॥64॥

विभीतकमपामार्गं विषवृक्षसमुद्भवं ।
गुळूचीं विकतं कांतमंकोलं निंबवृक्षकं ॥65॥

त्रिकटुं सर्षपं शिग्रुं लशुनं भ्रामकं फलं ।
पंच ऋग्भिः सुसंपाद्य आचार्यसहितः शुचिः ॥66॥

दिनमेक सहस्रं तु हुनेद्ध्यान पुरः सरः ।
सर्वारिष्टः सर्वशांतिः भविष्यति न संशयः ॥67॥

शत्रुकृत्ये चैवमेव हुनेद्यदि समाहितः ।
स शत्रुर्मित्रपुत्रादियुक्तो यमपुरीं व्रजेत् ॥68॥

ब्रह्माऽपि रक्षितुं नैव शक्तिः प्रतिनिवर्तने ।
महत्कार्यसमायोगे एवमेवं समाचरेत् ॥69॥

तत्कार्यं सफलं प्राप्य वांछितान् लभते सुधीः ।
इदं रहस्यं देवेशि मंत्रयुक्तं तवानघे ॥70॥

शिष्याय भक्तियुक्ताय वक्तव्यं नान्यमेव हि ।
निकुंभिळामिंद्रजिता कृतं जय रिपुक्षये ॥71॥

इति श्रीमहालक्ष्मीतंत्रे प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वर संवादे श्री शंकरेण विरचिते श्री प्रत्यंगिरा कवचं॥

अर्थ

श्री प्रत्यंगिरा कवचम् (जगन्मंगळकम) श्री महालक्ष्मी तंत्र में भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को प्रदान किया गया एक अत्यंत शक्तिशाली सुरक्षा कवच है। यह केवल एक कवच नहीं, बल्कि समस्त संसार के लिए मंगलकारी और दिव्य रक्षा का स्रोत है। यह भक्त को सभी दिशाओं से सुरक्षा प्रदान करता है और शत्रु के मंत्र-तंत्र प्रभावों, अपस्मार, कुष्ठ, दरिद्रता, भय, ज्वर, पिशाच प्रभाव, और राक्षसी शक्तियों से मुक्ति दिलाता है। इस कवच का पाठ करने वाले भक्त अजेय हो जाते हैं।

इस कवच का आध्यात्मिक महत्व असीम है। प्रत्यंगिरा देवी दुष्ट शक्तियों, तांत्रिक प्रयोगों और शत्रुओं का नाश करने वाली उग्र देवी हैं। इस कवच का पाठ करने से साधक न केवल बाहरी शत्रुओं और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रहता है, बल्कि उसे आंतरिक भय, रोग और दरिद्रता से भी मुक्ति मिलती है। यह कवच सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने में सक्षम है। इस कवच का प्रत्येक श्लोक देवी के विभिन्न रूपों और उनकी रक्षात्मक शक्ति की स्तुति करता है, जिससे भक्त को सर्वांगीण सुरक्षा प्राप्त होती है।

कवच के प्रारंभिक श्लोकों में (1-7), भगवान शिव इस कवच की महिमा का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि यह शत्रुओं द्वारा भेजे गए कृत्यादि तंत्र, भूत-प्रेत बाधाओं और शत्रु-मंत्रों से रक्षा करता है। यह महाभिचारों का शमन करता है और सभी कार्यों में सफलता प्रदान करता है। यह पुत्र, धन, श्री (समृद्धि) प्रदान करने वाला, पापों का नाश करने वाला, रोगों (क्षय, अपस्मार, कुष्ठ, ज्वर) का निवारण करने वाला और कारागार से मुक्ति दिलाने वाला है। यह राजाओं को वश में करने और विशेष रूप से शत्रुओं का नाश करने में सहायक है। आगे के श्लोकों में (8-10) यंत्र निर्माण की विधि और रक्तपुष्पों से देवी की पूजा का विधान बताया गया है। यह कहा गया है कि इस कवच का एक बार भी पाठ करने से सभी शत्रु भयभीत होकर भाग जाते हैं।

देवी काली, सिंहवाहिनी, कालरात्रि, मायामंत्रस्वरूपिणी आदि विभिन्न रूपों में (13-20) भक्त की सभी दिशाओं से रक्षा करती हैं। श्लोक (21-40) में बताया गया है कि देवी किस प्रकार सिर से पैर तक शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करती हैं - केश, नेत्र, कान, जिह्वा, हृदय, हाथ, नाभि, पैर - प्रत्येक अंग की रक्षा विभिन्न देवियां करती हैं। कवच के अंतिम भाग में (41-70), इसे केवल एक कवच नहीं, बल्कि मंत्र योग सिद्धि का साधन बताया गया है। भूर्जपत्र या स्वर्णपत्र पर इसे लिखकर धारण करने वालों को सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। जप, होम, यज्ञ और यंत्र-आराधना के माध्यम से भक्त विजय, धन और संतान प्राप्त करता है। अंतिम श्लोक (71) में इसे एक महारेहस्य बताया गया है, जिसे केवल भक्ति और श्रद्धा रखने वाले शिष्य को ही बताना चाहिए। यह भी उल्लेख है कि रावण के पुत्र इंद्रजीत ने निकुंभिला यज्ञ में युद्ध विजय के लिए इस कवच का प्रयोग किया था, जो इसकी असाधारण शक्ति को और भी प्रमाणित करता है।

लाभ (Benefits):

  • सर्वांगीण सुरक्षा: भूत, प्रेत, राक्षस और कृत्या प्रभावों के साथ-साथ सभी प्रकार के तांत्रिक हमलों और नकारात्मक ऊर्जा से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है।
  • रोग और शत्रु निवारण: क्षय, अपस्मार, कुष्ठ, ज्वर जैसे महा रोगों और दुर्भाग्य का निवारण करता है, तथा शत्रु दोषों से मुक्ति दिलाता है।
  • धन और संतान वृद्धि: पुत्र संतान, धन-संपत्ति, ऐश्वर्य और समृद्धि प्रदान करता है।
  • विजय और यश: युद्धों, राजसभाओं और मुकदमों में विजय दिलाता है, साथ ही कीर्ति, ज्ञान और सुरक्षा प्रदान करता है।
  • बंधन से मुक्ति: कारागार या किसी भी प्रकार के बंधन से मुक्ति दिलाकर स्वतंत्रता प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री प्रत्यंगिरा कवचम् (जगन्मंगळकम) क्या है?
यह श्री महालक्ष्मी तंत्र में भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को प्रदान किया गया एक अत्यंत शक्तिशाली सुरक्षा कवच है। यह भक्तों को सभी प्रकार के खतरों और नकारात्मक ऊर्जाओं से बचाता है।
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ प्रतिदिन, विशेषकर सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से किया जा सकता है। यंत्र स्थापित करके, रक्तपुष्पों से देवी की पूजा करके पाठ करना अधिक फलदायी होता है।
श्री प्रत्यंगिरा कवचम् का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
यह भूत, प्रेत, राक्षस और कृत्या प्रभावों का नाश करता है। यह रोगों को दूर करता है, शत्रु दोषों का निवारण करता है, पुत्र-धन संपत्ति, ऐश्वर्य और कारागार से मुक्ति प्रदान करता है।
इस कवच का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी व्यक्ति जो श्रद्धा और भक्ति के साथ शुद्ध मन से इस कवच का पाठ करना चाहता है, वह इसे कर सकता है। विशेष रूप से शत्रुओं से पीड़ित, रोगों से ग्रस्त और धन व संतान की इच्छा रखने वाले लोग इसका पाठ कर सकते हैं।
इस कवच का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
प्रतिदिन कम से कम एक बार पाठ करना उत्तम माना जाता है। विशेष फल प्राप्त करने या किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए गुरु के मार्गदर्शन में अधिक बार या निर्धारित संख्या में पाठ किया जा सकता है।
इस कवच का उद्गम या स्रोत क्या है?
यह कवच श्री महालक्ष्मी तंत्र से लिया गया है, जहाँ भगवान शिव ने पार्वती को इस महान रहस्य का उपदेश दिया था। यह भी कहा जाता है कि रावण के पुत्र इंद्रजीत ने युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए इसका उपयोग किया था।

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