ईश्वर उवाच ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि सामृतं त्वत्पुरःसरम्
सहस्रनाम परमं प्रत्यंगिरायाः सिद्धये
सहस्रनामपाठे यः सर्वत्र विजयी भवेत्
पराभवो न चास्यास्ति सभायां वासने रणे
तथा तुष्टा भवेद्देवी प्रत्यंगिरास्य पाठतः
यथा भवति देवेशि साधकः शिव एव हि
अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयस्य कोटयः
सकृत्पातेन जायन्ते प्रसन्ना यत्परा भवेत्
भैरवास्या ऋषिश्छन्दो अनुष्टुप् देवि समीरिता
प्रत्यंगि रा विनियोगः स्यात्सर्वसम्पत्ति हेतवे
सर्वकार्येषु संसिद्धिः सर्वसम्पत्तिदा भवेत्
एवं ध्यात्वा पठेद्देवीं यदीछेदात्मनो हितम्
अथ ध्यानम्
आशाम्बरा मुक्तकचा घनच्छविर्द्येया सचर्मासिकरा
विभूषणा
दंष्णोग्रवक्त्रा ग्रसिताहिता त्वया प्रत्यंगिरा
शङ्करतेजसेरिता
ॐ अस्य श्री प्रत्यंगिरा सहस्रनाममहामन्तस्य
भैरव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीप्रत्यंगिरा देवता,
ह्रीं बीजं, श्रीं शक्तिः, स्वाहा कीलकं
मम सर्वकार्यसिद्द्यर्दे विद्यासिद्ध्यरे नामपारायणे
विनियोगः
ॐ देवी प्रत्यंगिरा सेव्या शिरसा शशिशेखरा |
समाजसमा धर्मिणी च समस्तसुरशेमुषी || 1||
सर्वसम्पत्तिजननी समदा सिन्दु सेविनी |
शम्बुसीमन्तिनी सोमाराध्या च वसुधा रसा || 2 ||
रसा रसवती वेला वन्या च वनमालिनी |
वनजाक्षी वनचरी वनी वनविनोदिनी || 3 ||
वेगिनी वेगदा वेगबला स्थानबलाधिका |
कला कलाप्रिया कौलि कोमला कालकामिनी || 4 ||
कमला कमलास्या च कमलस्ठा कलावती |
कुलीना कुटिला काना कोकिला कुलभाषिणी || 5||
कीरकेलिः कला काली कपालिन्यपि कालिका |
केशिनी च कुशावर्ता कौशाम्बी केशवप्रिया || 6 ||
काशी काशापहा कांशी सज्काशा केशदायिनी |
कुऱ्ऱली कुण्णलीसा च कुऱ्ऱलाज्ञदमणिता || 7 ||
कुशापाशी कुमुदिनी कुमुदप्रीतिवरिनी |
कुन्दप्रिया कुन्दरुचिः कुरज्गमदमोदिनी || 8 ||
कुरज्जनयना कुन्गा कुरुवृन्दाभ नंदिनी|
कुसुमृकुसुमा कीइश्चित्क्वणत्किज्किणिका कटुः |9||
कठोरा करणा कण्ठा कौमुदी कम्भुकण्ठिनी |
कपर्दिनी कपटिनी कठिनी कालकण्ठिका || 10 ||
किब्रुहस्ता कुमारी च कुरुन्दा कुसुमप्रिया |
कुन्जरस्ता कुन्जरता कुम्भिकुम्भस्तनद्वया ||11||
कुम्बिका करभोरुश्च कदलीदलशालिनी |
कुपिता कोटरस्ठा च कज्काली कन्दशेखरा || 12 ||
एकान्तवासिनी किंश्चित्कम्प मानशिरोरुहा |
कादम्बरी कदम्बस्टा कुज्कुमी प्रेमधारिणी || 13 ||
कुटुम्बिनी प्रियायुक्ता क्रतुः क्रतुकरी क्रिया |
कात्यायनी कृत्तिका च कार्तिकेयप्रवर्तिनी || 14 ||
कामपत्नी कामधात्री कामेशी कामवन्दिता |
कामरूपा कामगतिः कामाक्षी काममोहिता || 15||
खड्गिणी खेचरी खङ्ञु खङ्ञुरीटेक्षणा खला |
खरगा खरनासा च खरास्या खेलनप्रिया || 16 ||
खरांशुः खेटिनी खरखट्वांग धारिणी |
खलखण्डिनि विख्यातिः खण्डिता खण्डवी स्थिरा || 17 ||
खण्डप्रिया खण्डखाद्या सेन्दुखण्डा च खङ्ञनी|
गन्गा गोदावरी गौरी गोमत्यापि च गौतमी || 18 ||
गया गौर्गजी गगना गारुडी गरुडध्वजा |
गीता गीतप्रिया गोत्रा गोत्रक्षयकरी गदा || 20 ||
गिरिभूपालदुहिता गोगा गोकुलवर्दिनी |
घनस्तनी घनरुचिर्घनोरुर्घननिःस्वना || 21 ||
घात्कारिणी घातकरी घुघकपरिवारिता |
घण्दानादप्रिया घणा घनाघाटप्रवाहिनी || 22 ||
घोररूपा च घोरा च घनीप्रीति घनाज्ञनी|
घृताची घनमुद्दिश्च घटघणा घटामृता |23|
घटास्या घटानादा च घातपातनिवारिणी |
चंचरीका चकोरी च चामुण्णि चीरधारिणी || 24 ||
चातुरी चपला चारुश्चला चेला चलाचला |
चतुश्चिरन्तना चाका चिया चामीकरच्छविः || 25 ||
चापिनी चपला चम्पूश्चित्तचिन्तामणिश्चिता |
चातुर्वर्ण्यमयी चण्चच्चौरा चापा चमत्कृतिः |26|
चक्रवर्ति वधूश्चक्रा चक्राज्ञा चक्रमोदिनी |
चेतश्चरी चित्तवृत्तिरचेता चेतनाप्रदा || 27 ||
चाम्पेयी चम्पकप्रीतिश्चण्डी चण्डालवासिनी | (चप्रिया
चक्रिका)
चिरंजीवि तदाचित्ता तरुमूलनिवासिनी || 28 ||
छुरिका छत्रमध्य स्ता छिद्रा छेदकरी छिदा |
छुच्छुन्दरीपलप्रीतिः छुन्दरीभनिभस्वना || 29 ||
छलिनी छलवच्चिन्ना छिटिका छेककृत्तथा |
छद्मिनी छान्दनी छाया छायाकृच्छादिरित्यपि || 30||
जया च जयदा जातिजृम्बिणी जामलायुता |
जयापुष्पप्रिया जाया जाप्या जाप्यजगज्जनिः ||31||
जम्भूप्रिया जयस्ठा च जंगमा जंगमप्रिया |
जन्तुर्जन्तु प्रधाना च जरत्कर्णा जरद्गवा || 32 ||
जातीप्रिया जीवनस्ठा जीमूतसदृशच्छविः |
जन्या जनहिता जाया जम्भजम्भिलशालिनी|| 33 ||
जवदा जववद्वाहा जमानी ज्वरहा ज्वरी |
झज्ञा नीलमयी झःझणत्कारकराचला || 34 ||
झिंटीशा झस्यकृत् झुम्ना यमत्रासनिवारिणी |
टंकारस्ता टंज्कधरा टंज्कार कारणा टसी || 35 ||
टकारस्था ठकुरा ठिकृतिश्चैव ठिण्डीरवसनावृता |
ठण्ठा नीलमयी ठण्ठा ठणत्कारकरा ठसा || 36||
डाकिनी डामरा चैव डिण्डिमध्वनिनादिनी |
ढक्काप्रियस्वना ढक्कातपिनी तापिनी तथा || 37 ||
तरुणी तुन्डिला तुन्डा तामसी च तपःप्रिया |
ताम्रा ताम्रांम्बरा ताली तालीदलविभूषणा |38|
तुरज्गा त्वरिता तोता तोतला तादिनी तुला |
तापत्रयहरा तारा तालकेशी तमालिनी || 39 ||
तमालदलवच्चाया तालस्वनवती तमी |
तामसी च तमिस्रा च तीव्रा तीव्र पराक्रमा || 40 ||
तटस्तातिलतैलाक्ता तारिणी तपनद्युतिः |
तिलोत्तमा तिलककृत्तारकाधीशशेखरा || 41 ||
तिलपुष्पप्रिया तारा तारकेशकुटुम्बिनी |
स्थाणुपत्नी स्थितिकरी स्थलस्था स्थलवर्धिनी || 42||
स्थितिस्टैर्या स्थविष्ठा च स्थावतिः स्तूलविग्रहा |
दन्तिनी दण्णिनी दीना दरिद्रा दीनवत्सला || 43 ||
देवी देववधूर्दैत्यदमिनी दन्तभूषणा |
दयावती दमवती दमदा दाडिमस्तनी || 44 ||
दन्दशूकनिभा दैत्यदारिणी देवताआनना |
दोलाक्रीडा दयालुश्च दम्पती देवतामयी || 45 ||
दशा दीपस्थिता दोषा दोषहा दोषकारिणी |
दुर्गा दुर्गार्तिशमनी दुर्गमा दुर्गवासिनी || 46 ||
दुर्गन्दनाशिनी दुःस्टा दुःस्वप्नशमकारिणी |
दुर्वारा दुन्दुभिध्वाना दूरगा दूरवासिनी || 47 ||
दरदा दरहा दात्री दयादा दुहिता दशा |
धुरन्दरा धुरीणा च धौरेयी धनदायिनी || 48 ||
धीरा धीराधरित्री च धर्मदा धीरमानसा |
धनुर्दरा च धमिनी धूर्ता धूर्तपरिग्रहा || 49 ||
धूमवर्णा धूमपाना धूमला धूममोदिनी |
नलिनी नन्दनी नन्दा नलन्दिनी नन्दबालिका || 50 ||
नवीना नर्मदा नर्मी नेमिर्नियमनिश्चया |
निर्मला निगमाचरा निम्नगा नग्निका निमिः ||51||
नाला निरन्तरा निघ्नि निर्लेपा निर्गुणा नतिः |
नीलग्रीवा निरीहा च निर्ंजनजनी नवी || 52 ||
नवनीतप्रिया नारी नरकार्णवतारिणी |
नारायणी निराकारा निपुणा निपुणप्रिया || 53 ||
निशा निद्रा नरेन्द्रस्ता नमिता नमितापि च |
निर्गुण्डिका च निर्गुण्डा निर्मांसा नासिकाभिधा || 54 ||
पताकिनी पताका च पलप्रीतिर्यशश्विनी |
पीना पीनस्तना पत्नी पवनाशनशायिनी || 55 ||
परा पराकला पाका पाककृत्यरतिप्रिया |
पवनस्था सुपवना तापसी प्रीतिवर्धिनी || 56 ||
पशुवृद्दिकरी पुष्टिः पोषणी पुष्पवर्दिनी, |
पुष्पिणी पुस्तककरा पुन्नागतलवासिनी || 57 ||
पुरन्डरप्रिया प्रीतिः पुरमार्गनिवासिनी |
पेशा पाशकरा पाशबन्टहा पांशुलापशुः || 58 ||
पटः पटाशा परशुधारिणी पाशिनी तथा |
पापघ्नि पतिपत्नी च पतिता पतितापि च || 59 II
पिशाची च पिशाचघ्नि पिशिताशनतोषिता |
पानदा पानपात्रा चपानदानकरोद्यता || 60||
पेषा प्रसिद्धिः पीयूषा पूर्णा पूर्णमनोरथा |
पतध्गर्बा पतद्गात्रा पौनःपुण्यपिवापुरा || 61 ||
पंकिला पंकमग्ना च पामीपा पंकरस्थिता |
पंचमा पंचयामा च पंचिता पंचितप्रिया |62|
पंचमुद्रा पुण्डरीका पिंगळा पिंगलोचना |
प्रियजुम्भज्जरी पिण्डी पण्डिता पाण्डुरफ्रभा || 63 ||
प्रेतासना प्रियालुस्था पाण्डुघ्नी पीतसापहा |
फलिनी फलदात्री च फलश्री फणिभूषणा || 64 ||
पूत्का ,स्पारा फुल्ला पुल्लाम्बुजासना |
फिरंगह, स्पीतमतिः स्फितिः स्पीतिकरी तथा || 65||
वनमाया बलरातिर्बलिनी बलवर्दिनी |
वेणुवाद्या वनचरी वीरा बीजमयी अपि | 66 |
विद्या विद्याप्रदा विद्याबोधिनी वेददायिनी |
बुधमाता च बुद्धा च वनमालावती वरा || 67 ||
वरदा वारुणी वीणा वीणावादनतत्परा |
विनोदिनी विनोदस्था वैष्णवी विष्णुवल्लभा || 68 ||
विद्या वैद्यचिकित्सा च विवशा विश्वविश्रुता |
वितन्द्रा विह्वला वेला विरावा विरतिर्वरा || 69 ||
विविधार्ककरा वीरा बिम्बोष्ठी बिम्बवत्सला |
विन्द्यस्था वीरवन्द्या च वरीयानपराचवित् || 70 ||
वेदान्तवेद्या वैद्या च वेदस्य विजयप्रदा |
विरोधवर्दिनी वन्द्या वन्द्याबन्दनिवारिणी || 71 ||
भगिनी भगमाला च भवानी भयभाविनी |
भीमा भीमानना भैमी भज्ञुरा भीमदर्शना || 72 ||
भिल्ली भल्लधरा भीरुर्बेरुण्डी भीर्भयापहा |
भगसर्पिण्यपि भगा भगरूपा भगालया || 73 ||
भगासना भगामोदा भेरी भंकार रंजिता |
भीषणा भीषणारावा भगवत्यपि भूषणा || 74 ||
भारद्वाजी भोगदात्री भवघ्नि भूतिभूषणा |
भूतिदा भूमिदात्री च भूपतित्वप्रदायिनी ||75 ||
भ्रमरी भ्रामरी नीला भूपालमुकुटस्थिता |
मत्ता मनोहरमना मानिनी मोहनी मही || 76||
भामिनी महालक्ष्मीर्मदक्षीबा मदीय मदिरालया |
मदोद्धता मतज्ञस्था माधवी मधुमादिनी || 77 ||
मेधा मेधाकरी मेध्या मध्या मध्यवयस्थिता |
मद्यपा मांसला मत्स्यमोदिनी मैथुनोद्दता |78|
मुद्रा मुद्रावती माता माया महिम मन्डिरा |
महामाया महाविद्या महामारी महेश्वरी |79 |
महादेववधूर्मान्या मधुरा वीरमण्डला |
मेदस्विनी मीलदश्रीर्महिषासुरमर्दिनी || 80 |
मण्डपस्था मठस्टा च मदिरागमगर्विता |
मोक्षदा मुन्डमाला च माला मालाविलासिनी |81|
मातंगिणनी च मातंगी मतंगतनयापि च |
मधुस्रवा मधुरसा मधूककुसुमप्रिया || 82||
यामिनी यामिनीनाथभूषा यावकरंजिता |
यवांकुरप्रिया माया यवनी यवनाधिपा |83|
यमघ्नी यमकन्या च यजमानस्वरूपिणी |
यज्ञ यज्वा यजुर्यज्वा यशोनिकर कारिणी |84|
यज्ञसूत्रप्रदा ज्येष्ठा यज्ञकर्मकरी तथा |
यशस्विनी यकारस्था यूपस्तम्भनिवासिनी || 85 ||
रंजिता राजपत्नी च रमा रेखा रवेरणी |
रजोवती रजश्चित्रा रजनी रजनीपतिः ||86||
रागिणी राज्यनीराज्या राज्यदा राज्यवर्दिनी |
राजन्वती राजनीतिस्तथा रजतवासिनी || 87 ||
रमणी रमणीया च रामा रामावती रतिः |
रेतोवती रतोत्साहा रोगहृद्रोगकारिणी || 88||
रंग रंगवती रागा रागज्ञ रागकृद्रणा |
रंजिका रंजिकारंजि रंजिनि रक्तलोचना || 89 ||
रक्तचर्मधरा रंज्ञा रक्तस्ता रक्तवादिनी |
रम्भा रम्भाफलप्रीति रम्भोरु राघवप्रिया || 90 ||
रंगभृद्रज्ञमधुरा रोदसी रोदसीग्रहा |
रोधकृद्रोधहन्त्री च रोग भृद्रोगशायिनी || 91||
वन्दी वदिस्तुता बन्दा बन्दूककुसुमाधरा |
वन्दीत्रा वन्दितामाता विन्दुरा वैन्दवीविधा || 92||
विज्कि विज्कपला विज्का विज्कस्ट्रा विज्कवत्सला |
वदिर्विलग्ना विप्रा च विधिर्विधिकरी विधा ||93||
शंखिनी शंखवलया शंखमालावती शमी |
शंखपात्राशिनी शंखाशंखा शंखगला शशी || 94 ||
शंवी शरावती श्यामा श्यामांगी, श्यामलोचना |
श्मशानस्था श्मशाना च श्मशानस्थलभूषणा || 95||
शमदा शमहन्त्री च शाकिनी शंखु शेखरा |
शान्ति शान्तप्रदा शेषा शेषष्ठा शेषदायिनी || 96||
शेमुषी शोषिणी शीरिः शौरिः शौर्या शरा शिरिः |
शापहा शापहानीशा शम्पा शपथदायिनी || 97||
शृंगिणी शृंज्ञपलभुक् शंकरी शंकरी चया |
शङ्का शज्कापहा संस्था शाश्वती शीतला शिवा || 98 ||
शिवस्ता शवभुक्ता च शववर्णा शिवोदरी |
शायिनी शावशयना शिंशपा शिशुपालिनी || 99||
शवकुण्डलिनी शैवा शङ्करा शिशिरा शिरा |
शवकाच्ची शवश्रीका शवमाला शवाकृतिः || 100 ||
शयनी शज्कुवा शक्तिः शन्तनुः शीलदायिनी |
सिग्गुः सरस्वती सिन्दुसुन्दरी सुन्दरानना || 101||
साधुः सिद्धिः सिद्धिदात्री सिद्दा सिद्दसरस्वती |
सन्ततिः सम्पदा सम्पत्संवित्सरतिदायिनी || 102||
सपत्नी सरसा सारा सरस्वतिकरी स्वधा |
सरःसमा समाना च समाराध्या समस्तदा || 103||
समिद्दा समदा सम्मा सम्मोहा समदर्शना |
समितिः समिधा सीमा सवित्री सविधा सती || 104 ||
सवता सवनादारा सावना समरा समी |
सिमिरा सतता साध्वी सघ्रीची च सहायिनी || 105||
हंसी हंसगतिर्हंसा हंसोज्ज्वलनिचोलुयुक् |
हलिनी हलदा हाला हरश्रीर्हरवल्लभा||106||
हेला हेलावती हेषा ह्रेषस्ता ह्रेषवर्दिनी |
हन्ता हन्तिर्हता हत्या हाहन्त तापहारिणी ||107 ||
हन्कारी हन्तकृद्दंका हीहा हाता हताहता |
हेमप्रदा हंसवती हारी हातरिसम्मता || 108||
होरी होत्री होलिका च होमो होमो हविर्हरिः |
हारिणी हरिणीनेत्रा हिमाचलनिवासिनी || 109 ||
लम्बोदरी लम्बकर्णा लम्बिका लम्भविग्रहा |
लीला लोलावती लोला ललनी लालिता लता || 110 ||
लोका ललामलोचना लोच्या लोलाक्षी लक्षणा लला |
लमृती लुमती लम्पा लोपामुद्रा ललनिनी |111|
लन्तिका लम्बिका लम्भा लघिमा लघुमध्यमा |
लघीयपसी लघुदयी लूता लूतानिवारिणी |112|
लोमभृल्लो मलोप्ता च लुलुती लुलुसंयती |
लुलायस्था च लहरी लङ्कापुरपुरन्दरी ||113||
लक्ष्मीरक्ष्मीप्रदा लक्ष्म्या लक्ष्माबलमतिप्रधा|
क्षुण्णा क्षुपा क्षणा क्षीणा क्षमा क्षान्तिः क्षणावती || 114||
क्षामा क्षामोदरी क्षीमा क्लैमभृत्जत्रियांगना |
क्षया क्षयकरी क्षीरा क्षीरदा क्षीरसागरा || 115 ||
क्षेमंकरी क्षयकरी क्षयदा क्षणदा क्षतिः |
क्षुरन्ती क्षुद्रिका क्षुद्रा क्षुत्तामा क्षरपातका || 116 ||
|| फलश्रुतिः ||
मातुः सहस्रनामेदं प्रत्यंगिर्या वरप्रदम्
यः पठेत्र्पयतो नित्यं स एव स्यान्महेश्वरः |
अनाचान्तः पठेन्नित्यं दरिद्रो धनदो भवेत् || 1 ||
( यः पठेत्पयतो नित्यं दरिद्रो धनदो भवेत्)
मूकः स्याद्वाक्पतिर्देवि रोगी निरोगतां व्रजेत् |
अपुत्रः पुत्रमाप्नोति त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् || 2 ||
वन्द्यापि सूते तनयान् गावश्च बहुदुग्धदाः |
राजानः पादनम्राः स्युस्तस्यदासा इव स्फुटाः ||3||
अरयः संजयं यान्ति मनसा संस्मृता अपि |
दर्शनादेव जायन्ते नरा नार्योअपि तद्वशाः || 4||
कर्ता हर्ता स्वयंवीरो जायते नात्रसंशयः |
यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् || 5||
दुरितं न च तस्यास्ते नास्ति शोकाः कदाचन |
चतुष्पथेअर्धरात्रे च यः पठेत्साधकोत्तमः || 6 ||
एकाकी निर्भयो धीरो दशावर्तं स्तवोत्तमम् |
मनसा चिन्तितं कार्यं तस्य सिधिर्न संशयः || 7 ||
विना सहस्रनाम्ना यो जपेन्मन्त्रं कदाचन |
न सिद्दो जायते तस्य मन्त्रः कल्पशतैरपि || 8 ||
कुजवारे श्मशाने च मध्यान्हे यो जपेदथ |
शतावर्त्या सर्जयेत कर्ता हर्ता नृणामिह || 9 ||
रोगान्तर्थो निशायान्ते पठितामसि संस्थितः |
सद्यो नीरोगतामेति यदि स्यान्निर्भयस्तदा || 10 ||
अर्धरात्रे श्मशाने वा शनिवारे जपेन्मनुम् |
अष्टोत्तरसहस्रं तद्दशवारं जपेत्ततः || 11 ||
सहस्रनाम चेत्तद्दि तदा याति स्वयं शिवा |
महापवनरूपेण घोरगोमायुनादिनी || 12 ||
तदा यदि न भीतिः स्यात्ततो द्रोहीति वा भवेत् |
तदा पशुबलिं दद्यात्स्वयं गृण्हाति चन्डिका ||13||
यथेष्टं च वरं दत्त्वा याति प्रत्यंगिरा शिवा |
रोचनागुरुकस्तूरी कर्पूरमदचन्दनः || 14 ||
कुन्कुमप्रथमाभ्यां तु लिखितं भूर्जपत्रके |
शुभनक्षत्रयोगे तु कृत्रिमाकृतसत्क्रियः || 15 ||
कृतसम्पातनासिद्दिर्धारयेदक्षिणे करे |
सहस्रनाम स्वर्णस्थं कण्ठे वापी जितेन्द्रियः || 16||
तदा यन्त्रे नमेन्मन्त्री क्रुद्दा सम्म्रियते नरः |
यस्मॆ ददाति यः स्वस्ति स भवेद्दनदोपमः || 17 ||
दुष्टश्वापदजन्तूनां न भीः कुत्रापि जायते |
बालकानामिमां रक्षां गर्भिणीनामपि ध्रुवम् ||18||
मोहनं स्तम्भनाकर्षमारणोच्चाटनानि च |
यन्त्रधारणतो नूनं जायन्ते साधकस्य तु | 19||
नीलवस्त्रे विलिखतं ध्वजायां यदि तिष्ठति |
तदा नष्टा भवत्येव प्रचण्डा परिवाहिनी || 20||
एतज्ञप्तं महाभस्म ललाटे यदि धारयेत् |
तद्दर्शनत एव स्युः प्राणिनस्तस्य किंकराः || 21 ||
राजपत्न्योअपि वशगाः किमन्याः परयोषितः |
एतज्ञप्तं पिबेतोयं मासैकेन महाकविः || 22 ||
पन्डितश्च महादीक्षो जायते नात्र संशयः |
शक्तीं सम्पूज्य देवेशि पठेत्सोत्रं वरं शुभम् ||23|
इह लोके सुखम्बुक्त्वा परत्र त्रिदिवं प्रजेत् |
इति नामसहस्रं तु प्रत्यंगिरा मनोहरम् ||24||
गोप्यं गुप्ततमं लोके गोपनीयं स्वयोनिवत् ||25||
इति श्री रुद्र यामाळ तंत्रे दशविद्या रहस्ये श्री प्रत्यंगिरा सहस्रनाम स्तोत्रं संपूर्णम्
अर्थ
श्री प्रत्यंगिरा सहस्रनाम स्तोत्रं, देवी प्रत्यंगिरा के हजार नामों का एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है, जो देवताओं की शक्ति का प्रतीक है। यह स्तोत्र भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को इसके महत्व और लाभों का वर्णन करते हुए शुरू होता है। भगवान शिव इस स्तोत्र को "अमृत के समान" बताते हैं और कहते हैं कि यह साधकों की सभी इच्छाओं को पूरा करने में, विशेषकर शत्रु-नाश और विजय प्राप्ति के लिए अत्यंत प्रभावी है। यह केवल नामों का संग्रह नहीं, बल्कि देवी के पूर्ण स्वरूप, शक्ति और कृपा का आह्वान करने वाला एक दिव्य मंत्र है।
प्रत्यंगिरा देवी, कालिका देवी के उग्र रूपों में से एक हैं, जो दुष्ट शक्तियों को नष्ट करती हैं, तांत्रिक प्रयोगों को विफल करती हैं और भक्तों को सभी प्रकार की बाधाओं से बचाती हैं। सहस्रनाम का पाठ देवी के विभिन्न गुणों, शक्तियों और अभिव्यक्तियों का स्मरण करके साधक को दिव्य शक्ति के करीब लाता है। प्रत्येक नाम देवी के एक अद्वितीय गुण का प्रतिनिधित्व करता है, और इनके सामूहिक पाठ से साधक के भीतर देवी की दिव्य शक्ति जागृत होती है। यह न केवल बाहरी सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि आंतरिक शुद्धि और आत्म-उत्थान में भी सहायक है।
स्तोत्र के आरंभ में, भगवान शिव कहते हैं, "सहस्रनामपाठे यः सर्वत्र विजयी भवेत्," जिसका अर्थ है कि इस स्तोत्र का पाठ करने वाला सभी क्षेत्रों में विजय प्राप्त करता है। वे यह भी आश्वासन देते हैं कि उसे सभा या युद्धभूमि में कभी पराजय का सामना नहीं करना पड़ेगा। शिव घोषणा करते हैं कि इस स्तोत्र के पाठ से प्रत्यंगिरा देवी संतुष्ट होती हैं और साधक स्वयं शिव के समान हो जाता है। इस स्तोत्र के एक बार के पाठ से हजारों अश्वमेध यज्ञ और करोड़ों वाजपेय यज्ञों के समान फल प्राप्त होता है, जो इसकी महानता पर जोर देता है।
इस स्तोत्र के ऋषि भैरव, छंद अनुष्टुप और देवता श्री प्रत्यंगिरा हैं। इसका विनियोग सभी प्रकार की संपत्ति और सभी कार्यों की सिद्धि के लिए होता है। ध्यान श्लोक में देवी के उग्र और संरक्षक स्वरूप का वर्णन किया गया है: दिगंबरा, खुले केशों वाली, गहन श्याम वर्ण वाली, चर्म और तलवार धारण किए हुए, भयंकर दाँतों वाली, शत्रुओं का भक्षण करने वाली, और भगवान शंकर के तेज से प्रेरित प्रत्यंगिरा देवी का ध्यान करना चाहिए। 'ह्रीं' बीज, 'श्रीं' शक्ति और 'स्वाहा' कीलक के साथ इस सहस्रनाम का पाठ करने से सभी कार्यों में सिद्धि और विद्या में सफलता प्राप्त होती है।
लाभ (Benefits):
- शत्रु नाश और सुरक्षा: प्रत्यंगिरा देवी दुष्ट शक्तियों, तांत्रिक प्रयोगों और शत्रुओं से उत्पन्न होने वाली सभी बाधाओं को पूर्णतः नष्ट करती हैं, और भक्तों को अभेद्य सुरक्षा प्रदान करती हैं।
- सर्वत्र विजय प्राप्ति: इस स्तोत्र के निरंतर पाठ से, साधक जीवन के सभी क्षेत्रों में, सभाओं में, प्रतियोगिताओं में और संघर्षों में विजय प्राप्त करता है।
- धन और समृद्धि: जैसा कि "सर्वसम्पत्ति हेतवे" में कहा गया है, यह स्तोत्र भक्तों को धन, समृद्धि और ऐश्वर्य प्रदान करता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: देवी के हजार नामों का स्मरण करने से साधक का मन शुद्ध होता है, जिससे आत्म-उत्थान और आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि होती है। जैसा कि शिव ने कहा, साधक स्वयं शिव के समान हो जाता है।
- अश्वमेध यज्ञ का फल: इस स्तोत्र के केवल एक बार के पाठ से हजारों अश्वमेध और करोड़ों वाजपेय यज्ञों के समान फल प्राप्त होता है, जो इसकी अतुलनीय महिमा को दर्शाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री प्रत्यंगिरा सहस्रनाम स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री प्रत्यंगिरा सहस्रनाम स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
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