श्री प्रत्यंगिरा आपन्निवारण स्तुतिः
प्रत्यंगिरे महाकृत्ये दुस्तरापन्निवारिणि ।
सकलापन्निवृत्तिं मे सर्वदा कुरु सर्वदे ॥1॥
प्रत्यंगिरे जगन्मातर्जयश्री परमेश्वरि ।
तीव्रदारिद्र्यदुःखं मे क्षिप्रमेव हरांबिके ॥2॥
प्रत्यंगिरे महामाये भीमे भीमपराक्रमे ।
मम शत्रूनशेषांस्त्वं दुष्टान्नाशय नाशय ॥3॥
प्रत्यंगिरे महदेवि ज्वालामालोज्ज्वलानने ।
क्रूरग्रहानशेषान् त्वं दह खादाग्निलोचने ॥4॥
प्रत्यंगिरे महाघोरे परमंत्रांश्च कृत्रिमान् ।
परकृत्या यंत्र तंत्रजालं छेदय छेदय ॥5॥
प्रत्यंगिरे विशालाक्षि परात्परतरे शिवे ।
देहि मे पुत्रपौत्रादि पारंपर्योछ्छ्रितां श्रियं ॥6॥
प्रत्यंगिरे महादुर्गे भोगमोक्षफलप्रदे ।
सकलाभीष्टसिद्धिं मे देहि सर्वेश्वरेश्वरि ॥7॥
प्रत्यंगिरे महादेवि महादेवमनःप्रिये ।
मंगळं मे प्रयच्छाशु मनसा त्वां नमाम्यहं ॥8॥
इति श्री प्रत्यंगिरा आपन्निवारण स्तुतिः ।
अर्थ
श्री प्रत्यंगिरा आपन्निवारण स्तुति एक अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली स्तोत्र है जो भक्तों के सभी प्रकार के कष्टों, खतरों और बाधाओं को दूर करने वाली देवी प्रत्यंगिरा को समर्पित है। प्रत्यंगिरा देवी को अथर्वण भद्रकाली या नरसिंही के रूप में भी जाना जाता है, जो अपनी उग्र और सुरक्षात्मक शक्ति के लिए पूजी जाती हैं। यह स्तोत्र भक्तों द्वारा अनुभव किए जाने वाले भय, गरीबी, शत्रु बाधा, बुरी शक्तियों के प्रभाव और सभी बाधाओं को दूर करने के लिए उनकी कृपा का आह्वान करता है।
इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक प्रत्यंगिरा देवी के विभिन्न रूपों और शक्तियों का वर्णन करता है। उन्हें 'महाकृत्या', 'महामाया', 'महादुर्गा' और 'महादेवी' के रूप में संबोधित किया जाता है, और उनसे सभी प्रकार के खतरों से सुरक्षा, धन, संतान, समृद्धि और अंततः मोक्ष प्रदान करने की प्रार्थना की जाती है। वह जगन्माता, परमेश्वरी और भयंकर शक्ति स्वरूपिणी हैं। इस स्तोत्र का पाठ भक्तों के मन से भय को दूर करता है और उन्हें दिव्य शक्ति और सुरक्षा प्रदान करता है।
प्रत्यंगिरा देवी की कृपा से दरिद्रता, शत्रु, बुरी नज़र, ग्रह दोष और तंत्र-मंत्र के प्रभाव पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। वह अपने दिव्य ज्वाला रूप से असुर शक्तियों को जलाकर भक्तों की रक्षा करती हैं। स्तोत्र में भक्त देवी से धन, संतान, भोग (सांसारिक सुख) और मोक्ष प्रदान करने का अनुरोध करता है। संक्षेप में, यह स्तोत्र प्रत्यंगिरा देवी की अपार करुणामयी शक्ति का आह्वान करने वाली एक शक्तिशाली प्रार्थना है।
प्रत्येक श्लोक का सारांश इस प्रकार है:
- श्लोक 1: 'हे देवी! मेरे सभी संकटों, कठिनाइयों और खतरों को दूर करें।'
- श्लोक 2: 'हे जगन्माता! मेरी तीव्र दरिद्रता और दुखों को शीघ्र ही हर लें और मुझे विजय प्रदान करें।'
- श्लोक 3: 'हे महामाये! मेरे सभी दुष्ट शत्रुओं को पूरी तरह से नष्ट कर दें।'
- श्लोक 4: 'हे महादेवी! अपनी ज्वालाओं से उज्ज्वल मुख और अग्नि के समान नेत्रों से क्रूर ग्रहों के सभी दोषों को जला दें।'
- श्लोक 5: 'हे महाघोरे! शत्रुओं द्वारा किए गए पर-मंत्रों, कृत्रिम प्रयोगों, यंत्रों और तंत्र-जाल को काट दें, काट दें।'
- श्लोक 6: 'हे विशालाक्षि! परात्पर शिवे! मुझे पुत्र, पौत्र आदि की परंपरा से बढ़ी हुई लक्ष्मी प्रदान करें।'
- श्लोक 7: 'हे महादुर्गे! भोग और मोक्ष का फल देने वाली! हे सर्वेश्वरेश्वरी! मुझे सभी अभीष्ट सिद्धियाँ प्रदान करें।'
- श्लोक 8: 'हे महादेवी! महादेव को प्रिय! मैं मन से आपको प्रणाम करता हूँ, मुझे शीघ्र ही मंगल प्रदान करें।'
लाभ (Benefits):
- सभी आपदाओं का निवारण: इस स्तोत्र के निरंतर पाठ से सभी प्रकार के संकटों, परेशानियों और आपदाओं से मुक्ति मिलती है।
- शत्रु नाश और सुरक्षा: दुष्ट शक्तियों, शत्रुओं और नकारात्मक प्रभावों से पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है, और शत्रु नष्ट हो जाते हैं।
- दरिद्रता निवारण और धन: दरिद्रता और दुख दूर होते हैं, धन, संतान सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
- ग्रह दोष और तांत्रिक प्रभावों का निवारण: क्रूर ग्रह दोष, बुरी नजर, जादू-टोना और यंत्र-तंत्र के बुरे प्रभाव समाप्त हो जाते हैं।
- भोग और मोक्ष: यह स्तोत्र सांसारिक सुख (भोग) और अंतिम मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करने की शक्ति रखता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री प्रत्यंगिरा आपन्निवारण स्तुति क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री प्रत्यंगिरा आपन्निवारण स्तुति का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या इतिहास क्या है?
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