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श्री प्रत्यंगिरा खड्गमाला स्तोत्रं

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स्तोत्र
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श्री प्रत्यंगिरा खड्गमाला स्तोत्रं

अस्य श्री अथर्वण भद्रकाळी महा महा प्रत्यंगिरा परमेश्वरि शुद्धशक्ति संबुद्ध्यंत माला महा मंत्रस्य उपस्थेंद्रियाधिष्ठायी वरुणादित्य अंगिरा प्रत्यंगिरा विजय भैरवादि स्वर्णाकर्षणभैरवात्मक ध्यान परिपूर्णानंद पराशिव ऋषिः अनुष्टुप् छंदः महोग्र क्षकार भट्टारक महापीठस्थित महाकालांगनिलया श्री ब्राह्मी नारायणी रौद्री उग्रकृत्या महाकृत्यात्मक अथर्वण भद्रकाळी महा महा प्रत्यंगिरा परमेश्वरी श्रीमाता देवता क्षं बीजं फट् शक्तिः स्वाहा कीलकं श्रीमहाप्रत्यंगिरा खड्गसिद्ध्यर्थे विनियोगः॥

करन्यासः –
क्षां अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
क्षीं तर्जनीभ्यां नमः ।
क्षूं मध्यमाभ्यां नमः ।
क्षैं अनमिकाभ्यां नमः ।
क्षौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
क्षः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः ।

हृदयादिन्यासः –
क्षां हृदयाय नमः ।
क्षीं शिरसे स्वाहा ।
क्षूं शिखायै वषट् ।
क्षैं कवचाय हुं ।
क्षौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।
क्षः अस्त्राय फट् ।

ध्यानं –
आशांबरा मुक्तकचा घनच्छवि-
-र्ध्येया सचर्मासि करा हि भूषणा ।
दंष्ट्रोग्रवक्त्रा ग्रसिता हिता त्वया
प्रत्यंगिरा शंकर तेजसेरिता ॥1॥

सिंहीं सिंहमुखीं सखीं भगवतीं श्रीभैरवस्योल्लसत्
शूल स्थूल कपाल पाश डमरु व्याघ्राग्र हस्तांबुजां ।
दंष्ट्रां कोटि विशंकटास्य कुहरामारक्तनेत्रत्रयां
बालेंदूज्ज्वल मौळिकां भगवतीं प्रत्यंगिरां भावये ॥2॥

पंचपूजा –
लं पृथिव्यात्मिकायै गंधं समर्पयामि ।
हं आकाशात्मिकायै पुष्पैः पूजयामि ।
यं वाय्वात्मिकायै धूपमाघ्रापयामि ।
रं अग्न्यात्मिकायै दीपं दर्शयामि ।
वं अमृतात्मिकायै अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि ।
सं सर्वात्मिकायै सर्वोपचार पूजां समर्पयामि ।

अथ द्विसहस्राक्षरी खड्गमाला मंत्रः –
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं क्ष्म्रौं क्रीं श्रीं लं क्षं हुं फट् स्वाहा॥

ॐ नमो प्रत्यंगिरे हृदयदेवि शिरोदेवि शिखादेवि कवचदेवि नेत्रदेवि अस्त्रदेवि काळि कपालिनि कुल्ले कुरुकुल्ले विरोधिनि विप्रचित्ते उग्रे उग्रप्रभे दीप्ते नीले घने बलाके मात्रे मुद्रे मिते परमात्मिके परमेश्वरपरमेश्वरि अंगिरा प्रत्यंगिरा मयि महादेव्यंबे महादेवानंदमयि त्रिपुरानंदमयि चलच्चित्तानंदमयि चलाचलानंदमयि कुमारानंदमयि क्रोधानंदमयि वरदानंदमयि स्मरदीपानंदमयि श्रीमत्सेनानंदमयि सुधाकरानंदमयि प्रह्लादानंदमयि सनकानंदमयि वसिष्ठानंदमयि भोगानंदमयि मीनानंदमयि गोरक्षकानंदमयि भोजदेवानंदमयि प्रजापत्यानंदमयि मूलदेवानंदमयि रंतिदेवानंदमयि विघ्नेश्वरानंदमयि हुताशनानंदमयि समयानंदमयि संतोषानंदमयि गणेशि दुर्गे वटुकेश्वरि क्षेत्रपालांबे सरस्वति लक्ष्मि शंखनिधे पद्मनिधे क्षेत्रपालेश्वरि अघोरे शरभेश्वरि महासुदर्शनशक्ते ऐंद्रि आग्नेयि याम्ये नैरृत्ये वारुणि वायव्ये कौबेरि ईशानि ब्राह्मि वैष्णवि वास्तुपुरुषमयि वज्रिणि शक्तिनि दंडिनि खड्गिनि पाशिनि अंकुशिनि गदिनि त्रिशूलिनि पद्मिनि चक्रिणि सर्वस्तंभिनि मुद्राशक्ते भूपुरात्मक त्रैलोक्य सर्वसम्मोहन चक्रस्वामिनि नीलकंठभैरवशक्तिसहित जयादि प्रथमाष्टकोटियोगिनीवृंद मयूकावृते ॥1॥

कौलानंदमयि परमाचार्यमयि परमगुरुमयि परमेष्ठि गुरुमयि प्रह्लादनाथमयि सकलानंदनाथमयि कुमारानंदनाथमयि दिव्यौघमयि वसिष्ठानंदनाथमयि क्रोधानंदनाथमयि सुरानंदनाथमयि सिद्धौघमयि ध्यानानंदनाथमयि बोधानंदनाथमयि सुखानंदनाथमयि मानौघमयि सर्वसम्मोहिनी मुद्राशक्ते त्रिवलयरूप गुरुमंडलात्मक सृष्टिचक्रस्वामिनि विश्वरूपभैरवशक्तिसहित प्रेतासनादि द्वितीयाष्टकोटियोगिनीवृंद मयूकावृते ॥2॥

असितांगभैरवि ब्राह्मि रुरुभैरवि महेश्वरि चंडभैरवि कौमारि क्रोधभैरवि वैष्णवि उन्मत्तभैरवि वाराहि कपालभैरवि माहेंद्रि भीषणभैरवि चामुंडे संहारभैरवि नारसिंहि सर्वसंक्षोभिणी मुद्राशक्ते षोडशदळरूप अष्टभैरवशक्तिसहित अष्टमातृकात्मक सर्वाकर्षणचक्रस्वामिनि मेघनाथभैरवशक्तिसहित ऊर्ध्वकेशीत्यादि तृतीयाष्टकोटियोगिनीवृंद मयूकावृते ॥3॥

कामरूप पीठशक्त्यात्मिके मलयगिरि पीठात्मिके कॊल्हागिरि पीठेश्वरि कालांतक पीठशक्ते चौहार पीठांबे जालंधर पीठरूपिणी उड्डियाण पीठस्थिते देवकूट पीठश्रीः सर्वविद्राविणी मुद्राशक्ते अष्टदळग्रंथिस्थानरूप अष्टशक्तिपीठात्मकः अंतर्बहिर्-महाशत्रुसंहारचक्रस्वामिनि गदाधरभैरवशक्तिसहित राक्षसीत्यादि तुरीयाष्टकोटियोगिनीवृंद मयूकावृते ॥4॥

हेतुकभैरवि वेताळभैरवि त्रिपुरांतकभैरवि अग्निजिह्वभैरवि कालांतकभैरवि एकपादभैरवि कपालभैरवि भीमरूपभैरवि मलयभैरवि हाटकेश्वरभैरवि सर्वजृंभिणी मुद्राशक्ते वृत्तमंडलरूप दशभैरवशक्त्यात्मक सर्वस्थूलभेदनचक्रस्वामिनि संहारभैरवशक्तिसहित भैरवीत्यादि पंचमाष्टकोटियोगिनीवृंद मयूकावृते ॥5॥

सर्वस्तंभिनि सर्वसंक्षोभिणि सर्वविद्राविणि सर्वभ्रामिणि सर्वसम्मोदिनि सर्वजृंभिणि सर्वरौद्रिणि सर्वसंहारिणि सर्वबीजमुद्राशक्ते द्विचतुरस्र अष्टयोनिरूप अष्टमुद्राशक्त्यात्मक सर्वसूक्ष्मोच्चाटनचक्रस्वामिनि कुलभैरवशक्तिसहित काळीत्यादि षष्टाष्टकोटियोगिनीवृंद मयूकावृते ॥6॥

हृदयशक्ति वामिनि शिरसशक्ति नीलिनि शिखाशक्ति चक्रिणि कवचशक्ति खड्गिनि नेत्रशक्ति पाशांगि अस्त्रशक्ति कंपिनि सर्वसंहारिणिमुद्राशक्ते षट्कोणरूप षडंगशक्त्यात्मक सर्वलयांगचक्रस्वामिनि त्रिनेत्रभैरवशक्तिसहित केशिन्यादि सप्तमाष्टकोटियोगिनीवृंद मयूकावृते ॥7॥

मधुरकाळि भद्रकाळि नित्यकाळि सर्वयोनिमुद्राशक्ते महायोनिरूप अष्टोत्तरशत महाकाळीशक्त्यात्मक सर्वतिरोधानचक्रस्वामिनि ईशभैरवशक्तिसहित मुंडाग्रधारिणीत्यादि अष्टमाष्टकोटियोगिनीवृंद मयूकावृते ॥8॥

विजयभैरव महावीरशक्ते सर्वाकर्षण भैरवनाथे महाकालकालभैरव प्राणनाडि दक्षिणकाळि भद्रकाळि रुद्रभूकाळि कालकाळि गुह्यकाळि कामकळाकाळि धनकाळि सिद्धिकाळि चंडिकाळि नवकन्यादिरूपे श्रीमच्छ्रीप्रत्यंगिरे वटुकेश्वरि योगिन्यः क्षेत्रपालमयि गणेश सुधामयि द्वादशादित्यमयि एकादशरुद्रमयि सर्वत्रिखंडामुद्राशक्ते शूलिनि कपालिनि डमरुकवति ब्राह्मिप्रत्यंगिरे महाकृत्याप्रत्यंगिरे अक्षमाला कुंडिका पद्म पानपात्र बाण चाप खड्ग चर्म कुलिशदंड गदा शक्ति चक्र पाश त्रिशूलदंड परशु शंखादि सहस्रकोट्यायुधधारिणि शतसहस्रकोटिसिंहासने सहस्रवदने सिंहवक्त्रे ज्वालाजिह्वे कराळदंष्ट्रे अजिते अपराजिते सर्वविघ्ननाशिनि सर्वसंकटनिवारिणि सर्वार्थसु मंत्रसिद्धिप्रदे सर्वदुर्मंत्रविध्वंसिनि परमंत्रोच्चाटिनि परमानुग्रह क्षिप्रप्रसादिनि सर्वानंदपरिपूर्ण शुद्धचैतन्य महामहाज्वलज्ज्वाला महाबिंदुचक्रस्वामिनि महाचतुष्षष्टिकोटिभैरवशक्तिसहित महाचतुष्षष्टिकोटियोगिनीवृंद मयूकावृते ॥9॥

सर्वतंत्रात्मिके सर्वयंत्रात्मिके सर्वमंत्रात्मिके सर्वनादात्मिके सर्वविद्यात्मिके सर्वसर्वात्मिके श्रीशारदे महामहामाये महामहाकाळि महामहामारि महायोगेश्वरि महाकालरात्रि महामोहरात्रि महाकालचक्रमहासाम्राज्ञि महेश्वरमहाकल्पमहातांडवमहासाक्षिणि अखिलांडकोटिब्रह्मांडनायिके महामहाप्रत्यंगिरे नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमः॥

स्वाहा फट् हुं क्षं लं श्रीं क्रीं क्ष्म्रौं क्लीं ह्रीं ऐं ॐ॥

प्रार्थना –
ब्रह्मस्वरूपे ब्रह्मेशि ब्रह्मास्त्रखड्गधारिणि ।
ब्राह्मि प्रत्यंगिरे देवि अव ब्रह्म द्विषो जहि ॥1॥

विष्णुरूपे वैष्णवि चक्रास्त्रखड्गधारिणि ।
नारायणि प्रत्यंगिरे मम शत्रून् विद्वेषय ॥2॥

रुद्रस्वरूपे रुद्रेशि रुद्रास्त्रखड्गधारिणि ।
रौद्रि प्रत्यंगिरे देवि मम शत्रूनुच्चाटय ॥3॥

उग्रस्वरूपे उग्रेशि उग्रास्त्रखड्गधारिणि ।
उग्रकृत्या प्रत्यंगिरे उग्राभिचार्यान्नाशय ॥4॥

अथर्वेशि भद्रकाळि अथर्वखड्गधारिणि ।
महाप्रत्यंगिरे देवि रक्ष मां शरणागतं ॥5॥

महाकृत्ये गौरीश्वरि महास्त्रखड्गधारिणि ।
महाकृत्या प्रत्यंगिरे महाक्षुद्रान् विनाशय ॥6॥

नवनाथावृतात्मिकां षट्त्रिंशत्तत्त्वनायिकां ।
नित्या षोडशिकान् वंदे घटिकावरणोपेतं ॥7॥

तिथि वार नक्षत्रादि योग करण रूपिणीं ।
कालचक्रात्मिकां ध्यायेत् कालस्योल्लासिनीं सदा ॥8॥

या देवि सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥9॥

फलश्रुतिः –
स्मृतिमात्रा हि विद्यैष भोगमोक्षप्रदायिनि ।
सर्वकामरहस्यार्थाः स्मरणात् पापनाशिनि ॥1॥

अपस्मार ज्वर व्याधि मृत्यु क्षामादिजे भये ।
आपत्काले गृहभये व्यसनेष्वाभिचारिके ॥2॥

अन्येष्वपि च दोषेषु मालामंत्रं स्मरेन्नरः ।
सर्वोपद्रवनिर्मुक्तो साक्षात् शिवमयो भवेत् ॥3॥

मालामंत्रमिदं गुह्यं पूर्णानंदप्रकीर्तितं ।
एकवारजपध्यानात् सर्वपूजाफलं लभेत् ॥4॥

सर्वबाधाप्रशमनं धान्यगोत्रधनोच्चयः ।
प्रत्यंगिरा प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥5॥

ब्राह्मी नारायणी रौद्री उग्रकृत्या महाकृतिः ।
भद्रकाळ्यः प्रसादेन सर्वत्र विजयी भवेत् ॥6॥

इति श्री प्रत्यंगिरा खड्गमाला स्तोत्रं॥

अर्थ

श्री प्रत्यंगिरा खड्गमाला स्तोत्रं भद्रकाली के उग्र रूप, श्री प्रत्यंगिरा परमेश्वरी को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और सुरक्षात्मक माला मंत्र है। 'खड्गमाला' का अर्थ है तलवारों की माला, जो देवी की विभिन्न शक्तियों को अस्त्रों के रूप में आह्वान कर भक्तों को हर प्रकार की सुरक्षा प्रदान करती है। अथर्वण भद्रकाली परंपरा से उद्भूत यह स्तोत्र, शत्रु विनाश, रोग निवारण, दुष्ट शक्तियों के उन्मूलन और सभी आपदाओं से मुक्ति दिलाने की अद्भुत शक्ति रखता है। इस स्तोत्र का प्रत्येक मंत्र देवी के एक शक्ति रूप का प्रतिनिधित्व करता है, जो साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा कवच का निर्माण करता है।

इस स्तोत्र का गहरा आध्यात्मिक महत्व यह है कि यह केवल बाहरी शत्रुओं से ही रक्षा नहीं करता, बल्कि हमारे भीतर के अज्ञान, अहंकार और नकारात्मक गुणों को भी नष्ट करता है। प्रत्यंगिरा देवी यद्यपि उग्र रूप में प्रकट होती हैं, फिर भी वे भक्तों पर अपार करुणा रखती हैं। देवी का 'क्षं' बीजाक्षर मंत्र सभी पापों का नाश कर ज्ञान और मुक्ति प्रदान करता है। न्यास, ध्यान, पंचपूजा और खड्गमाला मंत्र पाठ जैसी विधियाँ शरीर, मन और आत्मा को शुद्ध करके, दिव्य शक्ति से संबंध स्थापित करने में सहायता करती हैं। यह केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि देवी के साक्षात् दर्शन के लिए मार्गदर्शक एक पूर्ण साधना पद्धति है।

स्तोत्र के आरंभ में करन्यास और हृदयादि षडंगन्यास का वर्णन किया गया है। ये शरीर के विभिन्न अंगों पर देवी की शक्ति का आह्वान करके, शरीर को दैवीय शक्ति के लिए तैयार करते हैं और सुरक्षात्मक रूप से मजबूत बनाते हैं। इसके बाद का ध्यान भाग देवी के उग्र और भव्य रूप को मन में स्थापित करने में सहायक होता है, जो साधक में दृढ़ संकल्प और निर्भयता भरता है। पंचपूजा (गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) देवी को भक्तिपूर्वक अर्पित की जाने वाली सेवा है, जो पूजा की पवित्रता बढ़ाती है। खड्गमाला मंत्र पाठ देवी के विभिन्न नामों का आह्वान करता है, जहाँ प्रत्येक नाम एक सुरक्षात्मक शक्ति के रूप में कार्य करता है।

इस स्तोत्र में शरीर के विभिन्न अंगों (सिर, कंठ, हृदय, हाथ-पैर) पर विशिष्ट देवता शक्तियों को स्थापित करके एक आध्यात्मिक रक्षा कवच बनाया जाता है। यह साधक को सभी दिशाओं से सुरक्षित रखता है। अघोर मंत्रों, तंत्र बाधाओं, जादुई शक्तियों और अन्य अनिष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए यह स्तोत्र विशेष रूप से प्रभावी है। निरंतर पाठ से मानसिक स्थिरता, आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह केवल सुरक्षात्मक नहीं, बल्कि समृद्धि, स्वास्थ्य और सौभाग्य प्रदान करने की शक्ति भी रखता है।

लाभ (Benefits):

  • शत्रु नाश और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति: बाहरी शत्रुओं, अनिष्ट शक्तियों, और तांत्रिक प्रयोगों से पूर्ण सुरक्षा मिलती है।
  • रोगों से मुक्ति और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति: दीर्घकालीन और असाध्य रोग दूर होते हैं, तथा उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु प्राप्त होती है।
  • तंत्र-मंत्र बाधाओं का निवारण: किसी भी प्रकार के तंत्र-मंत्र प्रयोग, बुरी नज़र और ग्रह बाधाओं से पूर्ण मुक्ति मिलती है।
  • मानसिक शांति और स्थिरता: भय, चिंता और तनाव दूर होकर मन को शांति, स्थिरता और साहस प्राप्त होता है।
  • धन-संपत्ति और पारिवारिक सुरक्षा: आर्थिक संकट दूर होते हैं, धन-संपत्ति में वृद्धि होती है, और परिवार में सामंजस्य तथा सुरक्षा बनी रहती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति और साधना में सफलता: आध्यात्मिक साधना में आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं, और देवी की कृपा से महान अनुभूति एवं प्रगति प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री प्रत्यंगिरा खड्गमाला स्तोत्रं क्या है?
यह भद्रकाली के उग्र रूप, देवी प्रत्यंगिरा को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली सुरक्षात्मक स्तोत्र है। 'खड्गमाला' का अर्थ है मंत्रों की एक माला जो देवी की शक्तियों को अस्त्रों के रूप में आह्वान करती है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
स्नान कर शुद्ध होकर, न्यास, ध्यान और पंचपूजा के साथ प्रतिदिन इसका पाठ करना उत्तम है। विशेष संकटों में या संकल्पपूर्वक अधिक बार भी इसका पाठ किया जा सकता है।
श्री प्रत्यंगिरा खड्गमाला स्तोत्र के मुख्य लाभ क्या हैं?
यह शत्रुओं, दुष्ट शक्तियों, रोगों और तंत्र-मंत्र बाधाओं से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, यह मानसिक शांति, आर्थिक स्थिरता और आध्यात्मिक प्रगति भी प्रदान करता है।
प्रत्यंगिरा देवी कौन हैं और इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
प्रत्यंगिरा देवी दिव्य माँ का एक उग्र और सुरक्षात्मक रूप हैं। जो लोग गंभीर संकट में हैं, शत्रु बाधा से पीड़ित हैं, बुरी शक्तियों से रक्षा चाहते हैं, या आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करना चाहते हैं, वे इसका पाठ कर सकते हैं, संभव हो तो गुरु के मार्गदर्शन में।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः प्रतिदिन एक बार पाठ किया जा सकता है। विशिष्ट उद्देश्यों या साधना के भाग के रूप में इसे 16, 108 या 1008 बार भी पढ़ा जा सकता है, जो आपके संकल्प और क्षमता पर निर्भर करता है।
इस स्तोत्र का मूल या उत्पत्ति क्या है?
यह स्तोत्र अथर्वण वेद परंपरा से आता है, विशेष रूप से अथर्वण भद्रकाली महा प्रत्यंगिरा परमेश्वरी से संबंधित है।

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