श्री सुब्रह्मण्य वज्रपंजर कवचं
अस्य श्री सुब्रह्मण्य कवचस्तोत्र महामंत्रस्य अगस्त्यो भगवान् ऋषिः, अनुष्टुप्छंदः श्री सुब्रह्मण्यो देवता, सं बीजं, स्वाहा शक्तिः, सः कीलकं, श्री सुब्रह्मण्यप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः |
न्यासः –
हिरण्यशरीराय अंगुष्ठाभ्यां नमः |
इक्षुधनुर्धराय तर्जनीभ्यां नमः |
शरवणभवाय मध्यमाभ्यां नमः |
शिखिवाहनाय अनामिकाभ्यां नमः |
शक्तिहस्ताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
सकलदुरितमोचनाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |
एवं हृदयादि न्यासः ||
ध्यानं |
कनककुंडलमंडितषण्मुखं
वनजराजि विराजित लोचनं |
निशित शस्त्रशरासनधारिणं
शरवणोद्भवमीशसुतं भजे ||
लमित्यादि पंचपूजा कुर्यात् |
अगस्त्य उवाच |
स्कंदस्य कवचं दिव्यं नाना रक्षाकरं परं |
पुरा पिनाकिना प्रोक्तं ब्रह्मणोऽनंतशक्तये || 1 ||
तदहं संप्रवक्ष्यामि भद्रं ते शृणु नारद |
अस्ति गुह्यं महापुण्यं सर्वप्राणि प्रियंकरं || 2 ||
जपमात्रेण पापघ्नं सर्वकामफलप्रदं |
मंत्रप्राणमिदं ज्ञेयं सर्वविद्यादिकारकं || 3 ||
स्कंदस्य कवचं दिव्यं पठनाद्व्याधिनाशनं |
पिशाच घोरभूतानां स्मरणादेव शांतिदं || 4 ||
पठितं स्कंदकवचं श्रद्धयानन्यचेतसा |
तेषां दारिद्र्यदुरितं न कदाचिद्भविष्यति || 5 ||
भूयः साम्राज्यसंसिद्धिरंते कैवल्यमक्षयं |
दीर्घायुष्यं भवेत्तस्य स्कंदे भक्तिश्च जायते || 6 ||
अथ कवचं |
शिखां रक्षेत्कुमारस्तु कार्तिकेयः शिरोऽवतु |
ललाटं पार्वतीसूनुः विशाखो भ्रूयुगं मम || 7 ||
लोचने क्रौंचभेदी च नासिकां शिखिवाहनः |
कर्णद्वयं शक्तिधरः कर्णमूलं षडाननः || 8 ||
गंडयुग्मं महासेनः कपोलौ तारकांतकः |
ओष्ठद्वयं च सेनानीः रसनां शिखिवाहनः || 9 ||
तालू कळानिधिः पातु दंतां देवशिखामणिः |
गांगेयश्चुबुकं पातु मुखं पातु शरोद्भवः || 10 ||
हनू हरसुतः पातु कंठं कारुण्यवारिधिः |
स्कंधावुमासुतः पातु बाहुलेयो भुजद्वयं || 11 ||
बाहू भवेद्भवः पातु स्तनौ पातु महोरगः |
मध्यं जगद्विभुः पातु नाभिं द्वादशलोचनः || 12 ||
कटिं द्विषड्भुजः पातु गुह्यं गंगासुतोऽवतु |
जघनं जाह्नवीसूनुः पृष्ठभागं परंतपः || 13 ||
ऊरू रक्षेदुमापुत्रः जानुयुग्मं जगद्धरः |
जंघे पातु जगत्पूज्यः गुल्फौ पातु महाबलः || 14 ||
पादौ पातु परंज्योतिः सर्वांगं कुक्कुटध्वजः |
ऊर्ध्वं पातु महोदारः अधस्तात्पातु शांकरिः || 15 ||
पार्श्वयोः पातु शत्रुघ्नः सर्वदा पातु शाश्वतः |
प्रातः पातु परं ब्रह्म मध्याह्ने युद्धकौशलः || 16 ||
अपराह्ने गुहः पातु रात्रौ दैत्यांतकोऽवतु |
त्रिसंध्यं तु त्रिकालज्ञः अंतस्थं पात्वरिंदमः || 17 ||
बहिस्थितं पातु खढ्गी निषण्णं कृत्तिकासुतः |
व्रजंतं प्रथमाधीशः तिष्ठंतं पातु पाशभृत् || 18 ||
शयने पातु मां शूरः मार्गे मां पातु शूरजित् |
उग्रारण्ये वज्रधरः सदा रक्षतु मां वटुः || 19 ||
फलशृतिः |
सुब्रह्मण्यस्य कवचं धर्मकामार्थमोक्षदं |
मंत्राणां परमं मंत्रं रहस्यं सर्वदेहिनां || 20 ||
सर्वरोगप्रशमनं सर्वव्याधिविनाशनं |
सर्वपुण्यप्रदं दिव्यं सुभगैश्वर्यवर्धनं || 21 ||
सर्वत्र शुभदं नित्यं यः पठेद्वज्रपंजरं |
सुब्रह्मण्यः सुसंप्रीतो वांछितार्थान् प्रयच्छति |
देहांते मुक्तिमाप्नोति स्कंदवर्मानुभावतः || 22 ||
इति स्कांदे अगस्त्यनारदसंवादे सुब्रह्मण्य कवचं |
अर्थ
'श्री सुब्रह्मण्य वज्रपंजर कवचम्' भगवान शिव द्वारा स्वयं महर्षि अगस्त्य को उपदिष्ट एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली कवच है। यह भगवान सुब्रह्मण्य की शक्ति, ज्ञान, करुणा और संरक्षण शक्तियों का ध्यान करते हुए भक्त के पूरे शरीर, मन और जीवन को दिव्य कवच के रूप में सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया है। इस कवच का पाठ करने से भक्त भगवान सुब्रह्मण्य की निरंतर कृपा और सुरक्षा का पात्र बनता है।
यह दिव्य कवच भगवान सुब्रह्मण्य के विभिन्न रूपों और शक्तियों को शरीर के प्रत्येक अंग को सौंपकर उसकी रक्षा करता है। उदाहरण के लिए, षण्मुख, कार्तिकेय, विशाख, क्रौंचभेदी, तारकान्तक, सेनानी जैसे रूप भक्त के सिर से पैर तक प्रत्येक अवयव की रक्षा करते हैं। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली कवच है जो भक्त को स्वामी की दिव्य शक्ति से पूरी तरह से घेर लेता है। इस कवच के माध्यम से, भक्त सुब्रह्मण्य के शौर्य, ज्ञान और अद्वितीय संरक्षण क्षमता के साथ एकाकार हो जाता है।
वज्रपंजर कवच का पाठ केवल शारीरिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और मानसिक शुद्धि भी प्रदान करता है। इसके निरंतर जप से संचित पाप नष्ट होते हैं, नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती हैं और दुष्ट शक्तियों से उत्पन्न होने वाली बाधाएं समाप्त होती हैं। यह भक्त के मन में शांति, धैर्य और स्थिरता भरता है, किसी भी प्रकार के भय या चिंता को दूर करता है। रोग, ग्रह बाधाएं, भूत-प्रेत बाधाएं इस कवच की शक्ति के सामने टिक नहीं पातीं, और यह भक्त को उत्तम स्वास्थ्य तथा दीर्घायु प्रदान करता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि इस कवच का नियमित पाठ करने वाले भक्तों को राजयोग, ऐश्वर्य, कीर्ति और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। यह दरिद्रता का नाश कर समृद्धि लाता है और सभी प्रयासों में सफलता प्रदान करता है। अंततः, इस कवच का निरंतर पाठ भक्त को भगवान सुब्रह्मण्य के सान्निध्य में ले जाता है, जीवन के अंत में स्कंदसायुज्य (मोक्ष) की प्राप्ति कराता है। यह केवल एक रक्षा कवच नहीं, बल्कि भक्त को आध्यात्मिक उत्थान और मोक्ष की ओर मार्गदर्शन करने वाला एक दिव्य साधन है।
लाभ (Benefits):
- पापों का नाश और नकारात्मकता का उन्मूलन: इस कवच के पाठ से पूर्व जन्मों के पाप नष्ट होते हैं और नकारात्मक ऊर्जाओं तथा दुष्ट प्रभावों से मुक्ति मिलती है।
- उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और साहस की प्राप्ति: यह सभी प्रकार के रोगों को ठीक करता है, शरीर को शक्ति और मन को धैर्य प्रदान करता है, दीर्घायु प्रदान करता है।
- धन, ऐश्वर्य, यश और सभी कार्यों में सफलता: कवच का नियमित पाठ करने से धन, कीर्ति, प्रतिष्ठा और सभी कार्यों में विजय प्राप्त होती है, राजयोग का फल मिलता है।
- शत्रु भय से मुक्ति और बुरी शक्तियों से रक्षा: शत्रुओं से होने वाली परेशानियां, भूत-प्रेत बाधाएं और दुष्ट शक्तियों से पूर्ण सुरक्षा मिलती है।
- अंततः मोक्ष और स्कंद लोक की प्राप्ति: इस कवच के निरंतर पाठ से भक्त आध्यात्मिक रूप से उन्नत होता है और जीवन के अंत में भगवान सुब्रह्मण्य के सान्निध्य (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री सुब्रह्मण्य वज्रपंजर कवचम् क्या है?
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
श्री सुब्रह्मण्य वज्रपंजर कवचम् का पाठ किसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस कवच का उद्गम क्या है?
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