गुह पंचरत्नं
ओंकारनगरस्थं तं निगमांतवनेश्वरं |
नित्यमेकं शिवं शांतं वंदे गुहमुमासुतं || 1 ||
वाचामगोचरं स्कंदं चिदुद्यानविहारिणं |
गुरुमूर्तिं महेशानं वंदे गुहमुमासुतं || 2 ||
सच्चिदनंदरूपेशं संसारध्वांतदीपकं |
सुब्रह्मण्यमनाद्यंतं वंदे गुहमुमासुतं || 3 ||
स्वामिनाथं दयासिंधुं भवाब्धेः तारकं प्रभुं |
निष्कळंकं गुणातीतं वंदे गुहमुमासुतं || 4 ||
निराकारं निराधारं निर्विकारं निरामयं |
निर्द्वंद्वं च निरालंबं वंदे गुहमुमासुतं || 5 ||
इति गुहपंचरत्नं ||
अर्थ
श्री गुह पंचरत्नम स्तोत्र भगवान सुब्रमण्य स्वामी को समर्पित पाँच अनमोल श्लोकों का एक संग्रह है। 'गुह' शब्द का अर्थ है 'गुह्य' या 'हृदय की गुफा में निवास करने वाला'। यह स्तोत्र भगवान कार्तिकेय को केवल एक बाहरी देवता के रूप में ही नहीं, बल्कि हम सभी के भीतर निवास करने वाले परम सत्य, ज्ञान और आनंद के स्वरूप के रूप में वर्णित करता है। यह भक्तों को बाहरी पूजा से आंतरिक आत्म-अनुभूति की ओर ले जाने में सहायता करता है, उन्हें भगवान को अपने ही आत्म-स्वरूप के रूप में अनुभव करने के लिए प्रेरित करता है।
पहला श्लोक ॐकार नगर में स्थित, वेदों के सार, नित्य, एक, शिव और शांत स्वरूप, उमासुत भगवान गुह को नमस्कार करता है। यह सुब्रमण्य को परब्रह्म के रूप में, सभी शास्त्रों के मूल और सभी शांति के प्रतीक के रूप में पहचानता है। दूसरा श्लोक वाणी से परे, चिदानंद के उद्यान में विचरण करने वाले, गुरुमूर्ति, महेश के पुत्र स्कंद की स्तुति करता है। यह भगवान सुब्रमण्य को परम गुरु के रूप में चित्रित करता है, जो अज्ञानता को दूर कर ज्ञान प्रदान करते हैं।
तीसरे श्लोक में, सच्चिदानंद स्वरूप, संसार के अंधकार को दूर करने वाले दीपक, आदि-अंत रहित सुब्रमण्य स्वामी को नमस्कार किया जाता है। यह भगवान को सत् (अस्तित्व), चित् (चेतना), आनंद (परमानंद) के रूप में वर्णित करता है, जो हमारे अज्ञान को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं। चौथा श्लोक दया के सागर, भवसागर से तारने वाले, निष्कलंक और गुणातीत प्रभु स्वामिनाथ को वंदन करता है। यह भगवान मुरुगा को करुणामय, संसार के बंधनों से मुक्ति दिलाने वाले और सभी गुणों से परे के रूप में महिमामंडित करता है।
अंत में, पाँचवाँ श्लोक निराकार, निराधार, निर्विकार, निर्मल, निर्द्वंद्व और निरालंब भगवान गुह को सदा नमस्कार करता है। यह भगवान के निर्गुण स्वरूप को उजागर करता है – एक परम आत्मा जो किसी भी आकार, आधार, विकार या द्वंद्व से रहित और स्वतंत्र है। ये पाँच रत्न भगवान सुब्रमण्य की महिमा का संक्षेप में, फिर भी गहराई से वर्णन करते हैं, भक्तों को उनके दिव्य स्वरूप का एक व्यापक दर्शन प्रदान करते हैं।
लाभ (Benefits):
- मानसिक शांति और स्पष्टता: इस स्तोत्र का पाठ मन को शांत करता है, आंतरिक भ्रम को दूर कर स्पष्ट सोच में सहायक होता है।
- ज्ञान और बुद्धि: चूंकि भगवान सुब्रमण्य ज्ञान के अधिष्ठाता देव हैं, इस स्तोत्र का पाठ करने से बुद्धि बढ़ती है और आध्यात्मिक समझ गहरी होती है।
- बाधाओं का निवारण: माना जाता है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों, बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्राप्त होती है।
- मोक्ष प्राप्ति में सहायक: भगवान को आत्म-स्वरूप के रूप में अनुभव करने के लिए प्रेरित करने से, यह भवबंधनों से मुक्ति और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायक होता है।
- आंतरिक शक्ति और साहस: इस स्तोत्र का नियमित पाठ आंतरिक शक्ति को बढ़ाता है, चुनौतियों का सामना करने के लिए साहस प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री गुह पंचरत्नम स्तोत्र क्या है?
गुह पंचरत्नम स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री गुह पंचरत्नम के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
श्री गुह पंचरत्नम स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री गुह पंचरत्नम स्तोत्र का उद्गम क्या है?
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