श्री कार्तिकेय करावलंब स्तोत्रं
ओंकाररूप शरणाश्रय शर्वसूनो
सिंगार वेल सकलेश्वर दीनबंधो |
संतापनाशन सनातन शक्तिहस्त
श्रीकार्तिकेय मम देहि करावलंबं || 1 ||
पंचाद्रिवास सहजा सुरसैन्यनाथ
पंचामृतप्रिय गुह सकलाधिवास |
गंगेंदु मौळि तनय मयिल्वाहनस्थ
श्रीकार्तिकेय मम देहि करावलंबं || 2 ||
आपद्विनाशक कुमारक चारुमूर्ते
तापत्रयांतक दायापर तारकारे |
आर्ताऽभयप्रद गुणत्रय भव्यराशे
श्रीकार्तिकेय मम देहि करावलंबं || 3 ||
वल्लीपते सुकृतदायक पुण्यमूर्ते
स्वर्लोकनाथ परिसेवित शंभु सूनो |
त्रैलोक्यनायक षडानन भूतपाद
श्रीकार्तिकेय मम देहि करावलंबं || 4 ||
ज्ञानस्वरूप सकलात्मक वेदवेद्य
ज्ञानप्रियाऽखिलदुरंत महावनघ्ने |
दीनवनप्रिय निरमय दानसिंधो
श्रीकार्तिकेय मम देहि करावलंबं || 5 ||
इति श्री कार्तिकेय करावलंब स्तोत्रं |
अर्थ
श्री कार्तिकेय करावलंब स्तोत्रं भगवान सुब्रह्मण्यम (कार्तिकेय) को समर्पित एक अत्यंत भक्तिपूर्ण प्रार्थना है। 'करावलंब' का अर्थ है 'हाथ पकड़कर ऊपर उठाना'। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि वह उसे जीवन के दुखों के सागर से अपने करुणापूर्ण हाथों से उठाकर बचाएं। यह केवल भौतिक कष्टों से मुक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अज्ञान से बाहर निकलने और ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ने में भी सहायक है। यह प्राचीन काल से भक्तों द्वारा अपनी कठिनाइयों को दूर करने और दिव्य आश्रय प्राप्त करने के लिए पाठ किया जाने वाला एक पवित्र स्तोत्र है।
यह स्तोत्र भक्त के पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। इसमें यह भावना प्रमुख है कि भगवान की दया ही एकमात्र सहारा है, और भक्त अपने अहंकार का त्याग कर, दिव्य हस्तक्षेप के लिए प्रार्थना करता है। प्रत्येक श्लोक में भगवान सुब्रह्मण्यम के विभिन्न नामों, गुणों और शक्तियों की स्तुति करते हुए, उन्हें दुख-निवारक, ज्ञानमूर्ति और दयासागर के रूप में आह्वान किया जाता है। यह स्तोत्र जीवन की चुनौतियों, भय और दुखों से मुक्ति पाने के लिए एक सेतु का काम करता है, भक्तों में साहस और विश्वास भरता है।
स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक कार्तिकेय के अद्भुत गुणों का वर्णन करता है। पहला श्लोक भगवान कार्तिकेय को ॐकार स्वरूप, पापों से शरण मांगने वालों को आश्रय देने वाले, दुखों को नष्ट करने वाले शक्तिहस्त के रूप में वर्णित करता है। 'ॐ' ब्रह्मांड की मूल ध्वनि है, और कार्तिकेय उस परम सत्य के प्रतिनिधि हैं। दूसरे श्लोक में, उन्हें पंचाद्रि पहाड़ियों में निवास करने वाले, देव सेनापति, पंचामृत प्रिय, गंगाधर के पुत्र, मोर पर विराजमान गुहस्वरूप के रूप में स्तुति की गई है। ये सभी उनके दिव्य गुणों और शक्तियों को उजागर करते हैं।
तीसरा श्लोक उन्हें आपदाओं का नाश करने वाले कुमार, तीनों तापों (आधिदैविक, आध्यात्मिक, आधिभौतिक) को नष्ट करने वाले करुणामय, तारकासुर का संहार करने वाले और त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) के स्वरूप के रूप में स्तुति करता है। चौथा श्लोक उन्हें वल्ली देवी के पति, पुण्यमूर्ति, देवलोक में पूजे जाने वाले शिवपुत्र, त्रिलोकों के स्वामी और षडानन (छह मुख वाले) स्वामी के रूप में पूजता है। उनके छह मुख उनके सर्वव्यापी ज्ञान और शक्ति के प्रतीक हैं। अंतिम श्लोक में, भगवान कार्तिकेय से ज्ञानस्वरूप, वेदों के सार, ज्ञानप्रिय, भयंकर पापों को नष्ट करने वाले दयासिंधु और दीनबंधु के रूप में प्रार्थना की जाती है। प्रत्येक श्लोक के अंत में आने वाला 'श्री कार्तिकेय मम देहि करावलंबं' भक्त की गहन सहायता की पुकार का प्रतिनिधित्व करता है, 'हे देव! मुझे अपनी करुणा से ऊपर उठाओ' कहकर भगवान से विनती करता है।
लाभ (Benefits):
- दुःख निवारण: इस स्तोत्र का पाठ करने से जीवन के कष्टों, चिंताओं और मानसिक पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है। भगवान कार्तिकेय भक्तों के दुखों को दूर कर शांति प्रदान करते हैं।
- रक्षा और साहस: भगवान कार्तिकेय अपने भक्तों को सभी आपदाओं से बचाते हैं, भय को दूर करते हैं और साहस व आत्मविश्वास भरते हैं। यह बाधाओं को दूर करने में सहायक है।
- ज्ञान वृद्धि: स्तोत्र कार्तिकेय को ज्ञान स्वरूप वर्णित करता है, इसलिए इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने वालों को ज्ञान और विवेक की वृद्धि होती है। छात्रों को बेहतर परिणाम मिलते हैं।
- शत्रु संहार: तारकासुर का संहार करने वाले कार्तिकेय की कृपा से आंतरिक (अज्ञान, अहंकार) और बाहरी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में मदद मिलती है। यह विवादों से मुक्ति दिलाता है।
- आध्यात्मिक प्रगति: यह स्तोत्र भक्त को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाता है और मोक्ष प्राप्ति में सहायक होता है। यह भगवान के साथ गहरा संबंध स्थापित करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री कार्तिकेय करावलंब स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
यह स्तोत्र कौन पाठ कर सकता है?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या इतिहास क्या है?
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