श्री कार्तिकेय पंचकं
विमलनिजपदाब्जं वेदवेदांतवेद्यं
मम कुलगुरुनाथं वाद्यगानप्रमोदं |
रमणसुगुणजालं रंगराड्भागिनेयं
कमलजनुतपादं कार्तिकेयं नमामि || 1 ||
शिवशरवणजातं शैवयोगप्रभावं
भवहितगुरुनाथं भक्तबृंदप्रमोदं |
नवरसमृदुपादं नाथ ह्रींकाररूपं
कवनमधुरसारं कार्तिकेयं भजामि || 2 ||
पाकारातिसुतामुखाब्जमधुपं बालेंदुमौळीश्वरं
लोकानुग्रहकारणं शिवसुतं लोकेशतत्त्वप्रदं |
राकाचंद्रसमानचारुवदनं रंभोरुवल्लीश्वरं
ह्रींकारप्रणवस्वरूपलहरीं श्रीकार्तिकेयं भजे || 3 ||
महादेवाज्जातं शरवणभवं मंत्रशरभं
महत्तत्त्वानंदं परमलहरी मंत्रमधुरं |
महादेवातीतं सुरगणयुतं मंत्रवरदं
गुहं वल्लीनाथं मम हृदि भजे गृध्रगिरिशं || 4 ||
नित्याकारं निखिलवरदं निर्मलं ब्रह्मतत्त्वं
नित्यं देवैर्विनुतचरणं निर्विकल्पादियोगं |
नित्यानंदं निगमविदितं निर्गुणं देवदेवं
नित्यं वंदे मम गुरुवरं निर्ममं कार्तिकेयं || 5 ||
पंचकं कार्तिकेयस्य यः पठेच्छृणुयादपि |
कार्तिकेय प्रसादात्स सर्वाभीष्टमवाप्नुयात् || 6 ||
इति श्री कार्तिकेय पंचकं ||
अर्थ
श्री कार्तिकेय पंचकं भगवान सुब्रह्मण्य स्वामी को समर्पित पाँच दिव्य श्लोकों का एक अत्यंत पवित्र संग्रह है। भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय, जिन्हें स्कंद, मुरुगन और षडानन के नाम से भी जाना जाता है, ज्ञान, वीरता, भक्ति और दिव्य शक्ति के प्रतीक हैं। यह पंचकं भक्तों के मन में भगवान कार्तिकेय के दिव्य स्वरूप को चित्रित करता है, उनके गुणों का गुणगान करता है और उनकी कृपा प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि परम सत्य की खोज और आंतरिक शांति का एक शक्तिशाली माध्यम है।
पहला श्लोक भगवान कार्तिकेय को वेदों और वेदांतों द्वारा पूजे जाने वाले पवित्र कमल चरणों वाले, अपने कुल के गुरु, संगीत और नृत्य के प्रेमी, सद्गुणों के सागर, श्री रंगनाथ के संबंधी और ब्रह्मा द्वारा पूजित देव के रूप में वर्णित करता है। दूसरा श्लोक उन्हें शिव की शक्ति से शरवण वन में उत्पन्न हुए, शैव योग शक्ति के स्रोत, भक्तों के गुरु, दयालु, नवरसों के सौंदर्य स्वरूप और 'ह्रीं' बीज मंत्र के रूप में स्मरण करता है। ये श्लोक कार्तिकेय के दिव्य उद्भव और उनके सार्वभौमिक गुरु स्वरूप को उजागर करते हैं।
तीसरे श्लोक में, कार्तिकेय को देवसेना देवी के मुखकमल पर मंडराने वाले भ्रमर के समान, चंद्रमा-मुकुटधारी भगवान शिव के पुत्र, लोकों पर कृपा करने वाले, ज्ञान प्रदान करने वाले, पूर्णिमा के चंद्रमा के समान सुंदर मुख वाले, वल्ली देवी के स्वामी और 'ह्रीं' प्रणव स्वरूप के अधिपति के रूप में सराहा गया है। चौथा श्लोक उन्हें महादेव से उत्पन्न, शरवण में प्रकट हुए, मंत्र स्वरूप, परमानंद स्वरूप, माया से परे, देवताओं द्वारा पूजित, गुह स्वरूप, वल्लीनाथ और गृध्रगिरिवासी के रूप में वर्णित करता है। ये श्लोक उनके सौंदर्य, ज्ञान प्रदाता के रूप और सृष्टि के रक्षक के रूप में उनकी भूमिका पर जोर देते हैं।
अंततः, पाँचवें श्लोक में, कार्तिकेय को नित्य स्वरूप, सभी वरदान देने वाले, निर्मल ब्रह्म-तत्व स्वरूप, देवताओं द्वारा पूजित कमल चरणों वाले, निर्विकल्प योग में स्थित, नित्यानंदमय, निर्गुण स्वरूप और देवों के देव के रूप में स्तुति की गई है। स्तोत्र का समापन इस आशीर्वाद के साथ होता है कि जो कोई भी इस कार्तिकेय पंचकं का भक्तिपूर्वक पाठ या श्रवण करता है, वह भगवान कार्तिकेय की कृपा से अपनी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर लेता है। यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक जागृति और भगवान के साथ गहरा संबंध स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम है।
लाभ (Benefits):
- ज्ञान और बुद्धि की वृद्धि: भगवान कार्तिकेय ज्ञान के अधिपति हैं, इसलिए इस स्तोत्र का पाठ बुद्धि को बढ़ाता है और अज्ञानता को दूर करता है।
- शौर्य और साहस: इस स्तोत्र का नियमित पाठ भक्तों में साहस और वीरता का संचार करता है, जिससे वे जीवन की बाधाओं का सामना करने में सक्षम होते हैं।
- इच्छाओं की पूर्ति: भगवान कार्तिकेय की कृपा से, भक्तों की सभी शुभ मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और उन्हें जीवन में सफलता प्राप्त होती है।
- आध्यात्मिक उत्थान: इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान से जुड़ने पर, आध्यात्मिक प्रगति, मन की शांति और आंतरिक संतोष प्राप्त होता है।
- समस्त दोषों का निवारण: भगवान कार्तिकेय की दिव्य शक्ति जीवन की बाधाओं, नकारात्मक ऊर्जाओं और दोषों को दूर करने में सहायता करती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री कार्तिकेय पंचकं क्या है?
श्री कार्तिकेय पंचकं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री कार्तिकेय पंचकं का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
श्री कार्तिकेय पंचकं का पाठ किसे करना चाहिए?
श्री कार्तिकेय पंचकं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री कार्तिकेय पंचकं का मूल या स्रोत क्या है?
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