- ॐ वीरब्रह्मेंद्र स्वामिने नमः
- ॐ वीरनारायणाय नमः
- ॐ वीरभोगवसंतावताराय नमः
- ॐ वीराग्रगण्याय नमः
- ॐ वीरॆंद्राय नमः
- ॐ वीराधिवीराय नमः
- ॐ वीतरागाय नमः
- ॐ वीराय नमः
- ॐ वीरासनाय नमः
- ॐ वीराचार्याय नमः
- ॐ वीरप्पयाचार्याय नमः
- ॐ विराद्रूपाय नमः
- ॐ विध्याविद्यातिरिक्ताय नमः
- ॐ विद्यासाराय नमः
- ॐ वियत्पंचकातीताय नमः
- ॐ विजितेंद्रियाय नमः
- ॐ विवेकहृत्संगाय नमः
- ॐ विराजितपदाय नमः
- ॐ विशुद्धभवनसदा शिवाय नमः
- ॐ विश्ववंद्यातीताय नमः
- ॐ विश्वरूपाय नमः
- ॐ विश्वोदराय नमः
- ॐ विश्वसाक्षिणे नमः
- ॐ विश्वेश्वराय नमः
- ॐ विश्वद्रुशे नमः
- ॐ विश्वप्रभोदाय नमः
- ॐ विश्वांतकवासकाय नमः
- ॐ विश्वमूर्तये नमः
- ॐ विश्ववंध्याय नमः
- ॐ विश्वदाभिरामाय नमः
- ॐ विश्वाख्याय नमः
- ॐ विश्वदयाय नमः
- ॐ विश्वज्ञाय नमः
- ॐ वशीकृतेंद्रियाय नमः
- ॐ वितलगुल्भाय नमः
- ॐ विज्ञानभूमिकाकाराय नमः
- ॐ विस्तारितविधिप्रशस्ताय नमः
- ॐ विनुत संवादाय नमः
- ॐ विगतनायो विकाराय नमः
- ॐ विनिद्राय नमः
- ॐ विराट्पतये नमः
- ॐ विहितकर्मायुताय नमः
- ॐ विदुषे नमः
- ॐ विनाशोत्पत्तिवर्जिताय नमः
- ॐ विदुविधु शंकरनुताय नमः
- ॐ विषयाशक्तिवर्जिताय नमः
- ॐ विकल्पविरहिताय नमः
- ॐ विद्याप्रसादाय नमः
- ॐ विद्यामयाय नमः
- ॐ विनिद्राय नमः
- ॐ विमलचरित्राय नमः
- ॐ विद्यावेद्याय नमः
- ॐ विद्यानिधये नमः
- ॐ विद्यापतये नमः
- ॐ विरूपाक्षाय नमः
- ॐ वरदानधुरीण्याय नमः
- ॐ समशत्रुमित्राय नमः
- ॐ सद्गुरवे नमः
- ॐ सर्वफलप्रदाय नमः
- ॐ सर्व वशात्मवे नमः
- ॐ सर्व सर्वांतरात्मने नमः
- ॐ सर्व साक्षिणे नमः
- ॐ सर्वभूतांतरस्थाय नमः
- ॐ सर्वतो भद्राय नमः
- ॐ सर्वात्मने नमः
- ॐ सर्वधराय नमः
- ॐ सर्वावगुण वर्जिताय नमः
- ॐ सर्वोपनिषत्संबरकराय नमः
- ॐ सर्वोपादिविनिर्मुक्ताय नमः
- ॐ सर्वजगत्पसिद्दाय नमः
- ॐ सर्वशरण्याय नमः
- ॐ सर्वगताय नमः
- ॐ सर्वांतरात्मने नमः
- ॐ सर्वातीताय नमः
- ॐ सर्वभूताधिवासाय नमः
- ॐ सर्वाधाराय नमः
- ॐ सर्वशक्तियुताय नमः
- ॐ सर्वतोमुखाय नमः
- ॐ सर्वरक्षाय नमः
- ॐ सर्वव्यापकाय नमः
- ॐ सर्वाध्यक्षाय नमः
- ॐ सर्वधाराय नमः
- ॐ सर्वातीताय नमः
- ॐ सर्वारिष्टविनाशाय नमः
- ॐ सर्वांतर्याय नमः
- ॐ सर्वानेत्राय नमः
- ॐ सर्वभोक्त्रे नमः
- ॐ सर्वमंत्रवशीकरणाय नमः
- ॐ सर्व प्राणिमयाकाराय नमः
- ॐ सर्वंसहोधाराय नमः
- ॐ सर्वव्यवहारातीताय नमः
- ॐ सर्व शरीरस्थायिने नमः
- ॐ सर्वप्राणिप्रेरकाय नमः
- ॐ सर्वदूतमित्राय नमः
- ॐ सर्वपूर्णाय नमः
- ॐ सर्वज्ञत्यादिगुणपरिवेष्टिताय नमः
- ॐ सर्वभूतात्मने नमः
- ॐ सर्वोपशांतिसुखरसिकाय नमः
- ॐ सर्वेंद्रिय द्रश्त्रे नमः
- ॐ सर्वज्ञाय नमः
- ॐ सर्व कर्त्रे नमः
- ॐ सर्वजनकाय नमः
- ॐ सर्वप्रवर्तराय नमः
- ॐ सर्वोन्नतार्दाय नमः
- ॐ सर्व गताय नमः
- ॐ सर्व जगत्प्रसिद्दाय नमः
- ॐ सर्वोपनिषत्साराय नमः
- ॐ सर्वगुरवे नमः
- || इति श्री वीरब्रह्मेंद्र स्वामि अष्टोत्तर शतनामावळि संपूर्णं ||
अर्थ
श्री वीरब्रह्मेंद्र स्वामी अष्टोत्तर शतनामावलि कलियुग के महान ज्ञानी, कालज्ञान के प्रणेता और दिव्य द्रष्टा श्री वीरब्रह्मेंद्र स्वामी को समर्पित 108 पवित्र नामों का एक स्तोत्र है। यह नामावलि उनके दिव्य गुणों, चमत्कारों, शिक्षाओं और उनके विश्वरूप का गुणगान करती है। इसका पाठ करने से भक्त स्वामीजी की कृपा प्राप्त करते हैं और आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं। यह केवल नामों का पाठ नहीं, बल्कि स्वामीजी के सिद्धांतों को समझकर उनके बताए मार्ग पर चलने का एक साधन है।
प्रत्येक नाम स्वामीजी की दिव्य शक्ति, ज्ञान और करुणा को दर्शाता है। इन नामों का उच्चारण करने से मन को शांति, शरीर को पवित्रता और आत्मा को आध्यात्मिक बल मिलता है। श्री वीरब्रह्मेंद्र स्वामी ने अपने कालज्ञान के माध्यम से भविष्य को देखा था। उनकी दूरदर्शिता, आध्यात्मिक शक्ति और लोक कल्याण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को यह अष्टोत्तर महिमामंडित करता है। उनका प्रत्येक नाम उनके जीवन के एक पहलू, उनकी तपस्या की महिमा और समाज के लिए उनके योगदान को याद दिलाता है।
इस नामावलि में स्वामीजी को 'वीरब्रह्मेंद्र', 'वीरनारायण', 'वीरभोगवसंतवतार' कहकर महिमामंडित किया गया है, जो उनके शौर्य, दिव्यता और अवतार के महत्व को दर्शाता है। 'वीरेंद्राय', 'वीराधिवीरा' जैसे नाम उनकी अजेय शक्ति और असाधारण नेतृत्व को प्रतिबिंबित करते हैं। 'वीतरागाय' उनकी लौकिक इच्छाओं से मुक्ति की स्थिति को इंगित करता है, जबकि 'विद्यासाराय' और 'विजितेन्द्रियाय' उनके असीम ज्ञान और इंद्रियों पर नियंत्रण को दर्शाते हैं। 'विराटूपाय', 'विश्वेश्वराय', 'विश्वमूर्तये' जैसे नाम यह उद्घोष करते हैं कि वे संपूर्ण विश्व के अधिपति, साक्षी और स्वरूप हैं, जो उनकी सर्वव्यापकता को उजागर करता है।
इस अष्टोत्तर शतनामावलि का प्रत्येक शब्द श्री वीरब्रह्मेंद्र स्वामी के अनंत गुणों, उनके गहन ज्ञान, उनकी कठोर तपस्या और लोक कल्याण के लिए उनके योगदान को स्मरण कराता है। यह भक्तों को संकट के समय धैर्य प्रदान करता है, अज्ञानता को दूर करता है और मोक्ष का मार्ग दिखाता है। उनके कालज्ञान की शिक्षाएं और आध्यात्मिक मार्गदर्शन इन नामों के माध्यम से सदैव जीवित रहते हैं और भक्तों को निरंतर प्रेरणा देते हैं।
लाभ (Benefits):
- मानसिक शांति और स्थिरता: नियमित पाठ से मन की चंचलता दूर होती है और आंतरिक शांति व स्थिरता प्राप्त होती है, जिससे दैनिक जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है।
- ज्ञान और विवेक में वृद्धि: स्वामीजी के ज्ञान के सार का स्मरण करने से विवेक बढ़ता है और सही निर्णय लेने में सहायता मिलती है, यह जीवन की चुनौतियों का सामना करने में बल देता है।
- कष्टों से मुक्ति: दृढ़ भक्ति के साथ इस नामावलि का पाठ करने से संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है, तथा अनपेक्षित समस्याओं से रक्षा मिलती है।
- आध्यात्मिक प्रगति: यह आत्मोन्नति के लिए प्रेरणा देता है और मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाता है, आंतरिक शुद्धता और दिव्य संबंध को बढ़ाता है।
- नकारात्मक ऊर्जा का निवारण: स्वामीजी की दिव्य शक्ति का स्मरण करने से आसपास की नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती हैं और एक सकारात्मक वातावरण का निर्माण होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री वीरब्रह्मेंद्र स्वामी अष्टोत्तर शतनामावलि क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री वीरब्रह्मेंद्र स्वामी अष्टोत्तर शतनामावलि के पाठ के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या महत्व क्या है?
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