- ॐ श्री शंकराचार्यवर्याय नमः
- ॐ ब्रह्मानंदप्रदायकाय नमः
- ॐ अज्ञानतिमिरादित्याय नमः
- ॐ सुज्ञानाम्बुधिचंद्रमसे नमः
- ॐ वर्णाश्रमप्रतिष्ठात्रे नमः
- ॐ श्रीमते नमः
- ॐ मुक्तिप्रदायकाय नमः
- ॐ शिष्योपदेशनिरताय नमः
- ॐ भक्ताभीष्टप्रदायकाय नमः
- ॐ सूक्ष्मतत्त्वरहस्यज्ञाय नमः
- ॐ कार्याकार्यप्रबोधकाय नमः
- ॐ ज्ञानमुद्रांचितकराय नमः
- ॐ शिष्यहृत्तापहारकाय नमः
- ॐ परिव्राजाश्रमोद्धर्त्रे नमः
- ॐ सर्वतंत्रस्वतंत्रधिये नमः
- ॐ अद्वैतस्थापनाचार्याय नमः
- ॐ साक्षाच्छंकररूपधृते नमः
- ॐ षण्मतस्थापनाचार्याय नमः
- ॐ त्रयीमार्गप्रकाशकाय नमः
- ॐ वेदवेदांततत्त्वज्ञाय नमः
- ॐ दुर्वादिमतखंडनाय नमः
- ॐ वैराग्यनिरताय नमः
- ॐ शांताय नमः
- ॐ संसारार्णवतारकाय नमः
- ॐ प्रसन्नवदनांभोजाय नमः
- ॐ परमार्थप्रकाशकाय नमः
- ॐ पुराणस्मृतिसारज्ञाय नमः
- ॐ नित्यतृप्ताय नमः
- ॐ महते नमः
- ॐ शुचये नमः
- ॐ नित्यानंदाय नमः
- ॐ निरातंकाय नमः
- ॐ निस्संगाय नमः
- ॐ निर्मलात्मकाय नमः
- ॐ निर्ममाय नमः
- ॐ निरहंकाराय नमः
- ॐ विश्ववंद्यपदांबुजाय नमः
- ॐ सत्त्वप्रधानाय नमः
- ॐ सद्भावाय नमः
- ॐ संख्यातीतगुणोज्वलाय नमः
- ॐ अनघाय नमः
- ॐ सारहृदयाय नमः
- ॐ सुधिये नमः
- ॐ सारस्वतप्रदाय नमः
- ॐ सत्यात्मने नमः
- ॐ पुण्यशीलाय नमः
- ॐ सांख्ययोगविचक्षणाय नमः
- ॐ तपोराशये नमः
- ॐ महातेजसे नमः
- ॐ गुणत्रयविभागविदे नमः
- ॐ कलिघ्नाय नमः
- ॐ कालकर्मज्ञाय नमः
- ॐ तमोगुणनिवारकाय नमः
- ॐ भगवते नमः
- ॐ भारतीजेत्रे नमः
- ॐ शारदाह्वानपंडिताय नमः
- ॐ धर्माधर्मविभागज्ञाय नमः
- ॐ लक्ष्यभेदप्रदर्शकाय नमः
- ॐ नादबिंदुकलाभिज्ञाय नमः
- ॐ योगिहृत्पद्मभास्कराय नमः
- ॐ अतींद्रियज्ञाननिधये नमः
- ॐ नित्यानित्यविवेकवते नमः
- ॐ चिदानंदाय नमः
- ॐ चिन्मयात्मने नमः
- ॐ परकायप्रवेशकृते नमः
- ॐ अमानुषचरित्राढ्याय नमः
- ॐ क्षेमदायिने नमः
- ॐ क्षमाकराय नमः
- ॐ भव्याय नमः
- ॐ भद्रप्रदाय नमः
- ॐ भूरिमहिम्ने नमः
- ॐ विश्वरंजकाय नमः
- ॐ स्वप्रकाशाय नमः
- ॐ सदाधाराय नमः
- ॐ विश्वबंधवे नमः
- ॐ शुभोदयाय नमः
- ॐ विशालकीर्तये नमः
- ॐ वागीशाय नमः
- ॐ सर्वलोकहितोत्सुकाय नमः
- ॐ कैलासयात्रासंप्राप्तचंद्रमौळिप्रपूजकाय नमः
- ॐ कांच्यां श्रीचक्रराजाख्ययंत्रस्थापनदीक्षिताय नमः
- ॐ श्रीचक्रात्मकताटंकतोषितांबामनोरथाय नमः
- ॐ श्रीब्रह्मसूत्रोपनिषद्भाष्यादिग्रंथकल्पकाय नमः
- ॐ चतुर्दिक्चतुराम्नाय प्रतिष्ठात्रे नमः
- ॐ महामतये नमः
- ॐ द्विसप्ततिमतोच्चेत्रे नमः
- ॐ सर्वदिग्विजयप्रभवे नमः
- ॐ काषायवसनोपेताय नमः
- ॐ भस्मोद्धूळितविग्रहाय नमः
- ॐ ज्ञानात्मकैकदंडाढ्याय नमः
- ॐ कमंडलुलसत्कराय नमः
- ॐ गुरुभूमंडलाचार्याय नमः
- ॐ भगवत्पादसंज्ञकाय नमः
- ॐ व्याससंदर्शनप्रीताय नमः
- ॐ ऋष्यशृंगपुरेश्वराय नमः
- ॐ सौंदर्यलहरीमुख्यबहुस्तोत्रविधायकाय नमः
- ॐ चतुष्षष्टिकलाभिज्ञाय नमः
- ॐ ब्रह्मराक्षसमोक्षदाय नमः
- ॐ श्रीमन्मंडनमिश्राख्यस्वयंभूजयसन्नुताय नमः
- ॐ तोटकाचार्यसंपूज्याय नमः
- ॐ पद्मपादार्चितांघ्रिकाय नमः
- ॐ हस्तामलकयोगींद्र ब्रह्मज्ञानप्रदायकाय नमः
- ॐ सुरेश्वराख्यसच्चिष्यसन्न्यासाश्रमदायकाय नमः
- ॐ नृसिंहभक्ताय नमः
- ॐ सद्रत्नगर्भहेरंबपूजकाय नमः
- ॐ व्याख्यासिंहासनाधीशाय नमः
- ॐ जगत्पूज्याय नमः
- ॐ जगद्गुरवे नमः
|| इति श्री आदिशंकराचार्य अष्टोत्तर शतनामावळि संपूर्णं ||
अर्थ
श्री आदिशंकराचार्य अष्टोत्तर शतनामावलिः, ज्ञान के सागर, अद्वैत सिद्धांत के प्रणेता और सनातन धर्म के पुनरुत्थान के अग्रदूत जगद्गुरु श्री आदिशंकराचार्य को समर्पित 108 पवित्र नामों का स्तोत्र है। यह नामावलि शंं कर भगवत्पाद के दिव्य गुणों, उनके अथाह ज्ञान, अटल भक्ति, लोक कल्याण के लिए किए गए उनके कार्यों, उनके अद्वैत सिद्धांत की स्थापना और उनके शिष्य प्रेम की स्तुति करती है। प्रत्येक नाम उनके एक दिव्य स्वरूप, उनके महान व्यक्तित्व के एक पहलू को प्रकट करता है।
यह अष्टोत्तर श्री शंकराचार्य को ब्रह्मानंदप्रदायक, अज्ञानतिमिर आदित्य, सुज्ञानांबुधि चंद्रमा से के रूप में वर्णित करता है। अर्थात्, वे परम ब्रह्मानंद प्रदान करने वाले हैं, अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाले सूर्य के समान हैं, और सुज्ञान के सागर के लिए चंद्रमा के समान हैं। उन्हें वर्णाश्रम धर्म को पुनः स्थापित करने वाले, मुक्ति प्रदान करने वाले, शिष्यों को उपदेश देने में निरत रहने वाले और भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले के रूप में सराहा जाता है। उनका प्रत्येक नाम उनकी अलौकिक शक्ति, दिव्य ज्ञान और मानव जाति के उद्धार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को उजागर करता है।
शंकराचार्य सूक्ष्म तत्व रहस्यों के ज्ञाता हैं, कार्य और अकार्य (करने योग्य और न करने योग्य कर्मों) का प्रबोधन करने वाले हैं। उनके हाथ में ज्ञान मुद्रा सुशोभित है और वे अपने शिष्यों के हृदय के ताप को हरने वाले हैं। उन्होंने परिव्राजाश्रम (संन्यास आश्रम) का उद्धार किया, सभी तंत्रों में स्वतंत्र बुद्धि वाले थे। विशेष रूप से, यह नामावलि घोषणा करती है कि वे अद्वैत सिद्धांत को स्थापित करने वाले आचार्य थे और साक्षात् शिव का रूप धारण करने वाले थे। उन्होंने षण्मतों (गाणपत्य, सौर, शक्ति, शैव, वैष्णव, कौमार) की स्थापना की और त्रयी मार्ग (तीनों वेदों के मार्ग) को प्रकाशित किया।
वेद और वेदांत के तत्वों को पूर्ण रूप से जानने वाले शंकराचार्य ने दुष्ट वादियों के मतों का खंडन किया। वैराग्य में निरत, शांत स्वभाव वाले वे संसार सागर से पार उतारने वाले हैं। उनके मुख को सदैव प्रसन्न कमल के समान वर्णित किया गया है। इस नामावलि के पाठ से भक्त शंकराचार्य के दिव्य अनुग्रह के पात्र बनते हैं, उनके ज्ञान मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं और अंततः मोक्ष की ओर बढ़ते हैं। यह केवल नामों का स्मरण नहीं, बल्कि उनके सिद्धांतों का मनन करने का एक शक्तिशाली साधन है।
प्रयोजन (Benefits):
- ज्ञान और विवेक की वृद्धि: इस नामावलि का पाठ करने से अज्ञान दूर होता है और ज्ञान की वृद्धि होती है, सही निर्णय लेने की क्षमता और विवेक विकसित होता है।
- मानसिक शांति: शंकराचार्य के नाम स्मरण से मन को शांति, संतोष और स्थिरता मिलती है, चिंताओं और अशांति को दूर करता है।
- मोक्ष की प्राप्ति: शंकराचार्य मुक्तिप्रदायक हैं। उनके नामों का निष्ठा से पाठ करने से संसार बंधन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
- सभी मनोकामनाओं की सिद्धि: भक्तभीष्टप्रदायक नाम के अनुसार, इस नामावलि के पाठ से भक्तों की शुद्ध मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति: अद्वैत सिद्धांत के मूल पुरुष शंकराचार्य के नाम स्मरण से आध्यात्मिक प्रगति होती है और आत्मज्ञान की प्राप्ति में सहायता मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री आदिशंकराचार्य अष्टोत्तर शतनामावलिः क्या है?
इस नामावलि का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री आदिशंकराचार्य अष्टोत्तर शतनामावलिः के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
कौन इस नामावलि का पाठ कर सकता है?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
श्री आदिशंकराचार्य अष्टोत्तर शतनामावलिः का मूल क्या है?
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