- ॐ वेदव्यासाय नमः
- ॐ विष्णुरूपाय नमः
- ॐ पाराशर्याय नमः
- ॐ तपोनिधये नमः
- ॐ सत्यसन्धाय नमः
- ॐ प्रशान्तात्मने नमः
- ॐ वाग्मिने नमः
- ॐ सत्यवतीसुताय नमः
- ॐ कृष्णद्वैपायनाय नमः
- ॐ दान्ताय नमः
- ॐ बादरायणसंज्ञिताय नमः
- ॐ ब्रह्मसूत्रग्रथितवते नमः
- ॐ भगवते नमः
- ॐ ज्ञानभास्कराय नमः
- ॐ सर्ववेदान्ततत्त्वज्ञाय नमः
- ॐ सर्वज्ञाय नमः
- ॐ वेदमूर्तिमते नमः
- ॐ वेदशाखाव्यसनकृते नमः
- ॐ कृतकृत्याय नमः
- ॐ महामुनये नमः
- ॐ महाबुद्धये नमः
- ॐ महासिद्धये नमः
- ॐ महाशक्तये नमः
- ॐ महाद्युतये नमः
- ॐ महाकर्मणे नमः
- ॐ महाधर्मणे नमः
- ॐ महाभारतकल्पकाय नमः
- ॐ महापुराणकृते नमः
- ॐ ज्ञानिने नमः
- ॐ ज्ञानविज्ञानभाजनाय नमः
- ॐ चिरञ्जीविने नमः
- ॐ चिदाकाराय नमः
- ॐ चित्तदोषविनाशकाय नमः
- ॐ वासिष्ठाय नमः
- ॐ शक्तिपौत्राय नमः
- ॐ शुकदेवगुरवे नमः
- ॐ गुरवे नमः
- ॐ आषाढपूर्णिमापूज्याय नमः
- ॐ पूर्णचन्द्रनिभाननाय नमः
- ॐ विश्वनाथस्तुतिकराय नमः
- ॐ विश्ववन्द्याय नमः
- ॐ जगद्गुरवे नमः
- ॐ जितेन्द्रियाय नमः
- ॐ जितक्रोधाय नमः
- ॐ वैराग्यनिरताय नमः
- ॐ शुचये नमः
- ॐ जैमिन्यादिसदाचार्याय नमः
- ॐ सदाचारसदास्थिताय नमः
- ॐ स्थितप्रज्ञाय नमः
- ॐ स्थिरमतये नमः
- ॐ समाधिसंस्थिताशयाय नमः
- ॐ प्रशान्तिदाय नमः
- ॐ प्रसन्नात्मने नमः
- ॐ शङ्करार्यप्रसादकृते नमः
- ॐ नारायणात्मकाय नमः
- ॐ स्तव्याय नमः
- ॐ सर्वलोकहिते रताय नमः
- ॐ अचतुर्वदनब्रह्मणे नमः
- ॐ द्विभुजापरकेशवाय नमः
- ॐ अफाललोचनशिवाय नमः
- ॐ परब्रह्मस्वरूपकाय नमः
- ॐ ब्रह्मण्याय नमः
- ॐ ब्राह्मणाय नमः
- ॐ ब्रह्मिणे नमः
- ॐ ब्रह्मविद्याविशारदाय नमः
- ॐ ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञात्रे नमः
- ॐ ब्रह्मभूताय नमः
- ॐ सुखात्मकाय नमः
- ॐ वेदाब्जभास्कराय नमः
- ॐ विदुषे नमः
- ॐ वेदवेदान्तपारगाय नमः
- ॐ अपान्तरतमोनाम्ने नमः
- ॐ वेदाचार्याय नमः
- ॐ विचारवते नमः
- ॐ अज्ञानसुप्तिबुद्धात्मने नमः
- ॐ प्रसुप्तानां प्रबोधकाय नमः
- ॐ अप्रमत्ताय नमः
- ॐ अप्रमेयात्मने नमः
- ॐ मौनिने नमः
- ॐ ब्रह्मपदे रताय नमः
- ॐ पूतात्मने नमः
- ॐ सर्वभूतात्मने नमः
- ॐ भूतिमते नमः
- ॐ भूमिपावनाय नमः
- ॐ भूतभव्यभवज्ज्ञात्रे नमः
- ॐ भूमसंस्थितमानसाय नमः
- ॐ उत्फुल्लपुण्डरीकाक्षाय नमः
- ॐ पुण्डरीकाक्षविग्रहाय नमः
- ॐ नवग्रहस्तुतिकराय नमः
- ॐ परिग्रहविवर्जिताय नमः
- ॐ एकान्तवाससुप्रीताय नमः
- ॐ शमादिनिलायाय नमः
- ॐ मुनये नमः
- ॐ एकदन्तस्वरूपेण लिपिकारिणे नमः
- ॐ बृहस्पतये नमः
- ॐ भस्मरेखाविलिप्ताङ्गाय नमः
- ॐ रुद्राक्षावलिभूषिताय नमः
- ॐ ज्ञानमुद्रालसत्पाणये नमः
- ॐ स्मितवक्त्राय नमः
- ॐ जटाधराय नमः
- ॐ गभीरात्मने नमः
- ॐ सुधीरात्मने नमः
- ॐ स्वात्मारामाय नमः
- ॐ रमापतये नमः
- ॐ महात्मने नमः
- ॐ करुणासिन्धवे नमः
- ॐ अनिर्देश्याय नमः
- ॐ स्वराजिताय नमः
|| इति श्री वेदव्यास अष्टोत्तर शतनामावळि संपूर्णं ||
अर्थ
श्री वेदव्यास अष्टोत्तरशतनामावलिः महर्षि वेदव्यास को समर्पित 108 पवित्र नामों का एक संग्रह है। वेदव्यास हिंदू धर्म के सबसे महान ऋषियों में से एक हैं, जिन्होंने वेदों का विभाजन किया, महाभारत की रचना की, पुराणों को संकलित किया और ब्रह्मसूत्रों को लिखा, जिससे मानव जाति को अतुलनीय ज्ञान का खजाना मिला। यह नामावलि उनके दिव्य गुणों, ज्ञान, तपस्या और लोकोपकारी कार्यों की प्रशंसा करती है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यासजी की कृपा प्राप्त होती है, जिससे ज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति होती है।
इस नामावलि का प्रत्येक नाम वेदव्यास के एक-एक आयाम को प्रकट करता है। 'ॐ वेदव्यास नमः' उनके मूल नाम की स्तुति करता है, जबकि 'ॐ विष्णुरूपाय नमः' यह दर्शाता है कि वे भगवान विष्णु के अवतार हैं। 'पाराशर्याय नमः' और 'सत्यवतीसुताय नमः' उनके वंश और माता के बारे में बताते हैं। 'तपनिधये नमः', 'सत्यसंधाय नमः', 'प्रशान्तात्मने नमः' जैसे नाम उनकी तपस्या, सत्यनिष्ठा और शांत स्वभाव को उजागर करते हैं। 'कृष्णद्वैपायनाय नमः' उनके जन्म स्थान और वर्ण से संबंधित है। 'ब्रह्मसूत्रग्रथितवते नमः' नाम उनकी प्रमुख कृतियों में से एक, ब्रह्मसूत्रों की रचना का स्मरण कराता है।
व्यासजी केवल ज्ञान के स्रोत नहीं थे, वे ज्ञान के सागर थे। 'ज्ञानभास्कराय नमः' का अर्थ है ज्ञान का सूर्य। 'सर्ववेदान्ततत्त्वज्ञाय नमः' और 'सर्वज्ञाय नमः' जैसे नाम यह घोषित करते हैं कि वे सभी वेदान्त सिद्धांतों के ज्ञाता और सर्वज्ञ थे। 'वेदमूर्तिमत नमः' का अर्थ वेदों का साकार रूप है। 'वेदशाखाव्यसनकृते नमः' नाम वेदों को विभाजित कर उन्हें सुलभ बनाने के उनके महान कार्य को इंगित करता है। 'महाबुद्धये नमः', 'महासद्धये नमः', 'महाशक्तये नमः', 'महाद्युतये नमः' जैसे नाम उनकी असीम बुद्धि, सिद्धि, शक्ति और तेज का वर्णन करते हैं। 'महाभारतकल्पकाय नमः' और 'महापुराणकृते नमः' नाम महाभारत और पुराणों की रचना में उनकी भूमिका को रेखांकित करते हैं।
यह नामावलि व्यासजी के सभी गुणों का स्मरण कराकर, उनके समान ज्ञान, विवेक और सत्यनिष्ठा विकसित करने की प्रेरणा देती है। 'चिरंजिविने नमः' नाम बताता है कि वे चिरंजीवी हैं, जबकि 'चिदाकाराय नमः' यह सूचित करता है कि वे शुद्ध चेतना के स्वरूप हैं। 'चित्तदोषविनाशकाय नमः' नाम इंगित करता है कि उनके नाम स्मरण से मन के दोष नष्ट हो जाते हैं। 'शुकदेवगुरवे नमः' उनके पुत्र और शिष्य शुकदेव के गुरु होने की याद दिलाता है। इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से मन को शांति, ज्ञान में स्पष्टता और जीवन में सही मार्गदर्शन प्राप्त होता है।
लाभ (Benefits):
- ज्ञान और विवेक में वृद्धि: वेदव्यास ज्ञान के अधिपति हैं, इसलिए इस नामावलि का पाठ करने से अध्ययन में रुचि बढ़ती है और विषयों को समझने की क्षमता विकसित होती है।
- मानसिक शांति और स्पष्टता: व्यासजी के शांत स्वभाव की स्तुति करने से मन की चंचलता कम होती है और शांति तथा निर्णयों में स्पष्टता प्राप्त होती है।
- आध्यात्मिक प्रगति: यह नामावलि आध्यात्मिक ज्ञान का स्रोत है, इसलिए नियमित पाठ से आत्मज्ञान और आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति में सहायता मिलती है।
- समस्याओं का निवारण: व्यासजी की सर्वज्ञता और शक्ति का स्मरण करने से जीवन की बाधाओं और समस्याओं को दूर करने में दिव्य सहायता मिलती है।
- सत्य और धर्मनिष्ठा: 'सत्यसंधाय नमः' नाम सत्य और धर्म में दृढ़ रहने की प्रेरणा देता है, जिससे जीवन में सदाचार का विकास होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री वेदव्यास अष्टोत्तरशतनामावलिः क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री वेदव्यास अष्टोत्तरशतनामावलिः के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
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