व

श्री वराह स्तोत्रं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्र
0 व्यूज़

श्री वराह स्तोत्रं

ततः स राजा श्रीमुष्णे नित्यपुष्करिणी जले |
स्नात्वा संतर्प्य देवादीं शुचिर्भूत्वा जितेंद्रियः ||1||

पिप्पलद्रुममासाद्य जितसानपरिग्रहः |
तुष्टावजवतामीशं नारायणमनामयं ||2||

राजा उवाच -
शुद्धस्फटिकसंकाशं पूर्णचंद्रनिभाननं |
कठिन्यस्त करद्वंद्वं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||3||

स्रष्टारं सर्वलोकानां प्रेरगं सर्वदेहिनां |
पालकं पालनीयानां श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||4||

हर्तारं प्रलयेकाले रक्षकं मध्यवर्तिनां |
वैराग्यदं स्वभक्तानां श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||5||

चिदानंदघनं पूर्णं सर्वदोषविवर्जितं |
स्वाभिनं सर्वलोकानां श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||6||

येनं व्याप्तमिदं सर्वं बहिरं तश्च सर्वदा |
सर्वा वह्न्या प्रेरकंच श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||7||

भूतं भव्यं भविष्यच्च जगदे तच्चराचरं |
तद्वशे वर्तते नित्यं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||8||

ओतप्रोतमिदं यत्र वटवन्विश्वतो मुखं |
सुमुखं सुस्मितं शांतं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||9||

अनादिमंतकालेऽपि यस्स्वामी सर्वदेहिनां |
नमादिदेवं देवेशं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||10||

निर्मायं मायिनामीशं निर्गुणं षड्गुणार्णवं |
निर्दोषं निश्चलानंदं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||11||

सदाऽव्यक्तं सदाऽभासं सदासंतोष संवृतं |
सदाविलिप्त विज्ञानं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||12||

दयानिधिं दयाहीनं जीवानामार्तिहं विभुं |
दैत्यांतकं गदापाणिं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||13||

पीतांबरधरं देवं दंडकांतकमच्युतं |
देवेंद्रदर्पहर्तारं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||14||

अग्राह्यमक्षरं नित्यं निर्भेद्यं निरवग्रहं |
निरस्तसाम्यातिशयं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||15||

निर्गलं निश्चलं विष्णुं वेदवेद्यं सनातनं |
विद्याधीशं विदां श्रेष्ठं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||16||

कमलोद्भव तातं तं कमलापतिमीश्वरं |
कंजांघ्रिं कमलाक्षंच श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||17||

चैत्रे कृष्णचतुर्दश्यां रेवत्यां भानुवासरे |
अश्वत्थरूपं वाराहं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||18||

मुहूर्ते पंचमे जातं चैत्रेऽश्विन्यां च कृष्णके |
अर्कवारे त्रयोदश्यां श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||19||

वराहं वरदं शांतं पुण्यश्रवणकीर्तनं |
झिल्लिकावनहंतारं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||20||

नित्यपुष्करिणीतीरवासिनं वनमालिनं |
मुनिहृन्पद्मनिलयं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||21||

यज्ञं यज्ञपतिं यज्ञ कर्तारं यज्ञभावनं |
यज्ञांगं यज्ञगोप्तारं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||22||

संसारभय-भीतानां जंतूनामभयप्रदं |
सामगीतं सुराध्यक्षं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||23||

सहस्रवदनं देवं सहस्राक्षं सदाशुभं |
सदामंगलकर्तारं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||24||

ज्ञानगं कामदं भुक्ति-मुक्तिदं मुनिवंदितं |
निराश्रयं सदाऽऽधारं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||25||

वटपत्रपुटेयोगशायिनं बालमीश्वरं |
तमद्भुतार्धकाकारं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||26||

दुग्धाब्धि-शायिनं देवमनंतोरसिवासिनं |
वैकुंठ-निलयं विष्णुं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||27||

वासुदेवं जगद्योनिं जगज्जाड्य हरं हरिं |
जंभारि-प्राणदं पूर्णं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||28||

धर्मप्रियं धर्मरूपं धर्मगोप्तारमव्ययं |
धर्मदत्प्रलदातारं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||29||

जाह्नवी जनकं कालं व्योमकेशं वृषाकपिं |
कवेंद्रवाहनं कोलं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||30||

नित्यं स्तवं प्रमव्यक्तं भक्ताधीनं परात्परं |
दामोदरं हृषीकेशं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||31||

यन्नामस्मृतिमात्रेण कोटिजन्माघनाशनं | 
भवेतं भावशुद्धानां श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||32||

कंदर्पकोटिलावण्यं कोटिसूर्यसमप्रभं |
कोटींदु-जगदानंदं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||33||

अनधेहारकेयूरकुंडलांगदमंडितं |
नीलालकं विशालाक्षं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||34||

ब्रह्म-रुद्रेंद्र-गरुड-किन्नरो-रग-राक्षसैः |
संसेव्यमानदरणं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||35||

हृत्पद्मकर्णिकामध्ये मुनिभिर्मनसाऽर्चितं |
भक्तकल्पद्रुमं शांतं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||36||

हृषीकेशं हृषीकानां लियामकमरिंदमं |
हृषीकमलदातारं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||37||

योंतः प्रविश्य सततं धारयेन्निखिलाकृतिं | 
प्रापयंतं फलं नित्यं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||38||

विपदां परिहर्तारं दातारं सर्वसंपदां |
कर्तारं सर्वलोकानां श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||39||

हिरण्याक्षवधोद्दंडबाहुदंडमहीधरं |
दंडितेंद्रियहृद्वासं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||40||

दंष्ट्राकरालवदनं भृकुटी कुटिलेक्षणं |
स्फटिकातृणिभातारं श्रीमुष्णेशं नमाम्यहं ||41||

श्रीशंकरः --
इति राजा स्तुवन्नास्ते श्रीमुष्णेवासमावहन |
उद्वेला अभवन्सर्वे समुद्रात्कालचोदिताः ||42||

एकार्णवमभोत् तत्र पश्यति-क्षितिशेश्वरं |
अभ्रांतोयोगमारूढं निरीक्ष्य प्रलयं तथा ||43||

आत्मन्यात्मानमादाय परेब्रह्मनितिष्कले |
सजहोभोदिकं देहं प्रविवेशाच्युतोदरं ||44||

प्रवृत्तेस्मिन् ब्रह्मकल्पे स राजा च शतक्रतुः |
यज्ञे पुरंदरो नाम देवानामग्रणीर्बली ||45||

देव-दानव-गंधर्व-यक्ष-राक्षस-किन्नरैः |
संगीयमान-सत्कीर्तिः अप्सरो-गण-सेवितः ||46||

पत्नी स धुनी शचीनाम्ना ललनानां शिरोमणिः |
देवेंद्र इति विख्यातः त्रैलोक्यादि पतिर्विभुः ||47||

कथितं प्राप्तुमखिलं श्रीमुष्णेशः प्रसादतः |
एवमन्ये च भूपालाः देवाश्च ऋषयोऽपरे ||48||

यक्ष-किन्नर-साध्याश्च श्रीमुष्ण-क्षेत्रवासिनः |
सिद्धिमापुर्महात्मानो योगिनामपि दुर्लभं ||49||

देवाश्च-सिद्ध-संकल्पाः मुनयोऽमलचेतसः |
श्रीमुष्णे-वासमिच्छंति मनुष्याणां तु का कथा ||50||

श्रीमुष्णेशसमोदेवः क्षेत्रं श्रीमुष्णसन्निभं |
विचारितेषु शास्त्रेषु नास्ति नास्ति न संशयः ||51||

श्रुत्वा श्रीमुष्णमाहात्म्यं दृष्ट्वा श्रीमुष्णनायकं |
स्नात्वा श्रीमुष्णतीर्थेषु पुनर्जन्म न विद्यते ||52||

सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते |
श्रीमुष्णे मरणादेव मुक्तिमेति न संशयः ||53||

ब्रह्मज्ञानमृतेत्वापि मुक्तिर्नैवोपजायते |
गंगायां तारकब्रह्म-ज्ञानं सोपतिशेद्धरः ||54||

श्रीमुष्णे गरुडो ब्रह्मज्ञानं चोपतिसत्यलं |
श्रीमुष्णेशवराहस्य परितो योजनत्रयं ||55||

गयाप्रयागकाशीद्यः सत्ये शतगुणाधिकं |
तस्मान्नारद संसेव्यं श्रीमुष्णं पापनाशनं ||56||

श्रीमुष्णाभिमुखो भूत्वा सदा वृद्धाचले मुने |
तपश्चरं वसाव्यंग श्रीमुष्णेशं च विनयन् ||57||

इति श्रीब्रह्मांडपुराणे श्रीमुष्णमाहात्म्ये शंकर-नारद-संवादे
श्रीवराहस्तोत्रं-नाम एकादशोद्यायः ||
 

अर्थ

श्री वराह स्तोत्रम् ब्रह्मांड पुराण के श्रीमुष्ण महात्म्य से लिया गया एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। यह श्रीमुष्ण क्षेत्र से संबंधित है, जहाँ एक अत्यंत भक्त राजा ने नित्य पुष्करिणी में स्नान करके, शुद्ध और जितेंद्रिय होकर, अश्वत्थ वृक्ष के नीचे बैठकर श्रीमुष्णेश्वर भगवान वराह मूर्ति की स्तुति की थी। यह स्तोत्र भगवान के उस दिव्य स्वरूप का प्रतिपादन करता है जो सृष्टि, स्थिति और लय के कर्ता, यज्ञ वराह मूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

राजा शुद्ध स्फटिक के समान वर्ण वाले, पूर्ण चंद्रमा के समान मुख वाले, अपनी भुजाओं को कटि पर रखे हुए श्रीमुष्णेश्वर को नमस्कार करते हुए स्तोत्र का आरंभ करते हैं। वे भगवान को समस्त लोकों का सृष्टा, सभी प्राणियों का प्रेरक और पालनीय जीवों का पालक बताते हैं। राजा भगवान की महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं कि प्रलय काल में संहार करने वाले, मध्यकाल में रक्षण करने वाले और अपने भक्तों को वैराग्य प्रदान करने वाले आप ही हैं। चिदानंदघन, पूर्ण, सभी दोषों से रहित और सर्वव्यापी भगवान ही समस्त लोकों के स्वामी हैं। यह संपूर्ण चराचर जगत भगवान से ही व्याप्त है, वे बाहर और भीतर सर्वदा विद्यमान हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान काल सब उनके अधीन हैं और वे ही सदैव सबको प्रेरित करने वाले हैं।

भगवान वराह आदि-अंत रहित, निर्गुण और सर्वानंद स्वरूप हैं। वे भक्तों पर सदैव कृपा के सागर हैं, कमलाक्ष, कमलपति, वेदवेद्य और सनातन हैं। अपने हाथों में गदा धारण कर दुष्ट दैत्यों का विनाश करने वाले आप ही हैं। कमल से उत्पन्न ब्रह्मा के भी आप ही पिता हैं, ऐसा राजा स्तुति करते हैं। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर भगवान अश्वत्थ वृक्ष के नीचे वराह रूप में प्रकट हुए थे। वे नित्य पुष्करिणी के तट पर निवास करते हैं, वनमाला धारण किए हुए हैं और मुनियों के हृदय में स्थित हैं।

आप ही यज्ञमूर्ति, यज्ञपति, यज्ञकर्ता और यज्ञस्वरूप हैं। भयभीत प्राणियों को अभय प्रदान करने वाले, सहस्र नेत्रों और सहस्र मुखों वाले, सदैव मंगल करने वाले आप ही हैं। आप ही ज्ञानमूर्ति, कामदाता और मुक्तिदाता हैं। बालयोगशायी, क्षीरसागर में शयन करने वाले और वैकुण्ठवासी आप ही हैं। वासुदेव, जगत की जड़ता को हरने वाले, धर्मरूप और धर्मरक्षक श्रीमुष्णेश्वर ही परम परात्पर, दामोदर और हृषीकेश हैं। आपके नाम का स्मरण करोड़ों जन्मों के पापों को नष्ट कर देता है। आपका रूप करोड़ों सूर्यों के तेज और करोड़ों चंद्रमाओं के प्रकाश के समान है। ब्रह्मा, रुद्र, गरुड़, यक्ष, किन्नर, राक्षस सभी आपके सेवक हैं। आपके चरण कमल मुनियों के ध्यान कमलों के मध्य सुशोभित हैं। आप इस जगत में प्रवेश करके प्रत्येक कृति को धारण करते हैं। आप ही रक्षक, दाता, हिरण्याक्ष का संहार करने वाले, गदाधारी और दाढ़ों से विकराल मुख वाले हैं, ऐसा राजा प्रार्थना करते हैं। भगवान शिव बताते हैं कि राजा द्वारा स्तुति करते ही समुद्र उमड़ पड़ा और वराह मूर्ति योगमुद्रा में प्रकट होकर सृष्टि के प्रलय को स्थिर किया। श्रीमुष्ण वराह के दर्शन या पूजा करने वाले पुनर्जन्म से मुक्त हो जाते हैं। श्रीमुष्ण की यात्रा का पुण्य गया, काशी और प्रयाग से सौ गुना अधिक है।

लाभ (Benefits):

  • पाप मुक्ति: श्री वराह स्तोत्र के नियमित पाठ से करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं, जिससे साधक को आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त होती है।
  • अभय और साहस: भयभीत प्राणियों को अभय प्रदान करने वाले भगवान वराह की स्तुति करने से भक्तों को निर्भयता और आंतरिक साहस की प्राप्ति होती है।
  • ज्ञान और मोक्ष: यह स्तोत्र भगवान को ज्ञानमूर्ति और मुक्तिदाता के रूप में वर्णित करता है, जिसके पाठ से आध्यात्मिक ज्ञान की वृद्धि होती है और अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • मनोकामना पूर्ति: भगवान वराह को कामदाता (इच्छाओं को पूर्ण करने वाला) बताया गया है, अतः इस स्तोत्र के पाठ से भक्तों की सभी सकारात्मक मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
  • संरक्षण और समृद्धि: सृष्टि, स्थिति और लय के स्वामी तथा धर्मरक्षक भगवान वराह की स्तुति करने से भक्तों को सभी प्रकार की सुरक्षा मिलती है और जीवन में समृद्धि आती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री वराह स्तोत्रं क्या है?
श्री वराह स्तोत्रं ब्रह्मांड पुराण के श्रीमुष्ण महात्म्य से लिया गया एक पवित्र स्तोत्र है। यह सृष्टि, स्थिति और लय के कर्ता भगवान श्री वराह मूर्ति की महिमा का गुणगान करता है।
श्री वराह स्तोत्रं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद, शुद्ध होकर और शांत मन से करना चाहिए। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
इस स्तोत्र के पाठ से क्या प्रमुख लाभ प्राप्त होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट होते हैं, भय से मुक्ति मिलती है, साहस की प्राप्ति होती है, ज्ञान और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है तथा सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
श्री वराह स्तोत्रं का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान वराह के भक्त, जीवन में कष्टों का सामना कर रहे लोग, आध्यात्मिक ज्ञान और मोक्ष की इच्छा रखने वाले तथा अपनी सकारात्मक मनोकामनाओं की पूर्ति चाहने वाले इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन कम से कम एक बार या तीन, पांच, ग्यारह बार किया जा सकता है। अधिक लाभ के लिए 108 बार जप करना शुभ माना जाता है।
श्री वराह स्तोत्रं का उद्गम या स्रोत क्या है?
श्री वराह स्तोत्रं का मूल स्रोत ब्रह्मांड पुराण में वर्णित श्रीमुष्ण महात्म्य है। यह स्तोत्र श्रीमुष्ण क्षेत्र में एक राजा द्वारा भगवान वराह की स्तुति के रूप में प्रकट हुआ था।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...