श्री वराह स्तुतिः (वराहपुराणे)
ब्रह्मादय ऊचुः |
जय देव महापोत्रिन् जय भूमिधराच्युत |
हिरण्याक्षमहारक्षोविदारणविचक्षण || 1 ||
त्वमनादिरनंतश्च त्वत्तः परतरो न हि |
त्वमेव सृष्टिकालेऽपि विधिर्भूत्वा चतुर्मुखः || 2 ||
सृजस्येतज्जगत्सर्वं पासि विष्णुः समंततः | [विश्वं]
कालाग्निरुद्ररूपी च कल्पांते सर्वजंतुषु || 3 ||
अंतर्यामी भवान् देव सर्वकर्ता त्वमेव हि |
निष्कृष्टं ब्रह्मणो रूपं न जानंति सुरास्तव || 4 ||
प्रसीद भगवन् विष्णो भूमिं स्थापय पूर्ववत् |
सर्वप्राणिनिवासार्थमस्तुवन् विबुधव्रजाः || 5 ||
इति श्रीवरहपुराणे वेंकटाचलमाहात्म्ये देवकृत श्री वराह स्तुतिः |
अर्थ
ब्रह्मादि देवताओं ने श्री महावराह मूर्ति के दर्शन कर, पृथ्वी को बचाने के उपरांत उन्हें जो स्तोत्र समर्पित किया, वह “श्री वराह स्तुति” के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्तोत्र वराह पुराण में वर्णित है और भगवान विष्णु के वराह अवतार की महिमा का गुणगान करता है। सृष्टि, स्थिति और लय के मूल कारण, परमात्मा के सर्वोच्च स्वरूप को इस स्तोत्र में देवताओं द्वारा सराहा गया है।
इस स्तोत्र का गहरा अर्थ इस प्रकार है: 1. जय जय देव महापोत्रिन्...: देवता वराह देव को "महापोत्रिन्" (महान वराह) कहकर संबोधित करते हैं और उनकी विजय की घोषणा करते हैं। वे उन्हें "भूमिधराच्युत" कहकर स्तुति करते हैं, जिन्होंने पृथ्वी को अपने दाँतों पर धारण कर उसकी रक्षा की। हिरण्याक्ष नामक महादानव का संहार करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। यह श्लोक बताता है कि उनका यह कार्य यज्ञ स्वरूप है और उनका रूप दिव्य शक्ति से युक्त है।
2. त्वमनादि रनंतश्च...: देवता स्पष्ट करते हैं कि वराह देव अनादि और अनंत हैं, उनसे बढ़कर कोई नहीं है। सृष्टि के समय, वे ही ब्रह्मा का रूप धारण कर, चतुर्मुख होकर सृष्टि कार्य का आरंभ करते हैं। यह दर्शाता है कि परमात्मा किस प्रकार सृष्टिकर्ता के रूप में प्रकट होते हैं।
3. सृजस्येतज्जगत्सर्वं...: भगवान विष्णु ही इस समस्त जगत् की सृष्टि करते हैं, और फिर विष्णु रूप में उसका पालन-पोषण करते हैं। कल्प के अंत में, वे ही कालाग्निरुद्र का रूप धारण कर समस्त जीव-जंतुओं को अपने में विलीन कर लेते हैं। इस प्रकार, सृष्टि, स्थिति और लय तीनों एक ही परमात्मा द्वारा संचालित होते हैं, यह श्लोक इस सत्य को उद्घाटित करता है।
4. अंतर्यामी भवान देव...: देवता वराह देव को "अंतर्यामी" (सभी के भीतर निवास करने वाले) और "सर्वकर्ता" (सभी कार्यों के कर्ता) के रूप में स्तुति करते हैं। यह श्लोक उनके अलौकिक और अगम्य स्वरूप पर जोर देता है कि उनका वास्तविक, निष्कृष्ट ब्रह्म स्वरूप देवताओं द्वारा भी पूरी तरह से समझा नहीं जा सकता। वे सभी जीवों के आधार और प्रेरक शक्ति हैं।
5. प्रसीद भगवन विष्णो...: अंत में, सभी देवता मिलकर भगवान विष्णु से प्रार्थना करते हैं: "हे भगवन विष्णु, प्रसन्न हों। पृथ्वी को उसकी मूल स्थिति में वापस स्थापित करें, ताकि सभी जीव उस पर निवास कर सकें।" यह प्रार्थना वराह अवतार के मुख्य उद्देश्य - पृथ्वी के उद्धार पर जोर देती है और सभी लोकों के कल्याण के लिए देवताओं की इच्छा को व्यक्त करती है।
लाभ (Benefits):
- भय निवृत्ति: इस स्तोत्र के पाठ से मन का भय दूर होता है और साहस तथा स्थिरता प्राप्त होती है।
- स्थिरता और समृद्धि: भूमि तत्व से संबंधित समस्याएं दूर होती हैं, जीवन में स्थिरता, आर्थिक समृद्धि और शांति प्राप्त होती है।
- सुरक्षा: भगवान वराह दुष्ट शक्तियों और नकारात्मक प्रभावों से रक्षा प्रदान करते हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति: यह स्तोत्र भक्तों में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाता है, जिससे परमात्मा के साथ गहरा संबंध स्थापित होता है।
- मनोकामना पूर्ति: भूमि, संपत्ति और घर से संबंधित बाधाएं दूर होती हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री वराह स्तुति क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री वराह स्तुति के पाठ से क्या प्रमुख लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री वराह स्तुति का मूल स्रोत क्या है?
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