श्री वराह कवचं
आद्यं रंगमिति प्रोक्तं विमानं रंग संज्ञितं |
श्रीमुष्णं वेंकटाद्रिं च सालग्रामं च नैमिशं||
तोताद्रिं पुष्करं चैव नरनारायणाश्रमं |
अष्टौ मे मूर्तयः संति स्वयं व्यक्ता महीतले||
श्री सूत उवाच |
श्रीरुद्रमुख निर्णीत मुरारि गुणसत्कथा |
संतुष्टा पार्वती प्राह शंकरं लोकशंकरं ||1||
श्री पार्वती उवाच |
श्रीमुष्णेशस्य माहात्म्यं वराहस्य महात्मनः |
श्रुत्वा तृप्तिर्न मे जाता मनः कौतूहलायते |
श्रोतुं तद्देव माहात्म्यं तस्माद्वर्णय मे पुनः ||2||
श्री शंकर उवाच |
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि श्रीमुष्णेशस्य वैभवं |
यस्य श्रवणमात्रेण महापापैः प्रमुच्यते |
सर्वेषामेव तीर्थानां तीर्थ राजोऽभिधीयते ||3||
नित्य पुष्करिणी नाम्नी श्रीमुष्णे या च वर्तते |
जाता श्रमापहा पुण्या वराह श्रमवारिणा ||4||
विष्णोरंगुष्ठ संस्पर्शात्पुण्यदा खलु जाह्नवी |
विष्णोः सर्वांगसंभूता नित्यपुष्करिणी शुभा ||5||
महानदी सहस्त्रेण नित्यदा संगता शुभा |
सकृत्स्नात्वा विमुक्ताघः सद्यो याति हरेः पदं ||6||
तस्या आग्नेय भागे तु अश्वत्थच्छाययोदके |
स्नानं कृत्वा पिप्पलस्य कृत्वा चापि प्रदक्षिणं ||7||
दृष्ट्वा श्वेतवराहं च मासमेकं नयेद्यदि |
कालमृत्युं विनिर्जित्य श्रिया परमया युतः ||8||
आधिव्याधि विनिर्मुक्तो ग्रहपीडाविवर्जितः |
भुक्त्वा भोगाननेकांश्च मोक्षमंते व्रजेत् ध्रुवं ||9||
अश्वत्थमूलेऽर्कवारे नित्य पुष्करिणी तटे |
वराहकवचं जप्त्वा शतवारं जितेंद्रियः ||10||
क्षयापस्मारकुष्ठाद्यैः महारोगैः प्रमुच्यते |
वराहकवचं यस्तु प्रत्यहं पठते यदि ||11||
शत्रु पीडाविनिर्मुक्तो भूपतित्वमवाप्नुयात् |
लिखित्वा धारयेद्यस्तु बाहुमूले गलेऽथ वा ||12||
भूतप्रेतपिशाचाद्याः यक्षगंधर्वराक्षसाः |
शत्रवो घोरकर्माणो ये चान्ये विषजंतवः |
नष्ट दर्पा विनश्यंति विद्रवंति दिशो दश ||13||
श्रीपार्वती उवाच |
तद्ब्रूहि कवचं मह्यं येन गुप्तो जगत्त्रये |
संचरेद्देववन्मर्त्यः सर्वशत्रुविभीषणः |
येनाप्नोति च साम्राज्यं तन्मे ब्रूहि सदाशिव ||14||
श्रीशंकर उवाच |
शृणु कल्याणि वक्ष्यामि वाराहकवचं शुभं |
येन गुप्तो लभेन्मर्त्यो विजयं सर्वसंपदं ||15||
अंगरक्षाकरं पुण्यं महापातकनाशनं |
सर्वरोगप्रशमनं सर्वदुर्ग्रहनाशनं ||16||
विषाभिचार कृत्यादि शत्रुपीडानिवारणं |
नोक्तं कस्यापि पूर्वं हि गोप्यात्गोप्यतरं यतः ||17||
वराहेण पुरा प्रोक्तं मह्यं च परमेष्ठिने |
युद्धेषु जयदं देवि शत्रुपीडानिवारणं ||18||
वराहकवचात् गुप्तो नाशुभं लभते नरः |
वराहकवचस्यास्य ऋषिर्ब्रह्मा प्रकीर्तितः ||19||
छंदोऽनुष्टुप् तथा देवो वराहो भूपरिग्रहः |
प्रक्षाल्य पादौ पाणी च सम्यगाचम्य वारिणा ||20||
कृत स्वांग करन्यासः सपवित्र उदंमुखः |
ॐ भूर्भवस्सुवरिति नमो भूपतयेऽपि च ||21||
नमो भगवते पश्चात्वराहाय नमस्तथा |
एवं षडंगं न्यासं च न्यसेदंगुलिषु क्रमात् ||22||
नमः श्वेतवराहाय महाकोलाय भूपते |
यज्ञांगाय शुभांगाय सर्वज्ञाय परात्मने ||23||
स्रव तुंडाय धीराय परब्रह्मस्वरूपिणे |
वक्रदंष्ट्राय नित्याय नमोऽंतैर्नामभिः क्रमात् ||24||
अंगुलीषु न्यसेद्विद्वान् करपृष्ठतलेष्वपि |
ध्यात्वा श्वेतवराहं च पश्चान्मंत्रमुदीरयेत् ||25||
ध्यानं |
ॐ श्वेतं वराहवपुषं क्षितिमुद्धरंतं
शंघारिसर्व वरदाभय युक्त बाहुं |
ध्यायेन्निजैश्च तनुभिः सकलैरुपेतं
पूर्णं विभुं सकलवांछितसिद्धयेऽजं ||26||
कवचं |
वराहः पूर्वतः पातु दक्षिणे दंडकांतकः |
हिरण्याक्षहरः पातु पश्चिमे गदया युतः ||27||
उत्तरे भूमिहृत्पातु अधस्ताद्वायुवाहनः |
ऊर्ध्वं पातु हृषीकेशो दिग्विदिक्षु गदाधरः ||28||
प्रातः पातु प्रजानाथः कल्पकृत्संगमेऽवतु |
मध्याह्ने वज्रकेशस्तु सायाह्ने सर्वपूजितः ||29||
प्रदोषे पातु पद्माक्षो रात्रौ राजीवलोचनः |
निशींद्र गर्वहा पातु पातूषः परमेश्वरः ||30||
अटव्यामग्रजः पातु गमने गरुडासनः |
स्थले पातु महातेजाः जले पात्ववनीपतिः ||31||
गृहे पातु गृहाध्यक्षः पद्मनाभः पुरोऽवतु |
झिल्लिका वरदः पातु स्वग्रामे करुणाकरः ||32||
रणाग्रे दैत्यहा पातु विषमे पातु चक्रभृत् |
रोगेषु वैद्यराजस्तु कोलो व्याधिषु रक्षतु ||33||
तापत्रयात्तपोमूर्तिः कर्मपाशाच्च विश्वकृत् |
क्लेशकालेषु सर्वेषु पातु पद्मापतिर्विभुः ||34||
हिरण्यगर्भसंस्तुत्यः पादौ पातु निरंतरं |
गुल्फौ गुणाकरः पातु जंघे पातु जनार्दनः ||35||
जानू च जयकृत्पातु पातूरू पुरुषोत्तमः |
रक्ताक्षो जघने पातु कटिं विश्वंभरोऽवतु ||36||
पार्श्वे पातु सुराध्यक्षः पातु कुक्षिं परात्परः |
नाभिं ब्रह्मपिता पातु हृदयं हृदयेश्वरः ||37||
महादंष्ट्रः स्तनौ पातु कंठं पातु विमुक्तिदः |
प्रभंजन पतिर्बाहू करौ कामपिताऽवतु ||38||
हस्तौ हंसपतिः पातु पातु सर्वांगुलीर्हरिः |
सर्वांगश्चिबुकं पातु पात्वोष्ठौ कालनेमिहा ||39||
मुखं तु मधुहा पातु दंतान् दामोदरोऽवतु |
नासिकामव्ययः पातु नेत्रे सूर्येंदुलोचनः ||40||
फालं कर्मफलाध्यक्षः पातु कर्णौ महारथः |
शेषशायी शिरः पातु केशान् पातु निरामयः ||41||
सर्वांगं पातु सर्वेशः सदा पातु सतीश्वरः |
इतीदं कवचं पुण्यं वराहस्य महात्मनः ||42||
यः पठेत् शृणुयाद्वापि तस्य मृत्युर्विनश्यति |
तं नमस्यंति भूतानि भीताः सांजलिपाणयः ||43||
राजदस्युभयं नास्ति राज्यभ्रंशो न जायते |
यन्नाम स्मरणात्भीताः भूतवेताळराक्षसाः ||44||
महारोगाश्च नश्यंति सत्यं सत्यं वदाम्यहं |
कंठे तु कवचं बद्ध्वा वंध्या पुत्रवती भवेत् ||45||
शत्रुसैन्य क्षय प्राप्तिः दुःखप्रशमनं तथा |
उत्पात दुर्निमित्तादि सूचितारिष्टनाशनं ||46||
ब्रह्मविद्याप्रबोधं च लभते नात्र संशयः |
धृत्वेदं कवचं पुण्यं मांधाता परवीरहा ||47||
जित्वा तु शांबरीं मायां दैत्येंद्रानवधीत्क्षणात् |
कवचेनावृतो भूत्वा देवेंद्रोऽपि सुरारिहा ||48||
भूम्योपदिष्टकवच धारणान्नरकोऽपि च |
सर्वावध्यो जयी भूत्वा महतीं कीर्तिमाप्तवान् ||49||
अश्वत्थमूलेऽर्कवारे नित्य पुष्करिणीतटे |
वराहकवचं जप्त्वा शतवारं पठेद्यदि ||50||
अपूर्वराज्य संप्राप्तिं नष्टस्य पुनरागमं |
लभते नात्र संदेहः सत्यमेतन्मयोदितं ||51||
जप्त्वा वराहमंत्रं तु लक्षमेकं निरंतरं |
दशांशं तर्पणं होमं पायसेन घृतेन च ||52||
कुर्वन् त्रिकालसंध्यासु कवचेनावृतो यदि |
भूमंडलाधिपत्यं च लभते नात्र संशयः ||53||
इदमुक्तं मया देवि गोपनीयं दुरात्मनां |
वराहकवचं पुण्यं संसारार्णवतारकं ||54||
महापातककोटिघ्नं भुक्तिमुक्तिफलप्रदं |
वाच्यं पुत्राय शिष्याय सद्वृत्ताय सुधीमते ||55||
श्री सूतः –
इति पत्युर्वचः श्रुत्वा देवी संतुष्टमानसा |
विनायक गुहौ पुत्रौ प्रपेदे द्वौ सुरार्चितौ ||56||
कवचस्य प्रभावेन लोकमाता च पार्वती |
य इदं शृणुयान्नित्यं यो वा पठति नित्यशः |
स मुक्तः सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके महीयते ||57||
इति श्रीवराह कवचं संपूर्णं |
अर्थ
श्री वराह कवचम् भगवान विष्णु के वराह अवतार को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और रक्षात्मक स्तोत्र है। इसे वेदों और पुराणों की परंपरा में, विशेष रूप से श्रीमुष्ण (श्रीमुष्णेश) में वराह रूप की स्तुति करते हुए, गुप्त सुरक्षा, धन-संपदा, राज्यवर्धन और संकट-नाशक गुणों का वर्णन करने वाला बताया गया है। यह कवचम भगवान शिव द्वारा देवी पार्वती को उपदेशित किया गया था, जहाँ उन्होंने वराह देव की महिमा और इस कवच के गहन लाभों का विस्तार से वर्णन किया।
इस कवच का आध्यात्मिक महत्व भगवान वराह के उस दिव्य कार्य से जुड़ा है जब उन्होंने पृथ्वी को हिरण्याक्ष राक्षस से बचाया और उसे अपने दाँतों पर उठाकर पुनः स्थापित किया। यह घटना धर्म और सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान के अदम्य संकल्प को दर्शाती है। श्री वराह कवचम् का पाठ करने से भक्त उस सुरक्षात्मक ऊर्जा से जुड़ते हैं, जो उन्हें सभी प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक खतरों से बचाती है। यह केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक कवच है जो व्यक्ति के शरीर, मन और आत्मा को नकारात्मक प्रभावों से आच्छादित करता है।
कवच में श्रीमुष्ण क्षेत्र में स्थित 'नित्य पुष्करिणी' की महिमा का विशेष उल्लेख है। यह पवित्र जल भगवान वराह के परिश्रम से उत्पन्न हुआ है और इसे गंगा नदी से भी अधिक पवित्र माना जाता है। इस पुष्करिणी में स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है और असीम पुण्य की प्राप्ति होती है। कवच के प्रत्येक श्लोक में शरीर के विभिन्न अंगों (सिर, गर्दन, भुजाएं, पैर आदि) की रक्षा के लिए विशिष्ट देवताओं और शक्तियों का आह्वान किया जाता है, जिससे भक्त को सर्वांगीण सुरक्षा प्राप्त होती है। यह `न्यास` की अवधारणा को भी स्पष्ट करता है, जहाँ शरीर के विभिन्न भागों में देवताओं का आह्वान करके उन्हें सशक्त किया जाता है।
श्री वराह कवचम् को भक्तिपूर्वक पाठ करने, भोजपत्र पर लिखकर धारण करने या पूजा स्थल पर रखने से अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं। यह शत्रुओं का नाश करता है, गंभीर रोगों से मुक्ति दिलाता है, सभी प्रकार के शाप और तांत्रिक बाधाओं को दूर करता है, संतान, धन, राजसी कृपा और अंततः मोक्ष प्रदान करता है। जो भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ इसका पाठ करते हैं, उनके जीवन से सभी बाधाएँ दूर होती हैं और उन्हें शांति, समृद्धि और सुरक्षा मिलती है।
लाभ (Benefits):
- शत्रु नाश और सुरक्षा: इस कवच के पाठ से शत्रु परास्त होते हैं और सभी प्रकार के भय, भूत-प्रेत तथा राक्षसी बाधाओं से पूर्ण सुरक्षा मिलती है। यह नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा करता है।
- महामारी और रोग निवारण: गंभीर बीमारियों और असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को इस कवच के नियमित पाठ से स्वास्थ्य लाभ होता है और वे रोगों से मुक्त होते हैं।
- धन, संतान और राजसी कृपा: यह कवच धन-धान्य की वृद्धि करता है, निःसंतान दंपतियों को योग्य संतान प्रदान करता है और उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों को राजसी सम्मान व सफलता दिलाता है।
- तांत्रिक और बुरी शक्तियों से मुक्ति: मंत्र-तंत्र, जादू-टोना और अन्य प्रकार की तांत्रिक बाधाओं तथा बुरी शक्तियों के प्रभाव से मुक्ति पाने में यह कवच अत्यंत प्रभावी है।
- पाप नाश और मोक्ष: इसके नियमित पाठ से जाने-अनजाने में किए गए पापों का नाश होता है और अंततः व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़कर मोक्ष की प्राप्ति करता है।
- सर्वांगीण कल्याण: यह कवच जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता, शांति और सद्भाव प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति का सर्वांगीण कल्याण सुनिश्चित होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री वराह कवचम् क्या है?
श्री वराह कवचम् का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री वराह कवचम् के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
श्री वराह कवचम् का पाठ कौन कर सकता है?
इस कवच का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
श्री वराह कवचम् का उद्भव या पृष्ठभूमि क्या है?
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