- ॐ श्रीमते नमः
- ॐ वराहाय नमः
- ॐ सिंहाद्रिवासाय नमः
- ॐ श्रीवत्सलक्षणाय नमः
- ॐ अश्रिताभीष्टवरदाय नमः
- ॐ अमेयाय नमः
- ॐ चतुर्भुजाय नमः
- ॐ चंदन प्रविलिप्तांगाय नमः
- ॐ सार्वभौमाय नमः
- ॐ दुष्टभू भृद्धराय नमः
- ॐ स्वामिने नमः
- ॐ राजाराजार्चितायःप्रभवे नमः
- ॐ पाताळांतस्थ पादाबाय नमः
- ॐ भक्तजीवनदाय नमः
- ॐ पुंसे नमः
- ॐ यज्ञमूर्तये नमः
- ॐ यज्ञसाक्षिणे नमः
- ॐ यज्ञभुजे नमः
- ॐ यज्ञरक्षकाय नमः
- ॐ महायज्ञवराहाय नमः
- ॐ महाकारुण्यरूपधृते नमः
- ॐ घर्घराराव निर्दूत शात्रवाय नमः
- ॐ श्रीकराय नमः
- ॐ शुचये नमः
- ॐ महाब्धेस्तेरवासाय नमः
- ॐ महातेजसे नमः
- ॐ प्रह्लादार्चित पादाभाय नमः
- ॐ प्रभुसत्तमासेविताय नमः
- ॐ दिव्यवैभव संयुक्ताय नमः
- ॐ श्रीनिवासाय नमः
- ॐ कृपानिधये नमः
- ॐ श्रीरमाधिष्टितोरसे नमः
- ॐ श्रितभक्तार्तिनाशकाय नमः
- ॐ विशाखपट्टणाधीशाय नमः
- ॐ सर्वरोगोपहाय नमः
- ॐ प्रभवे नमः
- ॐ हिरण्याक्ष निहंत्रे नमः
- ॐ हिरण्मय विभूषणाय नमः
- ॐ सिंहाद्रिशिखरावासिने नमः
- ॐ आंध्रभूपार्तिताय नमः
- ॐ स्वराजे नमः
- ॐ चंदनालंकृताय नमः
- ॐ मंदारसममाल्यवते नमः
- ॐ वज्ररोमधराय नमः
- ॐ विष्णवे नमः
- ॐ वेदव्यासमुनिस्तुताय नमः
- ॐ श्वेतरुचे नमः
- ॐ श्वेतदृशे नमः
- ॐ श्वेतदंष्ट्रिकातुंड मंडिताय नमः
- ॐ मनोहराय नमः
- ॐ शंखचक्रगदा अभयधराय नमः
- ॐ हरये नमः
- ॐ पाताळमग्न भूदेवी रक्षकाय नमः
- ॐ शौनकाय नमः
- ॐ स्वभुवे नमः
- ॐ स्वामि पुष्करिणी तीरवासाय नमः
- ॐ वेंकटाश्रयाय नमः
- ॐ कुंदमंदार पुन्नाग पारिजातार्चन प्रियाय नमः
- ॐ ताळोत्तुंगमहादिव्य विमानांतर संस्थिताय नमः
- ॐ महामंटपयुक्तायनमः
- ॐ यतिराजसमर्चितायनमः
- ॐ भूशयाय नमः
- ॐ भूप्रियाय नमः
- ॐ भूतये नमः
- ॐ भूनाति प्रियाय नमः
- ॐ अच्युताय नमः
- ॐ सुलभाय नमः
- ॐ सुरशाय नमः
- ॐ स्थूलाय नमः
- ॐ सूक्ष्माय नमः
- ॐ सर्वगुहाशयाय नमः
- ॐ सर्वात्मने नमः
- ॐ सर्वलोकात्मने नमः
- ॐ रमालिंगिततोषिताय नमः
- ॐ भक्ताभयप्रदाय नमः
- ॐ भक्तवांछितार्थाय नमः
- ॐ जगत्पतये नमः
- ॐ जगद्धात्रे नमः
- ॐ जगत्तात्रे नमः
- ॐ जगन्नेत्रे नमः
- ॐ जगत्पित्रे नमः
- ॐ चिदचिद्रविटणाय नमः
- ॐ शांगिणे नमः
- ॐ शंखिने नमः
- ॐ चक्रिणे नमः
- ॐ गदिने नमः
- ॐ जयिने नमः
- ॐ श्री घनाय नमः
- ॐ श्री निधानाय नमः
- ॐ श्रियै नमः
- ॐ श्रियःपतये नमः
- ॐ श्रीमतांवराय नमः
- ॐ धर्मकृते नमः
- ॐ धर्मभृते नमः
- ॐ धर्मिणे नमः
- ॐ धर्मरूपिणे नमः
- ॐ धनंजयाय नमः
- ॐ परात्पराय नमः
- ॐ शेषिणे नमः
- ॐ पद्ममालाप्रियाय नमः
- ॐ समाय नमः
- ॐ श्रीमल्लक्ष्मीवराहाय नमः
- ॐ निर्णेतुकदयांबुधये नमः
- ॐ प्रणताभयदाय नमः
- ॐ श्रीशाय नमः
- ॐ प्रणवात्म स्वरूपाय नमः
- ॐ सर्वभक्तभयापहाय नमः
- ॐ श्रीलक्ष्मीवराहाय नमः
|| इति श्री लक्ष्मीवराह अष्टोत्तर शतनामावळि संपूर्णं ||
अर्थ
श्री लक्ष्मीवराह अष्टोत्तर शतनामावली भगवान विष्णु के वराह अवतार को समर्पित 108 पवित्र नामों का एक संग्रह है। यह नामावली भगवान श्री वराह मूर्ति के दिव्य गुणों, महत्व और शक्तियों का गुणगान करती है। चूंकि देवी लक्ष्मी भगवान वराह के साथ निवास करती हैं, यह स्तोत्र भक्तों को धन, समृद्धि और आध्यात्मिक उत्थान प्रदान करता है। वराह अवतार उस कथा का स्मरण कराता है जब विष्णु ने हिरण्याक्ष नामक राक्षस से पृथ्वी की रक्षा के लिए सूअर का रूप धारण किया था, जो धर्म की रक्षा और भक्तों के पोषण का प्रतीक है।
इस अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ करने से भक्त भगवान वराह और देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करते हैं। प्रत्येक नाम भगवान के अनंत गुणों, लीलाओं और वैभव को प्रकट करता है। 'ॐ सिंहाद्रिवासाय नमः' नाम इंगित करता है कि भगवान सिंहाद्रि जैसे पवित्र स्थानों में निवास करते हैं, जो उन क्षेत्रों के स्थानीय महत्व को भी उजागर करता है। 'ॐ यज्ञमूर्तये नमः' नाम बताता है कि वराह यज्ञ का स्वरूप, यज्ञ का साक्षी और रक्षक है। यह भगवान की सृष्टि, स्थिति और लय के कार्यों में भूमिका को दर्शाता है।
इस नामावली में 'ॐ श्रीमते नमः' (समृद्धिशाली को नमस्कार), 'ॐ आश्रिताभीष्टवरदाय नमः' (शरणागत भक्तों की इच्छाओं को पूरा करने वाले को नमस्कार) और 'ॐ महाकारुण्यरूपधृते नमः' (महान करुणा का रूप धारण करने वाले को नमस्कार) जैसे नाम भगवान की दया, सुरक्षा और उदारता पर जोर देते हैं। 'ॐ घर्घराराव निर्दूत शत्रवाय नमः' नाम बताता है कि वराह की गर्जना ने शत्रुओं को नष्ट कर दिया, जो बुरी शक्तियों पर विजय का प्रतीक है। 'ॐ श्रीरमाधिष्ठितोरसे नमः' नाम वर्णन करता है कि देवी लक्ष्मी भगवान के वक्ष पर निवास करती हैं, जो धन और आध्यात्मिक शक्ति के अविभाज्य संबंध को दर्शाता है। यह नामावली विशाखापत्तनम के अधिदेवता के रूप में वराह स्वामी के स्थानीय महत्व को भी समाहित करती है।
इस पवित्र नामावली का पाठ मन को शांति, शरीर को शक्ति और जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है। भगवान वराह का स्मरण भक्तों को सभी बाधाओं से बचाता है और उनके जीवन में स्थिरता और समृद्धि लाता है। देवी लक्ष्मी की कृपा से, भक्तों को न केवल भौतिक धन मिलता है, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान और आंतरिक संतोष भी प्राप्त होता है। यह सभी कल्याण प्रदान करने वाला, सभी पापों को दूर करने वाला और मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाने वाला शक्तिशाली स्तोत्र है।
लाभ (Benefits):
- धन और समृद्धि: देवी लक्ष्मी के साथ वराह स्वामी की पूजा करने से भौतिक धन, वित्तीय स्थिरता और समृद्धि प्राप्त होती है।
- शत्रुओं का नाश और रक्षा: वराह की गर्जना के समान, यह स्तोत्र शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है, भक्तों को सुरक्षा प्रदान करता है।
- मानसिक शांति और स्थिरता: नियमित पाठ मन को शांति, स्थिरता और साहस प्रदान करता है, चिंता और तनाव को कम करता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: भगवान के दिव्य गुणों का स्मरण करने से भक्त आध्यात्मिक रूप से उन्नत होते हैं और मोक्ष के मार्ग पर प्रगति करते हैं।
- इच्छित फल की प्राप्ति: शरणागत भक्तों की इच्छाओं को पूरा करने वाले भगवान के गुण का स्मरण करने से, शुद्ध भक्ति से मांगी गई सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री लक्ष्मीवराह अष्टोत्तर शतनामावली क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री लक्ष्मीवराह अष्टोत्तर शतनामावली के पाठ के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस नामावली का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या महत्व क्या है?
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