श्री

श्री वराहाष्टकं

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स्तोत्र
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 श्री वराहाष्टकं

कमलायतनेत्राय कमलायतनोरसे |
वराहवपुषे दैत्यवराहवपुषे नमः ||1||

वामांसभूषायितविश्वधात्री
     वामस्तनन्यस्तकरारविंदः |
जिघ्रन मुखेनापि कपोलमेनां
     जीवातुरस्माकगुरोः स जीयात् ||2||

वेदिस्तनूराहवनीयमास्यं
     बहीं षि लोमानि जुहूश्च नासा |
शम्या च दंष्ट्राजनि यस्य यूपो
     वालो मखात्मा स पुनातु पोत्री ||3||

पापेन दैन्येन भवांबुराशौ
     निपातितं मां निरवग्रहोर्मौ |
धूतारिरद्धृत्य धरामिवोच्चैः
     कुर्यान्मुदं मे कुहनावराहः ||4||

वेशंतति व्रतजुषां हृदयं मुनीनां
     वेगापगाविहृतिकाननचंक्रमाणां |
मुस्तागणंति किल यस्य सुरारिवर्गाः
     कोलः स कोऽपि कुशलं कुरुतादजस्त्रं ||5||

कल्याणमंकुरति यस्य कटाक्षलेशा-
     द्यस्य प्रिया वसुमती सवनं यदंगं |
अस्मद्गुरोः कुलधनं चरणौ यदीयौ
     भूयः शुभं दिशतु भूमिवराह एषः ||6||

कल्पांतसंततधनाघननिर्विघात-
     निर्घातवातरवनिष्ठुरतारधीरं |
मायाकिटेबेधिरितगृहिणश्रवस्कं
     घोणापुटीघुरघुरारसितं पुनातु ||7||

झटिति विलुठदूर्मीचाटुवाचाटसिंधु-
     स्फुटपटहविदस्रस्फोटदीप्तोटमुद्यं |
खरखुरपुटघाताधूतखाटारिवाटः |
     कपटकिटिरघौघाटोपमुच्चाटयेन्नः ||8||

यत्कारिकादर्पणाख्यकृतिनावा भवांबुधिं |
संतस्तरंति वरदगुरवे श्रीमते नमः ||9||

इति श्रीवराहाष्टकं संपूर्णं |

अर्थ

श्री वराहाष्टकं भगवान विष्णु के तीसरे अवतार, श्री वराह मूर्ति को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब हिरण्याक्ष नामक एक महान राक्षस ने पृथ्वी को गहरे समुद्र में छिपा दिया था, तब भगवान विष्णु ने एक विशाल वराह (सूअर) का रूप धारण किया और अपने दाँतों पर पृथ्वी देवी (भूदेवी) को उठाकर उसकी रक्षा की। यह अष्टक उस दिव्य वराह रूप की महिमा, शक्ति, करुणा और पराक्रम की स्तुति करता है, जिससे भक्तों को संकटों से मुक्ति, सुरक्षा और आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त होता है।

यह स्तोत्र केवल पृथ्वी के उद्धार की कहानी नहीं है, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना, अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने की आध्यात्मिक यात्रा और भगवान की सर्वव्यापकता का प्रतीक है। श्री वराह मूर्ति को यज्ञ के स्वरूप के रूप में वर्णित किया गया है, जो त्याग, समर्पण और पवित्रता के महत्व को दर्शाता है। प्रत्येक श्लोक भगवान के विभिन्न दिव्य गुणों, उनकी लीलाओं और भक्तों पर उनकी अपार करुणा को उजागर करता है, जिससे भक्त भगवान के साथ गहरे आध्यात्मिक संबंध स्थापित कर पाते हैं।

इस अष्टक का प्रत्येक श्लोक वराह मूर्ति के दिव्य रूप और कार्यों का वर्णन करता है। पहला श्लोक कमल के समान नेत्रों वाले, लक्ष्मी के हृदय में निवास करने वाले, दैत्य हिरण्याक्ष का संहार करने वाले वराह रूप को नमन करता है। दूसरा श्लोक पृथ्वी देवी को अपनी बाईं भुजा पर धारण करने वाले, उनके मुख को प्रेम से सुवासित करने वाले, गुरुओं के भी गुरु वराह मूर्ति की विजय की घोषणा करता है। तीसरा श्लोक वराह मूर्ति के दिव्य शरीर को यज्ञवेदी, मुख को हवनाग्नि, रोमों को समिधा, दाँतों को यज्ञ के दंष्ट्रा और पूँछ को यज्ञ स्तंभ के रूप में वर्णित करता है। यह भगवान को यज्ञस्वरूप बताता है। चौथा श्लोक पाप और दुख से भरे संसार सागर में डूबे हुए भक्त को, जिस प्रकार पृथ्वी को समुद्र से ऊपर उठाया गया था, उसी प्रकार बचाने की प्रार्थना करता है।

पाँचवाँ श्लोक बताता है कि वराह मूर्ति की कृपा दृष्टि मुनियों के मन को पवित्र करती है और उनके नाम का श्रवण शत्रुओं के भय को दूर करता है। छठा श्लोक वर्णन करता है कि भगवान की एक दृष्टि मात्र से ही कल्याण का अंकुर फूटता है, पृथ्वी उनकी प्रिय पत्नी है, और उनके चरण हमारे वंश की संपत्ति हैं। सातवाँ श्लोक प्रलय काल की अशांति में भी वराह की स्थिरता और उनकी गर्जना की माया को भेदने की शक्ति का वर्णन करता है। अंत में, आठवाँ श्लोक कहता है कि जब समुद्र गर्जना करते हैं और राक्षस काँपते हैं, तब उनके दाँत अज्ञान को नष्ट करते हैं और सभी भय को दूर करते हैं। इस अष्टक का नियमित पाठ भक्तों को दिव्य अनुग्रह प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • पाप विमोचन: इस अष्टक का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से सभी पापों का नाश होता है और आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त होती है।
  • संकट निवारण: भगवान वराह की कृपा से जीवन में आने वाले संसार सागर के कष्टों से मुक्ति मिलती है और मानसिक शांति व स्थिरता प्राप्त होती है।
  • सुरक्षा और निर्भयता: सभी अरिष्टों, शत्रु भय और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा मिलती है, तथा मन में साहस और निर्भयता स्थापित होती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: भगवान के यज्ञ स्वरूप का स्मरण करने से भक्तों को धर्म, ज्ञान और मोक्ष की ओर प्रगति मिलती है, जिससे आत्मिक उत्थान संभव होता है।
  • धन और समृद्धि: पृथ्वी देवी के पति श्री वराह मूर्ति की कृपा से वंश को धन, समृद्धि, सभी प्रकार के कल्याण और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री वराहाष्टकं क्या है?
श्री वराहाष्टकं भगवान विष्णु के वराह अवतार की स्तुति में रचित आठ श्लोकों का एक भक्ति गीत है। यह पृथ्वी को बचाने वाले वराह मूर्ति की महिमा, शक्ति और करुणा का वर्णन करता है।
श्री वराहाष्टकं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस अष्टक का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद, शुद्ध मन से भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने करना उत्तम माना जाता है। विशेषकर मंगलवार और शुक्रवार को पाठ करना अधिक फलदायी होता है।
श्री वराहाष्टकं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ होते हैं?
इस अष्टक के पाठ से पापों से मुक्ति, संकटों का निवारण, शत्रुओं से सुरक्षा, आध्यात्मिक उन्नति और परिवार में धन-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
श्री वराहाष्टकं का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी व्यक्ति, लिंग, आयु या जाति के भेद के बिना, शुद्ध मन और भक्ति के साथ श्री वराहाष्टकं का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से जो लोग संकट में हैं या सुरक्षा चाहते हैं, वे इसका पाठ कर सकते हैं।
इस अष्टक का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
दिन में कम से कम एक बार या तीन बार पाठ करना उत्तम है। 11, 21, 54 या 108 बार पाठ करना अधिक श्रेष्ठ माना जाता है, जो व्यक्ति की भक्ति और समय पर निर्भर करता है।
श्री वराहाष्टकं का मूल स्रोत क्या है?
यह अष्टक प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों से लिया गया माना जाता है, हालांकि इसके विशिष्ट लेखक के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह वराह पुराण और अन्य वैष्णव आगमों के सार को समाहित करता है।

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