श्री सुब्रह्मण्य मूलमंत्र स्तवः
अथातः संप्रवक्ष्यामि मूलमंत्रस्तवं शिवं |
जपतां शृण्वतां नॄणां भुक्तिमुक्तिप्रदायकं || 1 ||
सर्वशत्रुक्षयकरं सर्वरोगनिवारणं |
अष्टैश्वर्यप्रदं नित्यं सर्वलोकैकपावनं || 2 ||
शरारण्योद्भवं स्कंदं शरणागतपालकं |
शरणं त्वां प्रपन्नस्य देहि मे विपुलां श्रियं || 3 ||
राजराजसखोद्भूतं राजीवायतलोचनं |
रतीशकोटिसौंदर्यं देहि मे विपुलां श्रियं || 4 ||
वलारिप्रमुखैर्वंद्य वल्लींद्राणीसुतापते |
वरदाश्रितलोकानां देहि मे विपुलां श्रियं || 5 ||
नारदादिमहायोगिसिद्धगंधर्वसेवितं |
नववीरैः पूजितांघ्रे देहि मे विपुलां श्रियं || 6 ||
भगवन् पार्वतीसूनो स्वामिन् भक्तार्तिभंजन |
भवत्पादाब्जयोर्भक्तिं देहि मे विपुलां श्रियं || 7 ||
वसु धान्यं यशः कीर्तिं अविच्छेदं च संततेः |
शत्रुनाशनमद्याशु देहि मे विपुलां श्रियं || 8 ||
इदं षडक्षरं स्तोत्रं सुब्रह्मण्यस्य संततं |
यः पठेत्तस्य सिद्ध्यंति संपदश्चिंतिताधिकाः || 9 ||
हृदब्जे भक्तितो नित्यं सुब्रह्मण्यं स्मरन् बुधः |
यो जपेत् प्रातरुत्थाय सर्वान्कामानवाप्नुयात् || 10 ||
इति कुमारतंत्रार्गतं श्रीसुब्रह्मण्य मूलमंत्र स्तवः |
अर्थ
श्री सुब्रह्मण्य मूलमंत्र स्तव भक्तों के लिए भौतिक और आध्यात्मिक दोनों लोकों में कल्याण प्रदान करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। यह भगवान स्कंद या कार्तिकेय के मूलमंत्र की शक्ति का आह्वान करता है और भक्तों के लिए धन, सुरक्षा, ज्ञान और शांति जैसे वांछित आशीर्वाद प्रदान करने की प्रार्थना करता है। इस स्तोत्र का जाप करने वालों को भुक्ति (सांसारिक सुख) और मुक्ति (आध्यात्मिक मोक्ष) दोनों प्राप्त होते हैं, जिससे यह अत्यंत फलदायी स्तोत्र बन जाता है। यह दिव्य स्तव भगवान सुब्रह्मण्य के दिव्य गुणों और शक्तियों का महिमामंडन करता है।
यह स्तव भक्तों को सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों, रोगों और दुर्भाग्य से बचाने वाले एक दिव्य कवच के रूप में कार्य करता है। "सर्वशत्रुक्षयकरं सर्वरोगनिवारणं" वाक्यांश इसकी शक्ति को उजागर करते हैं। यह शत्रुओं को शांत करता है, रोगों को दूर करता है और दुर्भाग्य को मिटाता है। यह भक्तों के आत्मविश्वास को बढ़ाता है और उन्हें दैवीय सुरक्षा प्रदान करता है। इसे अष्टैश्वर्य प्रदान करने वाला और पूरे लोक को पवित्र करने वाला भी बताया गया है, जो भक्तों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है।
स्तोत्र भगवान सुब्रह्मण्य के दिव्य सौंदर्य का वर्णन करता है। उन्हें शरवन से अवतरित दिव्य कुमार, कमल के समान विशाल नेत्रों वाले, करोड़ों कामदेवों से भी अधिक सुंदर, और वल्ली तथा देवसेना के प्रिय पति के रूप में स्तुति की जाती है। प्रत्येक श्लोक में "देहि मे विपुलां श्रियं" (मुझे अपार ऐश्वर्य प्रदान करो) की प्रार्थना की जाती है। यह धन, शांति, सद्पुत्र, यश और समृद्धि के लिए एक शक्तिशाली प्रार्थना है। "राजराजसखोद्भूत" (कुबेर के मित्र के रूप में उत्पन्न) विशेषण धन के देवता कुबेर के साथ उनके संबंध को दर्शाता है, जिससे भक्तों को धन की प्राप्ति होती है।
नारद आदि महर्षियों, सिद्धों, गंधर्वों और नववीरों द्वारा पूजित भगवान सुब्रह्मण्य भक्तों के दुखों का निवारण करने वाले हैं। "भगवन पार्वतीशूनो स्वामिन भक्तार्तिभंजन" जैसे संबोधन भक्तों के प्रति उनकी असीम करुणा और उनके कष्टों को दूर करने की शक्ति को दर्शाते हैं। भगवान के चरण कमलों में अटूट भक्ति की याचना करके, भक्त दैवीय कृपा प्राप्त करते हैं। यह स्तोत्र भक्तों के लिए दैवीय सुरक्षा, समग्र कल्याण और अंततः मोक्ष सुनिश्चित करता है।
लाभ (Benefits):
- भुक्ति-मुक्ति की प्राप्ति: इस स्तोत्र के निरंतर जाप से सांसारिक सुख (भुक्ति) और आध्यात्मिक मुक्ति (मुक्ति) दोनों प्राप्त होते हैं।
- शत्रु-रोगों का नाश: भगवान सुब्रह्मण्य की कृपा से सभी शत्रु शांत होते हैं, रोगों का निवारण होता है और दुर्भाग्य दूर होता है।
- धन और सफलता: प्रत्येक श्लोक में 'विपुलां श्रियं' की प्रार्थना से अपार धन, समृद्धि, सफलता, प्रसिद्धि और उत्तम संतान प्राप्त होती है।
- दैवीय सुरक्षा: यह भक्तों के कष्टों को दूर करता है और उन्हें दैवीय सुरक्षा, आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।
- ज्ञान और शांति: मन को शांति, ज्ञान और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करके जीवन में समग्र समृद्धि लाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री सुब्रह्मण्य मूलमंत्र स्तव क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री सुब्रह्मण्य मूलमंत्र स्तव के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या रचनाकार कौन हैं?
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