सु

श्री सुब्रह्मण्य षोडशनाम स्तोत्रं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्र
0 व्यूज़

श्री सुब्रह्मण्य षोडशनाम स्तोत्रं

अस्य श्री सुब्रह्मण्य षोडशनामस्तोत्र महामंत्रस्य अगस्त्यो भगवानृषिः अनुष्टुप्छंदः सुब्रह्मण्यो देवता ममेष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः |

ध्यानं |
षड्वक्त्रं शिखिवाहनं त्रिनयनं चित्रांबरालंकृतं
शक्तिं वज्रमसिं त्रिशूलमभयं खेटं धनुश्चक्रकं |
पाशं कुक्कुटमंकुशं च वरदं हस्तैर्दधानं सदा
ध्यायेदीप्सितसिद्धिदं शिवसुतं स्कंदं सुराराधितं ||

प्रथमो ज्ञानशक्त्यात्मा द्वितीयः स्कंद एव च |
अग्निगर्भस्तृतीयस्तु बाहुलेयश्चतुर्थकः || 1 ||

गांगेयः पंचमः प्रोक्तः षष्ठः शरवणोद्भवः |
सप्तमः कार्तिकेयश्च कुमारश्चाष्टमस्तथा || 2 ||

नवमः षण्मुखः प्रोक्तो दशमस्तारकांतकः |
एकादशश्च सेनानीः गुहो द्वादश एव च || 3 ||

त्रयोदशो ब्रह्मचारी शिवतेजश्चतुर्दशः |
क्रौंचदारी पंचदशः षोडशः शिखिवाहनः || 4 ||

षोडशैतानि नामानि यः पठेद्भक्तिसंयुतः |
बृहस्पतिसमो वाचि ब्रह्मतेजोयुतो भवेत् |
यद्यत्प्रार्थये मर्त्यस्तत्सर्वं लभते ध्रुवं || 5 ||

इति श्री सुब्रह्मण्य षोडशनाम स्तोत्रं |

अर्थ

श्री सुब्रह्मण्य षोडशनाम स्तोत्र भगवान सुब्रह्मण्य स्वामी के सोलह पवित्र नामों की स्तुति करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। इस स्तोत्र के महामंत्र के ऋषि भगवान अगस्त्य हैं, छंद अनुष्टुप है और देवता सुब्रह्मण्य हैं। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र का पाठ करने से सभी अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ध्यान श्लोक में भगवान सुब्रह्मण्य का वर्णन छह मुखों वाले, मयूर वाहन पर विराजमान, त्रिनेत्रधारी, विभिन्न अस्त्रों (शक्ति, वज्र, तलवार, त्रिशूल, अभय, ढाल, धनुष, चक्र, पाश, कुक्कुट, अंकुश, वरद) को धारण किए हुए, भगवान शिव के पुत्र और देवताओं द्वारा पूजित रूप में किया गया है।

ये सोलह नाम भगवान सुब्रह्मण्य के विभिन्न दिव्य गुणों, लीलाओं और शक्तियों को प्रकट करते हैं। प्रत्येक नाम उनके अनंत रूपों और भक्तों के प्रति उनकी करुणा को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, 'ज्ञानशक्त्यात्मा' परम ज्ञान और दिव्य शक्ति के स्वरूप को इंगित करता है। 'स्कंद' का अर्थ है जो दिव्य बल के साथ आगे बढ़ता है और नकारात्मक शक्तियों का नाश करता है। 'अग्निगर्भ' भगवान शिव के दिव्य तेज से उत्पन्न होने का सूचक है। 'बाहुलेय' और 'गांगेय' नाम कृतिका देवियों और गंगा देवी द्वारा उनके पालन-पोषण की कथा को याद दिलाते हैं। 'शरवणोद्भव' का अर्थ है शरवण सरोवर में जन्मे। 'कार्तिकेय' उनका देव सेनापति के रूप में परिचय देता है, जबकि 'कुमार' उनके शाश्वत युवा स्वरूप को दर्शाता है।

'षण्मुख' नाम छह मुखों वाले देवता को संदर्भित करता है जो सभी दिशाओं को देखते हैं और सर्वज्ञ हैं। 'तारकांतक' तारकासुर का वध करने वाले उनके वीर कार्य को स्मरण कराता है। 'सेनानी' इस बात की पुष्टि करता है कि वे देवताओं की सेना के सर्वोच्च सेनापति हैं। 'गुह' का अर्थ है हृदय की गुफा में निवास करने वाले परमात्मा का स्वरूप। 'ब्रह्मचारी' उनके पवित्र और अनुशासित जीवन को दर्शाता है। 'शिवतेजः' भगवान शिव के दिव्य तेज से प्रकट हुए उनके रूप का वर्णन करता है। 'क्रौंचदारी' का अर्थ है क्रौंच पर्वत को अपने बाण से भेदने वाले पराक्रमी। अंत में, 'शिखिवाहन' मयूर पर आरूढ़ सुब्रह्मण्य के रूप का वर्णन करता है।

यह स्तोत्र केवल नामों का संग्रह नहीं है, बल्कि भगवान सुब्रह्मण्य के दिव्य गुणों का ध्यान करने और उनकी कृपा प्राप्त करने का एक मार्ग है। इन नामों का भक्तिपूर्वक पाठ करने से मन शुद्ध होता है, आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है। यह अज्ञानता को दूर कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करता है और आध्यात्मिक प्रगति में सहायक है।

लाभ (Benefits):

  • वाकपटुता और ज्ञान: इन सोलह नामों का भक्तिपूर्वक पाठ करने वाले व्यक्ति बृहस्पति के समान वाकपटुता और उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त करते हैं।
  • ब्रह्म तेज: स्तोत्र पाठ से ब्रह्म के तेज के समान दिव्य प्रकाश और शक्ति प्राप्त होती है, जिससे व्यक्ति में आकर्षण और प्रभाव बढ़ता है।
  • इच्छित फल की प्राप्ति: इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सफलता मिलती है।
  • शत्रु नाश और सुरक्षा: जैसे भगवान सुब्रह्मण्य ने तारकासुर का संहार किया, वैसे ही यह स्तोत्र आंतरिक और बाहरी शत्रुओं से सुरक्षा प्रदान करता है और सभी नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: ये नाम भगवान के दिव्य गुणों का मनन करने में मदद करते हैं, जिससे आध्यात्मिक जागरूकता और आंतरिक शांति बढ़ती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री सुब्रह्मण्य षोडशनाम स्तोत्रं क्या है?
यह भगवान सुब्रह्मण्य स्वामी के सोलह पवित्र नामों की स्तुति करने वाला एक पवित्र स्तोत्र है, जो उनके विभिन्न दिव्य गुणों और शक्तियों का वर्णन करता है। इसका पाठ करने से भक्तों को विशेष अनुग्रह प्राप्त होता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद, शुद्ध मन और भक्ति के साथ किया जा सकता है। मंगलवार या षष्ठी तिथि पर इसका पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।
श्री सुब्रह्मण्य षोडशनाम स्तोत्र पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से वाकपटुता, ब्रह्म तेज, मनोकामना सिद्धि, शत्रुओं का नाश और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह जीवन में साहस और सफलता लाता है।
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
भगवान सुब्रह्मण्य के भक्त, ज्ञान, शक्ति, वाकपटुता और मनोकामना सिद्धि की इच्छा रखने वाले, तथा जीवन में बाधाओं को दूर करने की चाह रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना उत्तम है?
प्रतिदिन कम से कम एक बार या तीन बार पाठ करना शुभ होता है। विशेष रूप से मंगलवार या षष्ठी के दिन 11, 21, या 108 बार पाठ करना अधिक फल प्रदान करता है।
इस स्तोत्र का मूल या रचनाकार कौन हैं?
इस स्तोत्र के महामंत्र के ऋषि भगवान अगस्त्य हैं, छंद अनुष्टुप है और देवता भगवान सुब्रह्मण्य हैं। यह प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...