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श्री सुब्रह्मण्य षट्कं

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स्तोत्र
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श्री सुब्रह्मण्य षट्कं

शरणागतमातुरमाधिजितं
करुणाकर कामद कामहतं |
शरकाननसंभव चारुरुचे
परिपालय तारकमारक मां || 1 ||

हरसारसमुद्भव हैमवती-
-करपल्लवलालित कम्रतनो |
मुरवैरिविरिंचिमुदंबुनिधे
परिपालय तारकमारक मां || 2 ||

शरदिंदुसमानषडाननया
सरसीरुहचारुविलोचनया |
निरुपाधिकया निजबालतया
परिपालय तारकमारक मां || 3 ||

गिरिजासुत सायकभिन्नगिरे
सुरसिंधुतनूज सुवर्णरुचे |
शिखितोकशिखावलवाहन हे
परिपालय तारकमारक मां || 4 ||

जय विप्रजनप्रिय वीर नमो
जय भक्तजनप्रिय भद्र नमो |
जय शाख विशाख कुमार नमः
परिपालय तारकमारक मां || 5 ||

परितो भव मे पुरतो भव मे
पथि मे भगवन् भव रक्ष गतिं |
वितराशु जयं विजयं परितः
परिपालय तारकमारक मां || 6 ||

इति कुक्कुटकेतुमनुस्मरतां
पठतामपि षण्मुखषट्कमिदं |
भजतामपि नंदनमिंदुभृतो
न भयं क्वचिदस्ति शरीरभृतां || 7 ||

गांगेयं वह्निगर्भं शरवणजनितं ज्ञानशक्तिं कुमारं
ब्रह्मण्यं स्कंददेवं गुहमचलभिदं रुद्रतेजस्वरूपं |
सेनान्यं तारकघ्नं गजमुखसहजं कार्तिकेयं षडास्यं
सुब्रह्मण्यं मयूरध्वजरथसहितं देवदेवं नमामि || 8 ||

इति श्रीसुब्रह्मण्यषट्कं ||

अर्थ

श्री सुब्रह्मण्य षट्कं भगवान सुब्रह्मण्य स्वामी को समर्पित छह श्लोकों का एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भक्त की पूर्ण शरणागति और भगवान से सुरक्षा, ज्ञान, करुणा और विजय की याचना को दर्शाता है, विशेषकर तारकासुर का संहार करने वाले सुब्रह्मण्य के रूप में। यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच गहरे आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक है, जहाँ भक्त अपनी सभी चिंताओं को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है।

यह स्तोत्र पूर्ण शरणागति, दैवीय सुरक्षा, ज्ञान, करुणा और विजय के पाँच मूल सिद्धांतों पर आधारित है। भगवान सुब्रह्मण्य ज्ञान, शक्ति, साहस और देवताओं के सेनापति के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस षट्कं का पाठ करने से भक्त आंतरिक शत्रुओं जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर से मुक्ति पाते हैं, साथ ही बाहरी खतरों, दुष्ट शक्तियों और बाधाओं से भी सुरक्षित रहते हैं। प्रत्येक श्लोक भगवान के विभिन्न गुणों और रूपों की स्तुति करता है, जिससे भक्त की अटूट श्रद्धा और विश्वास प्रकट होता है।

प्रत्येक श्लोक का संक्षिप्त भावार्थ इस प्रकार है: पहला श्लोक: हे स्वामी! मैं दुखों में डूबा हुआ आपकी शरण में आया हूँ। मेरे दुखों को दूर करने वाले और मेरी सभी इच्छाओं को पूरा करने वाले दयासागर, मेरी रक्षा करें। दूसरा श्लोक: पार्वती माता के हाथों से प्रेमपूर्वक पाले गए, विष्णु और ब्रह्मा द्वारा पूजित, करुणा के सागर, हे प्रभु, मेरी रक्षा करें। तीसरा श्लोक: शरद ऋतु के चंद्रमा के समान छह मुखों वाले, कमल के समान सुंदर नेत्रों वाले, शाश्वत बाल रूप वाले, आप मुझे शांति प्रदान करें और मेरी सदा रक्षा करें। चौथा श्लोक: हे गिरिजासुत! जिसने अपने बाण से क्रौंच पर्वत को भेदा, स्वर्ण के समान कांतिमान, मयूर वाहन पर विराजमान, आप मेरी रक्षा करें। पांचवां श्लोक: वेदों के ज्ञाताओं को प्रिय, भक्तों के मित्र, शक्तिशाली वीर, शाखा और विशाखा रूपों में प्रकट होने वाले कुमार, मेरी रक्षा करें। छठा श्लोक: हे प्रभु! आप मेरे चारों ओर रहें, मेरे सामने रहें, मेरे पथ पर मेरी रक्षा करें। मेरे मार्ग से राक्षसों और बाधाओं को दूर कर मुझे हर जगह विजय प्रदान करें और मेरी रक्षा करें।

फलश्रुति: जो इस स्तोत्र का पाठ या स्मरण करते हैं, उन्हें कभी भी शरीर का भय, खतरा या नकारात्मक शक्तियों का सामना नहीं करना पड़ता। शरणागति मंत्र: गंगा से उत्पन्न, अग्निगर्भित, शरवन में जन्मे, छह मुख वाले, तारकासुर का मर्दन करने वाले, मयूर वाहन पर विराजमान सुब्रह्मण्य स्वामी का स्मरण करने से नित्य सुरक्षा प्राप्त होती है। इस षट्कं का नियमित पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, दैवीय सुरक्षा और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

लाभ (Benefits):

  • शत्रु भय का नाश: श्री सुब्रह्मण्य षट्कं का पाठ करने से आंतरिक शत्रुओं (अहंकार, क्रोध, लालच) और बाहरी शत्रुओं से उत्पन्न भय दूर होता है। यह मन में साहस और दृढ़ता बढ़ाता है।
  • मनोबल और साहस में वृद्धि: यह स्तोत्र भक्तों को मानसिक स्थिरता और आत्मविश्वास प्रदान करता है। कठिन परिस्थितियों का निर्भयता से सामना करने की शक्ति प्रदान करता है।
  • रोगों और कष्टों से मुक्ति: भगवान सुब्रह्मण्य के आशीर्वाद से शारीरिक रोग, मानसिक पीड़ाएँ और अन्य कष्ट कम होते हैं। स्वास्थ्य और कल्याण में सुधार होता है।
  • संतान, विजय और धन की प्राप्ति: इस षट्कं का भक्तिपूर्वक पाठ करने वालों को संतान सुख, कार्यों में विजय और जीवन में धन-समृद्धि प्राप्त होती है। बाधाएं दूर होती हैं और सफलता मिलती है।
  • ज्ञान और वाक् सिद्धि: भगवान सुब्रह्मण्य ज्ञान के अधिपति हैं, इसलिए यह स्तोत्र विद्यार्थियों और ज्ञान चाहने वालों को बुद्धि, स्पष्ट वाणी और बेहतर समझ प्रदान करता है।
  • नकारात्मक प्रभावों से बचाव: बुरी नज़र, जादू-टोना, ग्रह दोषों और अन्य नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव को कम करता है, जिससे घर में शांति और सकारात्मक वातावरण बनता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री सुब्रह्मण्य षट्कं क्या है?
श्री सुब्रह्मण्य षट्कं छह श्लोकों का एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है जो भगवान सुब्रह्मण्य स्वामी को समर्पित है। यह स्तोत्र भक्त की ओर से भगवान से सुरक्षा, ज्ञान और विजय की याचना करते हुए पूर्ण शरणागति व्यक्त करता है।
श्री सुब्रह्मण्य षट्कं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से किया जा सकता है। विशेष रूप से मंगलवार और षष्ठी तिथि पर इसका पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है। इसे भक्ति और स्पष्ट उच्चारण के साथ पढ़ना चाहिए।
इस स्तोत्र के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
श्री सुब्रह्मण्य षट्कं के पाठ से शत्रु भय का नाश होता है, मनोबल और साहस में वृद्धि होती है, रोगों और कष्टों से मुक्ति मिलती है, संतान, विजय और धन की प्राप्ति होती है, साथ ही ज्ञान और वाक् सिद्धि भी मिलती है। यह नकारात्मक प्रभावों से भी बचाता है।
श्री सुब्रह्मण्य षट्कं का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान सुब्रह्मण्य के सभी भक्त इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। विशेष रूप से वे लोग जो कठिनाइयों में हैं, रोगों से पीड़ित हैं, शत्रु भय से मुक्ति चाहते हैं, संतान की कामना करते हैं या ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, वे इसका पाठ कर सकते हैं।
श्री सुब्रह्मण्य षट्कं का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
प्रतिदिन कम से कम एक या तीन बार इसका पाठ करना शुभ माना जाता है। विशेष फलों की प्राप्ति के लिए, इसे 11, 21, या 108 बार संकल्प के साथ पाठ किया जा सकता है। निरंतर भक्ति और श्रद्धा महत्वपूर्ण है।
इस स्तोत्र का स्रोत या उत्पत्ति क्या है?
श्री सुब्रह्मण्य षट्कं एक प्राचीन भक्ति स्तोत्र है, जिसके विशिष्ट रचयिता के बारे में बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह माना जाता है कि यह हिंदू धर्म के स्कंद पुराण और अन्य आगम ग्रंथों के आधार पर रचा गया है, जो भगवान सुब्रह्मण्य की महिमा का गुणगान करता है।

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