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श्री सुब्रह्मण्य मानसपूजा स्तोत्रं

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स्तोत्र
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श्री सुब्रह्मण्य मानसपूजा स्तोत्रं

श्रीमन्मेरुधराधराधिप महासौभाग्यसंशोभिते
मंदारद्रुमवाटिकापरिवृते श्रीस्कंदशैलेमले
सौधे हाटकनिर्मिते मणिमये सन्मंटपाभ्यंतरे
ब्रह्मानंदघनं गुहाख्यमनघं सिंहासनं चिंतये || 1 ||

मदनायुतलावण्यं नव्यारुणशतारुणं |
नीलजीमूतचिकुरं अर्धेंदु सदृशालिकं || 2 ||

पुंडरीकविशालाक्षं पूर्णचंद्रनिभाननं |
चांपेय विलसन्नासं मंदहासांचितोरसं || 3 ||

गंडस्थलचलच्छोत्र कुंडलं चारुकंधरं |
करासक्तकनःदंडं रत्नहारांचितोरसं || 4 ||

कटीतटलसद्दिव्यवसनं पीवरोरुकं |
सुरासुरादिकोटीर नीराजितपदांबुजं || 5 ||

नानारत्न विभूषाढ्यं दिव्यचंदनचर्चितं |
सनकादि महायोगि सेवितं करुणानिधिं || 6 ||

भक्तवांछितदातारं देवसेनासमावृतं |
तेजोमयं कार्तिकेयं भावये हृदयांबुजे || 7 ||

आवाहयामि विश्वेशं महासेनं महेश्वरं |
तेजस्त्रयात्मकं पीठं शरजन्मन् गृहाण भोः || 8 ||

अनवद्यं गृहाणेश पाद्यमद्य षडानन |
पार्वतीनंदनानर्घ्यं अर्पयाम्यर्घ्यमद्भुतं || 9 ||

आचम्यतामग्निजात स्वर्णपात्रोद्यतैर्जलैः |
पंचामृतरसैर्दिव्यैः सुधासमविभावितैः || 10 ||

दधिक्षीराज्यमधुभिः पंचगव्यैः फलोदकैः |
नानाफलरसैर्दिव्यैर्नारिकेळफलोदकैः || 11 ||

दिव्यौषधिरसैः स्वर्णरत्नोदक कुशोदकैः |
हिमांबुचंदनरसैर्घनसारादिवासितैः || 12 ||

ब्रह्मांडोदरमध्यस्थ तीर्थैः परमपावनैः |
पावनं परमेशान त्वां तीर्थैः स्नापयाम्यहं || 13 ||

सुधोर्मिक्षीरधवळं भस्मनोधूळ्यतावकं |
सौवर्णवाससाकायां वेष्टयेऽभीष्टसिद्धये || 14 ||

यज्ञोपवीतं सुज्ञानदायिने तेऽर्पये गुहं |
किरीटहारकेयूर भूषणानि समर्पये || 15 ||

रोचनागरुकस्तूरी सिताभ्रमसृणान्वितं |
गंधसारं सुरभिलं सुरेशाभ्युपगम्यतां || 16 ||

रचये तिलकं फाले गंधं मृगमदेन ते |
अक्षय्यफलदानर्घानक्षतानर्पये प्रभो || 17 ||

कुमुदोत्पल कह्लार कमलैः शतपत्रकैः |
जातीचंपकपुन्नाग वकुळैः करवीरकैः || 18 ||

दूर्वाप्रवाळमालूर माचीमरुवपत्रकैः |
अकीटादिहतैर्नव्यैः कोमलैस्तुलसीदळैः || 19 ||

पावनैश्चंद्रकदळी कुसुमैर्नंदिवर्धनैः |
नवमालालिकाभिः मतल्लिकातल्लजैरपि || 20 ||

कुरंडैरपि शम्याकैः मंदारैरतिसुंदरैः |
अगर्हितैश्च बर्हिष्ठः पाटीदैः पारिजातकैः || 21 ||

आमोदकुसुमैरन्यैः पूजयामि जगत्पतिं |
धूपोऽयं गृह्यतां देव घ्राणेंद्रिय विमोहकं || 22 ||

सर्वांतरतमोहंत्रे गुह ते दीपमर्पये |
सद्यः समाभृतं दिव्यममृतं तृप्तिहेतुकं || 23 ||

साल्यान्नमद्भुतं नव्यं गोघृतं सूपसंगतं |
कदळीनारिकेळामृधान्याद्युर्वारुकादिभिः || 24 ||

रचितैर्हरितैर्दिव्य खचरीभिः सुपर्पटैः |
सर्वसंस्तारसंपूर्णैराज्यपक्वैरतिप्रियैः || 25 ||

रंभापनसकूश्मांडापूपा निष्पक्वमंतरैः |
विदारिका कारवेल्ल पटोली तगरोन्मुखैः || 26 ||

शाकैर्बहुविधैरन्यैः वटकैर्वटुसंस्कृतैः |
ससूपसारनिर्गम्य सरचीसुरसेन च || 27 ||

कूश्मांडखंडकलित तप्तक रसनेन च |
सुपक्वचित्रान्नशतैः लड्डुकेड्डुमकादिभिः || 28 ||

सुधाफलामृतस्यंदिमंडक क्षीरमंडकैः |
माषापूपगुलापूप गोधूमापूप शर्करैः || 29 ||

शशांककिरणोद्भासि पोळिका शष्कुळीमुखैः |
भक्ष्यैरन्यैः सुरुचिरैः पायसैश्च रसायनैः || 30 ||

लेह्यैरुच्चावचैः खंडशर्कराफाणितादिभिः |
गुडोदकैर्नारिकेळरसैरिक्षुरसैरपि || 31 ||

कूर्चिकाभिरनेकाभिः मंडिकाभिरुपस्कृतं |
कदळीचूतपनसगोस्तनी फलराशिभिः || 32 ||

नारंग शृंगबेरैल मरीचैर्लिकुचादिभिः |
उपदंशैः शरच्चंद्र गौरगोदधिसंगतं || 33 ||

जंबीररसकैसर्या हिंगुसैंधवनागरैः |
लसताजलदग्रेण पानीयेन समाश्रितं || 34 ||

हेमपात्रेषु सरसं सांगर्येण च कल्पितं |
नित्यतृप्त जगन्नाथ तारकारे सुरेश्वर || 35 ||

नैवेद्यं गृह्यतां देव कृपया भक्तवत्सल |
सर्वलोकैकवरद मृत्यो दुर्दैत्यरक्षसां || 36 ||

गंधोदकेन ते हस्तौ क्षाळयामि षडानन |
एलालवंगकर्पूर जातीफलसुगंधिलां || 37 ||

वीटीं सेवय सर्वेश चेटीकृत जगत्रय |
दत्तेर्नीराजयामि त्वां कर्पूरप्रभयानय || 38 ||

पुष्पांजलिं प्रदास्यामि स्वर्णपुष्पाक्षतैर्युतं |
छत्रेण चामरेणापि नृत्तगीतादिभिर्गुह || 39 ||

राजोपचारैरखिलैः संतुष्टो भव मत्प्रभो |
प्रदक्षिणं करोमि त्वां विश्वात्मक नमोऽस्तु ते || 40 ||

सहस्रकृत्वो रचये शिरसा तेऽभिवादनं |
अपराधसहस्राणि सहस्व करुणाकर || 41 ||

नमः सर्वांतरस्थाय नमः कैवल्यहेतवे |
श्रुतिशीर्षकगम्याय नमः शक्तिधराय ते || 42 ||

मयूरवाहनस्येदं मानसं च प्रपूजनं |
यः करोति सकृद्वापि गुहस्तस्य प्रसीदति || 43 ||

इति श्री सुब्रह्मण्य मानस पूजा |

अर्थ

श्री सुब्रह्मण्य मानसपूजा स्तोत्रं एक अत्यंत दिव्य और शक्तिशाली स्तोत्र है, जो भक्तों को अपने हृदय मंदिर में भगवान सुब्रह्मण्य की मानसिक रूप से पूजा करने का मार्गदर्शन करता है। यह स्तोत्र इस बात पर जोर देता है कि वास्तविक पूजा बाहरी सामग्रियों से नहीं, बल्कि हृदय की शुद्ध भावना और एकाग्रता से होती है। यह उन भक्तों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो शारीरिक रूप से पूजा करने में असमर्थ हैं या जिनके पास आवश्यक सामग्री उपलब्ध नहीं है। यह आंतरिक शुद्धि और भगवान के साथ गहरे आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का एक माध्यम है।

यह मानसपूजा भक्त के अंतर्मन को पवित्र करती है। भक्त अपने हृदय को एक दिव्य मंदिर के रूप में कल्पना करता है, जहाँ श्री मेरु पर्वत के अधिपति, भगवान सुब्रह्मण्य का दिव्य सौंदर्य साकार होता है। मन्दार वृक्षों से घिरे श्री स्कंदशैल पर, सोने से निर्मित और मणियों से सुसज्जित एक भव्य मंडप में, ब्रह्मानंद के साकार रूप, गुह नाम से प्रसिद्ध सुब्रह्मण्य स्वामी को रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान किया जाता है। यह प्रक्रिया भक्त के मन को बाहरी दुनिया से हटाकर पूरी तरह से दिव्य चिंतन में लीन कर देती है, जिससे मन की एकाग्रता बढ़ती है।

स्तोत्र में भगवान सुब्रह्मण्य के दिव्य स्वरूप का अत्यंत मनोहारी वर्णन किया गया है। वे करोड़ों कामदेवों से भी अधिक सुंदर, हजारों उगते सूर्यों के समान तेजस्वी, काले बादलों के समान केशों वाले, अर्धचंद्र के समान ललाट वाले, कमल के समान विशाल नेत्रों वाले, पूर्ण चंद्रमा के समान मुख वाले, चंपा के फूल जैसी सुंदर नासिका वाले, मंद मुस्कान से युक्त वक्षस्थल वाले, गालों पर झूलते कुंडल वाले, सुंदर गर्दन वाले, हाथ में चमकता हुआ दंड धारण किए हुए, रत्नों के हार से सुशोभित वक्षस्थल वाले, कमर पर दिव्य वस्त्र धारण किए हुए, बलिष्ठ जांघों वाले, देवताओं और असुरों द्वारा पूजित चरणकमलों वाले, नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित, दिव्य चंदन से लेपित, सनकादि महान योगियों द्वारा सेवित, करुणा के सागर, भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले और देवसेना से घिरे हुए तेजस्वी कार्तिकेय के रूप में हृदय कमल में ध्यान किए जाते हैं। यह विस्तृत वर्णन भक्त के मन में भगवान की स्पष्ट छवि बनाता है और भक्ति को गहरा करता है।

इस मानसिक आह्वान और पूजा के माध्यम से भक्त अपनी आत्मा को शुद्ध करता है। पाद्य (पैर धोने का जल), अर्घ्य (हाथ धोने का जल), आचमन (कुल्ला करने का जल), स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य – ये सभी उपचार मानसिक रूप से भगवान को समर्पित किए जाते हैं। यह समर्पण भक्त को भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति की ओर ले जाता है। यह स्तोत्र केवल पाठ नहीं, बल्कि भगवान के साथ एक गहरा भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का एक मार्ग है। यह हमें सिखाता है कि हृदय से की गई पूजा ही सर्वोच्च पूजा है और यह भौतिक पूजा से भी अधिक शक्तिशाली हो सकती है।

लाभ (Benefits):

  • आंतरिक शांति और मानसिक स्पष्टता: इस स्तोत्र का नियमित पाठ मन को शांत करता है और अनावश्यक विचारों को दूर कर मानसिक स्पष्टता प्रदान करता है।
  • भक्ति और आध्यात्मिक एकाग्रता में वृद्धि: भगवान सुब्रह्मण्य के दिव्य रूप का ध्यान करने से भक्ति भावना प्रबल होती है और आध्यात्मिक एकाग्रता बढ़ती है।
  • भय, चिंता और नकारात्मकता का निवारण: स्कंद की रक्षक शक्ति का आह्वान करने से सभी प्रकार के भय, चिंता और नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती हैं।
  • पूर्ण पारंपरिक पूजा का फल प्राप्त होता है: यदि आप शारीरिक रूप से पूजा करने में असमर्थ हैं, तो भी यह मानसिक पूजा आपको पूर्ण पारंपरिक पूजा का समान फल प्रदान करती है।
  • दिव्य कृपा, सुरक्षा और सफलता की प्राप्ति: भगवान सुब्रह्मण्य की कृपा से भक्तों को जीवन में सुरक्षा, सफलता और समग्र कल्याण प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री सुब्रह्मण्य मानसपूजा स्तोत्रं क्या है?
यह एक भक्ति स्तोत्र है जो भक्तों को अपने हृदय मंदिर में भगवान सुब्रह्मण्य की मानसिक रूप से विभिन्न उपचारों के साथ पूजा करने का तरीका सिखाता है। यह बाहरी सामग्रियों के बिना, आंतरिक भक्ति के माध्यम से पूजा करने की शक्ति पर जोर देता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी समय, किसी भी स्थान पर किया जा सकता है, विशेष रूप से जब मानसिक शांति और एकाग्रता की आवश्यकता हो या जब शारीरिक पूजा करना संभव न हो। मंगलवार और षष्ठी तिथि भगवान सुब्रह्मण्य को समर्पित मानी जाती हैं।
इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से आंतरिक शांति, मानसिक स्पष्टता, भक्ति और आध्यात्मिक एकाग्रता बढ़ती है। यह भय, चिंता और नकारात्मकता को दूर करता है, जिससे दिव्य कृपा, सुरक्षा और सफलता प्राप्त होती है।
यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए?
कोई भी भक्त, जिसके मन में भगवान सुब्रह्मण्य के प्रति श्रद्धा और भक्ति हो, वह इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी है जो भौतिक पूजा करने में असमर्थ हैं या आंतरिक आध्यात्मिक साधना की इच्छा रखते हैं।
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का प्रतिदिन एक या तीन बार पाठ करना सामान्य है। आप अपनी भक्ति और उपलब्ध समय के अनुसार, जितनी बार चाहें उतनी बार इसका पाठ कर सकते हैं। नियमित पाठ से अधिक लाभ होता है।
इस स्तोत्र का उद्गम या रचयिता कौन हैं?
श्री सुब्रह्मण्य मानसपूजा स्तोत्रं एक प्राचीन और पारंपरिक भक्ति रचना है। इसके विशिष्ट रचयिता ज्ञात नहीं हैं, लेकिन यह हिंदू धर्म के भक्ति साहित्य का एक अभिन्न अंग है और पीढ़ियों से भक्तों द्वारा इसका पाठ किया जाता रहा है।

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