श्री सुब्रह्मण्य भुजंग प्रयात स्तोत्रं
भजेऽहं कुमारं भवानीकुमारं
गलोल्लासिहारं नमत्सद्विहारं |
रिपुस्तोमपारं नृसिंहावतारं
सदानिर्विकारं गुहं निर्विचारं || 1 ||
नमामीशपुत्रं जपाशोणगात्रं
सुरारातिशत्रुं रवींद्वग्निनेत्रं |
महाबर्हिपत्रं शिवास्याब्जमित्रं
प्रभास्वत्कळत्रं पुराणं पवित्रं || 2 ||
अनेकार्ककोटि-प्रभावज्ज्वलं तं
मनोहारि माणिक्य भूषोज्ज्वलं तं |
श्रितानामभीष्टं निशांतं नितांतं
भजे षण्मुखं तं शरच्चंद्रकांतं || 3 ||
कृपावारि कल्लोलभास्वत्कटाक्षं
विराजन्मनोहारि शोणांबुजाक्षं |
प्रयोगप्रदानप्रवाहैकदक्षं
भजे कांतिकांतं परस्तोमरक्षं || 4 ||
सुकस्तूरिसिंदूरभास्वल्ललाटं
दयापूर्णचित्तं महादेवपुत्रं |
रवींदूल्लसद्रत्नराजत्किरीटं
भजे क्रीडिताकाश गंगाद्रिकूटं || 5 ||
सुकुंदप्रसूनावळीशोभितांगं
शरत्पूर्णचंद्रप्रभाकांतिकांतं |
शिरीषप्रसूनाभिरामं भवंतं
भजे देवसेनापतिं वल्लभं तं || 6 ||
सुलावण्यसत्सूर्यकोटिप्रतीकं
प्रभुं तारकारिं द्विषड्बाहुमीशं |
निजांकप्रभादिव्यमानापदीशं
भजे पार्वतीप्राणपुत्रं सुकेशं || 7 ||
अजं सर्वलोकप्रियं लोकनाथं
गुहं शूरपद्मादिदंभोळिधारं |
सुचारुं सुनासापुटं सच्चरित्रं
भजे कार्तिकेयं सदा बाहुलेयं || 8 ||
शरारण्यसंभूतमिंद्रादिवंद्यं
द्विषड्बाहुसंख्यायुधश्रेणिरम्यं |
मरुत्सारथिं कुक्कुटेशं सुकेतुं
भजे योगिहृत्पद्ममध्याधिवासं || 9 ||
विरिंचींद्रवल्लीश देवेशमुख्यं
प्रशस्तामरस्तोमसंस्तूयमानं |
दिश त्वं दयाळो श्रियं निश्चलां मे
विना त्वां गतिः का प्रभो मे प्रसीद || 10 ||
पदांभोजसेवा समायातबृंदा-
रकश्रेणिकोटीरभास्वल्ललाटं |
कळत्रोल्लसत्पार्श्वयुग्मं वरेण्यं
भजे देवमाद्यंतहीनप्रभावं || 11 ||
भवांभोधिमध्ये तरंगे पतंतं
प्रभो मां सदा पूर्णदृष्ट्या समीक्ष्य |
भवद्भक्तिनावोद्धर त्वं दयाळो
सुगत्यंतरं नास्ति देव प्रसीद || 12 ||
गळे रत्नभूषं तनौ मंजुवेषं
करे ज्ञानशक्तिं दरस्मेरमास्ये |
कटिन्यस्तपाणिं शिखिस्थं कुमारं
भजेऽहं गुहादन्यदेवं न मन्ये || 13 ||
दयाहीनचित्तं परद्रोहपात्रं
सदा पापशीलं गुरोर्भक्तिहीनं |
अनन्यावलंबं भवन्नेत्रपात्रं
कृपाशील मां भो पवित्रं कुरु त्वं || 14 ||
महासेन गांगेय वल्लीसहाय
प्रभो तारकारे षडास्यामरेश |
सदा पायसान्नप्रदातर्गुहेति
स्मरिष्यामि भक्त्या सदाहं विभो त्वां || 15 ||
प्रतापस्य बाहो नमद्वीरबाहो
प्रभो कार्तिकेयेष्टकामप्रदेति |
यदा ये पठंते भवंतं तदेवं
प्रसन्नस्तु तेषां बहुश्रीं ददासि || 16 ||
अपारातिदारिद्र्यवाराशिमध्ये
भ्रमंतं जनग्राहपूर्णे नितांतं |
महासेन मामुद्धर त्वं कटाक्षा-
वलोकेन किंचित्प्रसीद प्रसीद || 17 ||
स्थिरां देहि भक्तिं भवत्पादपद्मे
श्रियं निश्चलां देहि मह्यं कुमार |
गुहं चंद्रतारं सुवंशाभिवृद्धिं
कुरु त्वं प्रभो मे मनः कल्पसालः || 18 ||
नमस्ते नमस्ते महाशक्तिपाणे
नमस्ते नमस्ते लसद्वज्रपाणे |
नमस्ते नमस्ते कटिन्यस्तपाणे
नमस्ते नमस्ते सदाभीष्टपाणे || 19 ||
नमस्ते नमस्ते महाशक्तिधारिन्
नमस्ते सुराणां महासौख्यदायिन् |
नमस्ते सदा कुक्कुटेशाख्यक त्वं
समस्तापराधं विभो मे क्षमस्व || 20 ||
कुमारात्परं कर्मयोगं न जाने
कुमारात्परं कर्मशीलं न जाने |
य एको मुनीनां हृदब्जाधिवासः
शिवांकं समारुह्य सत्पीठकल्पं || 21 ||
विरिंचाय मंत्रोपदेशं चकार
प्रमोदेन सोऽयं तनोतु श्रियं मे |
यमाहुः परं वेद शूरेषु मुख्यं
सदा यस्य शक्त्या जगत्भीतभीता || 22 ||
यमाश्रित्य देवाः स्थिरं स्वर्गपालाः
सदोंकाररूपं चिदानंदमीडे |
गुहस्तोत्रमेतत् कृतं तारकारे
भुजंगप्रयातेन हृद्येन कांतं || 23 ||
जना ये पठंते महाभक्तियुक्ताः
प्रमोदेन सायं प्रभाते विशेषः |
न जन्मर्क्षयोगे यदा ते रुदांता
मनोवांछितान् सर्वकामान् लभंते || 23 ||
इति श्री सुब्रह्मण्य भुजंग प्रयात स्तोत्रं |
अर्थ
श्री सुब्रह्मण्य भुजंग प्रयात स्तोत्रम भगवान सुब्रह्मण्य स्वामी की महिमा, शक्ति, करुणा और सुरक्षा का अत्यंत मधुर और भक्तिपूर्ण तरीके से भुजंगप्रयात छंद में स्तुति करता है। यह स्तोत्र भक्त को सुब्रह्मण्य के दिव्य स्वरूप, उनके छह मुखों, शक्ति आयुधों और मयूर वाहन का गहरा दर्शन कराता है। यह केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि भक्त द्वारा अपनी सभी कमजोरियों, दुखों और भय को स्वामी के चरण कमलों में समर्पित करने का पूर्ण शरणागति भाव व्यक्त करने वाला एक दिव्य काव्य है।
इस स्तोत्र में, भक्त सुब्रह्मण्य को कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी और कोटि चंद्रमाओं की शांति प्रदान करने वाले दयालु के रूप में वर्णित करता है। शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय, देवसेनापति के रूप में असुरों का संहार कर धर्म की रक्षा करते हैं। उनके छह मुख सभी दिशाओं और भक्तों को अपने चित्त में समाहित किए हुए हैं। उनकी कृपा दृष्टि भक्त के जीवन की सभी बाधाओं को दूर कर सुख-शांति प्रदान करती है। प्रत्येक श्लोक में सुब्रह्मण्य स्वामी के विभिन्न गुणों, उनके दिव्य सौंदर्य, आभूषणों और आयुधों का मनोहारी वर्णन किया गया है।
स्तोत्र के आरंभ में, भक्त कुमार, भवानीकुमार, शत्रुओं का नाश करने वाले और निर्विकार गुह का भजन करता है। इसके बाद जपा पुष्प के समान लाल शरीर वाले, सूर्य, चंद्र और अग्नि के समान नेत्रों वाले, मोर पंखों से सुशोभित परम पवित्र स्वामी को नमन करता है। उनके कोटि सूर्यों के समान प्रकाशित रूप, रत्नजड़ित आभूषणों, शरद पूर्णिमा के चंद्रमा के समान सुंदर मुख का वर्णन किया गया है। उनकी कृपा रूपी जल की तरंगों वाली कटाक्ष, कमल के समान नेत्र और भक्तों को अभीष्ट प्रदान करने की क्षमता की स्तुति की गई है। कस्तूरी तिलक से प्रकाशित ललाट, दयापूर्ण चित्त, रत्नजड़ित किरीट और देवसेनापति के रूप में उनके दिव्य सौंदर्य को स्तोत्र अत्यंत सुंदर ढंग से चित्रित करता है।
अंत में, भक्त अपनी अज्ञानता, कमजोरियों, दुखों, दरिद्रता और भय को स्वीकार करते हुए, “सुब्रह्मण्य स्वामी! आप ही मेरी शरण हैं, आप ही मेरे रक्षक हैं” ऐसी हृदयपूर्वक प्रार्थना करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से मन को शांति, साहस, आत्मविश्वास प्राप्त होता है और जीवन दिव्य ऊर्जा से भर जाता है। सुब्रह्मण्य स्वामी की कृपा प्राप्त करने का यह एक श्रेष्ठ मार्ग है।
लाभ (Benefits):
- बाधाओं का निवारण: इस स्तोत्र का पाठ जीवन की सभी प्रकार की बाधाओं, शत्रु भय और नकारात्मक शक्तियों को दूर करने में सहायता करता है।
- स्वास्थ्य और धन वृद्धि: दरिद्रता, ऋण और आर्थिक समस्याओं को दूर कर उत्तम स्वास्थ्य, धन और समृद्धि प्रदान करता है।
- साहस और आत्मविश्वास: भय को समाप्त कर मन को अपार साहस, आत्मविश्वास और मानसिक स्पष्टता प्रदान करता है।
- ज्ञान और बुद्धि: सुब्रह्मण्य ज्ञान के अधिदेवता हैं, इसलिए यह स्तोत्र छात्रों और ज्ञान के साधकों की बुद्धि और सीखने की क्षमता को बढ़ाता है।
- पारिवारिक शांति: पारिवारिक कलह, चिंताएं और तनाव को दूर कर परिवार में शांति, सद्भाव और खुशी लाता है।
- शुभ परिणाम: जीवन में अच्छे अवसर, सफलता और सकारात्मक परिवर्तन लाता है, भक्तों को शीघ्र ही सुब्रह्मण्य की कृपा प्राप्त होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री सुब्रह्मण्य भुजंग प्रयात स्तोत्रम क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री सुब्रह्मण्य भुजंग प्रयात स्तोत्र पाठ के क्या लाभ हैं?
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या रचयिता कौन हैं?
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