श्री स्कंद स्तोत्रं (महाभारते)
मार्कंडेय उवाच |
आग्नेयश्चैव स्कंदश्च दीप्तकीर्तिरनामयः |
मयूरकेतुर्धर्मात्मा भूतेशो महिषार्दनः || 1 ||
कामजित्कामदः कांतः सत्यवाग्भुवनेश्वरः |
शिशुः शीघ्रः शुचिश्चंडो दीप्तवर्णः शुभाननः || 2 ||
अमोघस्त्वनघो रौद्रः प्रियश्चंद्राननस्तथा |
दीप्तशक्तिः प्रशांतात्मा भद्रकुक्कुटमोहनः || 3 ||
षष्ठीप्रियश्च धर्मात्मा पवित्रो मातृवत्सलः |
कन्याभर्ता विभक्तश्च स्वाहेयो रेवतीसुतः || 4 ||
प्रभुर्नेता विशाखश्च नैगमेयः सुदुश्चरः |
सुव्रतो ललितश्चैव बालक्रीडनकप्रियः || 5 ||
खचारी ब्रह्मचारी च शूरः शरवणोद्भवः |
विश्वामित्रप्रियश्चैव देवसेनाप्रियस्तथा |
वासुदेवप्रियश्चैव प्रियः प्रियकृदेव तु || 6 ||
नामान्येतानि दिव्यानि कार्तिकेयस्य यः पठेत् |
स्वर्गं कीर्तिं धनं चैव स लभेन्नात्र संशयः || 7 ||
स्तोष्यामि देवैरृषिभिश्च जुष्टं
शक्त्या गुहं नामभिरप्रमेयं |
षडाननं शक्तिधरं सुवीरं
निबोध चैतानि कुरुप्रवीर || 8 ||
ब्रह्मण्यो वै ब्रह्मजो ब्रह्मविच्च
ब्रह्मेशयो ब्रह्मवतां वरिष्ठः |
ब्रह्मप्रियो ब्राह्मणसर्वमंत्री त्वं
ब्रह्मणां ब्राह्मणानां च नेता || 9 ||
स्वाहा स्वधा त्वं परमं पवित्रं
मंत्रस्तुतस्त्वं प्रथितः षडर्चिः |
संवत्सरस्त्वमृतवश्च षड्वै
मासार्धमासाश्च दिनं दिशश्च || 10 ||
त्वं पुष्कराक्षस्त्वरविंदवक्त्रः
सहस्रचक्षोऽसि सहस्रबाहुः |
त्वं लोकपालः परमं हविश्च
त्वं भावनः सर्वसुरासुराणां || 11 ||
त्वमेव सेनाधिपतिः प्रचंडः
प्रभुर्विभुश्चाप्यथ शक्रजेता |
सहस्रभूस्त्वं धरणी त्वमेव
सहस्रतुष्टिश्च सहस्रभुक्च || 12 ||
सहस्रशीर्षस्त्वमनंतरूपः
सहस्रपात्त्वं दशशक्तिधारी |
गंगासुतस्त्वं स्वमतेन देव
स्वाहामहीकृत्तिकानां तथैव || 13 ||
त्वं क्रीडसे षण्मुख कुक्कुटेन
यथेष्टनानाविधकामरूपी |
दीक्षाऽसि सोमो मरुतः सदैव
धर्मोऽसि वायुरचलेंद्र इंद्रः || 14 ||
सनातनानामपि शाश्वतस्त्वं
प्रभुः प्रभूणामपि चोग्रधन्वा |
ऋतस्य कर्ता दितिजांतकस्त्वं
जेता रिपूणां प्रवरः सुराणां || 15 ||
सूक्ष्मं तपस्तत्परमं त्वमेव
परावरज्ञोऽसि परावरस्त्वं |
धर्मस्य कामस्य परस्य चैव
त्वत्तेजसा कृत्स्नमिदं महात्मन् || 16 ||
व्याप्तं जगत्सर्वसुरप्रवीर
शक्त्या मया संस्तुत लोकनाथ |
नमोऽस्तु ते द्वादशनेत्रबाहो
अतः परं वेद्मि गतिं न तेऽहं || 17 ||
स्कंदस्य य इदं विप्रः पठेज्जन्म समाहितः |
श्रावयेद्ब्राह्मणेभ्यो यः शृणुयाद्वा द्विजेरितं || 18 ||
धनमायुर्यशो दीप्तं पुत्रान् शत्रुजयं तथा |
स पुष्टितुष्टी संप्राप्य स्कंदसालोक्यमाप्नुयात् || 19 ||
इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याये स्कंद स्तोत्रं |
अर्थ
महाभारत के अरण्यक पर्व में महर्षि मार्कण्डेय द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया गया यह श्री स्कंद स्तोत्रं, भगवान कार्तिकेय के दिव्य गुणों, शक्तियों, जगतव्यापी स्वरूप और सभी देवताओं द्वारा उनकी पूजनीयता का भव्य स्तुतिगान है। यह स्तोत्र स्कंद के हजारों नामों में से प्रमुख दिव्य नामों का उल्लेख करते हुए उनके परमत्व का वर्णन करता है। स्कंद – अग्नि से जन्मे, मयूरकेतु, धर्मात्मा, कामजित, तेजोमय, शुभानन, रौद्र शक्ति से दुष्ट शक्तियों का संहार करने वाले, शांत स्वरूप, मातृवत्सल, रेवती पुत्र, विशाख, शरवण में जन्मे, देवसेनापति, वासुदेव के प्रिय – ऐसे अनेक दिव्य रूपों का यह स्तोत्र उल्लेख करता है।
श्लोक बताते हैं कि स्कंद का स्थान वेदों में, ऋतुओं में, दिशाओं में, कालचक्र में और पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। वही तपस्या, धर्म, शोभा, शक्ति, ज्ञान और परम सत्य हैं। वे अनेक रूपों में ब्रह्मांड में व्याप्त हैं और देवासुरों के आद्याधिपति तथा रक्षक हैं। इस स्तोत्र में स्कंद को “सहस्रनेत्र, सहस्रबाहु, सहस्रपाद, अनंत रूप, दशशक्तिधारी” कहकर उनकी स्तुति की गई है और उन्हें समस्त जगत में व्याप्त महाशक्ति स्वरूप घोषित किया गया है। उनका तेज पूरे ब्रह्मांड को भर देता है और उनकी शक्ति असीम है। देवता, मनुष्य और ऋषि जिस दैवी शक्ति की आराधना करते हैं – स्कंद सर्वलोक के रक्षक, धर्मकर्ता, दुष्टसंहारी, कृपामूर्ति और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं, यह भाव इस स्तोत्र में गहराई से प्रतिध्वनित होता है।
यह स्तोत्र भगवान कार्तिकेय के शौर्य, ज्ञान और भक्त वात्सल्य को उजागर करता है। वे केवल युद्ध के देवता ही नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रतीक, धर्म के रक्षक और भक्तों को अभय प्रदान करने वाले भी हैं। प्रत्येक श्लोक स्कंद के एक-एक दिव्य गुण का अनावरण करता है, उनकी सर्वव्यापकता और सर्वोच्चता का उद्घोष करता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्त मानसिक शांति, साहस और ज्ञान प्राप्त करते हैं। स्कंद की महिमा का गुणगान करना ब्रह्मांड की शक्ति का आह्वान करने जैसा है।
सारांश: यह महाभारत का स्कंद स्तोत्रं भगवान कार्तिकेय की दिव्य महिमा और सार्वभौमिक उपस्थिति की एक सर्व-समावेशी स्तुति है। यह उनकी सर्वोच्च शक्ति, ब्रह्मांडीय स्वरूप, धर्म-रक्षक स्वभाव, करुणा और आशीर्वादों को उजागर करता है। स्कंद स्तोत्र का पाठ भय, रोगों, पाप-पीड़ा और शत्रु भय को दूर कर आयु, आरोग्य, यश, ऐश्वर्य, पुत्र-पौत्र संपत्ति, धैर्य, विजय और अंततः स्कंदलोक की प्राप्ति कराता है, यह महाभारत प्रमाणित करता है।
लाभ (Benefits):
- भय निवारण: इस स्तोत्र का पाठ करने से मन के सभी भय दूर होते हैं और व्यक्ति में निर्भयता व साहस बढ़ता है।
- स्वास्थ्य और दीर्घायु: नियमित पाठ शरीर के रोगों को दूर कर उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु प्रदान करता है।
- धन और सफलता: भगवान स्कंद की कृपा से धन-धान्य की वृद्धि होती है और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता व कीर्ति प्राप्त होती है।
- शत्रु विजय: शत्रुओं से उत्पन्न बाधाएं दूर होती हैं और सभी विरोधियों पर विजय प्राप्त करने में यह स्तोत्र सहायक होता है।
- संतान प्राप्ति: पुत्र-पौत्र की कामना करने वाले और संतान सुख से वंचित लोगों के लिए यह स्तोत्र विशेष रूप से फलदायी है।
- स्कंदलोक की प्राप्ति: अंततः, इस स्तोत्र का निरंतर पाठ और भक्ति भक्तों को स्कंदलोक में शाश्वत स्थान प्रदान करती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री स्कंद स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री स्कंद स्तोत्रं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ होते हैं?
किसे श्री स्कंद स्तोत्रं का पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
श्री स्कंद स्तोत्रं का मूल स्रोत क्या है?
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