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श्री स्कंद स्तवं

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स्तोत्र
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श्री स्कंद स्तवं

वामदेव उवाच |
ॐ नमः प्रणवार्थाय प्रणवार्थविधायिने |
प्रणवाक्षरबीजाय प्रणवाय नमो नमः || 1 ||

वेदांतार्थस्वरूपाय वेदांतार्थविधायिने |
वेदांतार्थविदे नित्यं विदिताय नमो नमः || 2 ||

नमो गुहाय भूतानां गुहासु निहिताय च |
गुह्याय गुह्यरूपाय गुह्यागमविदे नमः || 3 ||

अणोरणीयसे तुभ्यं महतोऽपि महीयसे |
नमः परावरज्ञाय परमात्मस्वरूपिणे || 4 ||

स्कंदाय स्कंदरूपाय मिहिरारुणतेजसे |
नमो मंदारमालोद्यन्मुकुटादिभृते सदा || 5 ||

शिवशिष्याय पुत्राय शिवस्य शिवदायिने |
शिवप्रियाय शिवयोरानंदनिधये नम || 6 ||

गांगेयाय नमस्तुभ्यं कार्तिकेयाय धीमते |
उमापुत्राय महते शरकाननशायिने || 7 ||

षडक्षरशरीराय षड्विधार्थविधायिने |
षडध्वातीतरूपाय षण्मुखाय नमो नमः || 8 ||

द्वादशायतनेत्राय द्वादशोद्यतबाहवे |
द्वादशायुधधाराय द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते || 9 ||

चतुर्भुजाय शांताय शक्तिकुक्कुटधारिणे |
वरदाय विहस्ताय नमोऽसुरविदारिणे || 10 ||

गजावल्लीकुचालिप्तकुंकुमांकितवक्षसे |
नमो गजाननानंदमहिमानंदितात्मने || 11 ||

ब्रह्मादिदेवमुनिकिन्नरगीयमान-
-गाथाविशेषशुचिचिंतितकीर्तिधाम्ने |
बृंदारकामलकिरीटविभूषणस्र-
-क्पूज्याभिरामपदपंकज ते नमोऽस्तु || 12 ||

इति स्कंदस्तवं दिव्यं वामदेवेन भाषितं |
यः पठेच्छृणुयाद्वापि स याति परमां गतिं || 13 ||

महाप्रज्ञाकरं ह्येतच्छिवभक्तिविवर्धनं |
आयुरारोग्यधनकृत्सर्वकामप्रदं सदा || 14 ||

इति श्रीशिवमहापुराणे कैलाससंहितायां एकादशोऽध्याये वामदेवकृत स्कंदस्तवं |

अर्थ

श्री स्कंद स्तवं, शिव महापुराण में महर्षि वामदेव द्वारा वर्णित एक अत्यंत पवित्र स्तुति है। यह भगवान स्कंद को 'ॐ' (प्रणव) के वास्तविक स्वरूप, वेदांत के सार और सभी प्राणियों के भीतर छिपी हुई परम आत्मा के रूप में महिमामंडित करता है। यह स्तोत्र स्कंद के दिव्य गुणों, रूपों और शक्तियों का विस्तार से वर्णन करता है, जो भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान और भौतिक लाभ प्रदान करने की शक्ति रखता है।

स्कंद को 'ॐ' (प्रणव) का वास्तविक स्वरूप, वेदांत तत्व का उपदेश देने वाले परमात्मा स्वरूप, गुह्य ज्ञान के आत्म-स्वरूप और अणु-महान स्वरूपों दोनों से परे अनंत तत्व के रूप में स्तुति की गई है। स्कंद मिहिरारुण कांति (उगते सूर्य के समान तेज) से प्रकाशित दिव्य रूप वाले, शिव के शिष्य, शिवपुत्र और शिव-पार्वती के आनंद स्वरूप हैं। वे गंगापुत्र, उमा के तेज को धारण करने वाले ज्ञानमूर्ति और कृत्तिकाओं द्वारा पोषित कार्तिकेय हैं। उनका स्वरूप छह मुखों वाला षण्मुख है, जो छह धर्म-तत्वों का मूल आधार है और छह शक्तियों का समाहार है। ये छह मुख षडाध्वातीत (छह आध्यात्मिक मार्गों से परे) तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।

स्कंद द्वादशायता नेत्र (बारह विशाल नेत्र), द्वादशोद्यत बाहु (बारह ऊँची भुजाएँ) और द्वादशायुध धारण करने वाले विश्वरूपी हैं, जो दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाले शक्ति स्वरूप हैं। वे धर्म के रक्षक और देवताओं के सेनापति के रूप में विराजमान हैं। वे वल्ली और देवसेना को आनंद देने वाले हैं; गजानन के साथ प्रेम भाव रखने वाले हैं। ब्रह्मा, देवगण, ऋषि, गंधर्व और किन्नर नित्य उनकी कीर्ति का गान करते हैं। भक्तों के प्रत्येक विचार, प्रत्येक यज्ञ और प्रत्येक धर्म कार्य में स्कंद की शक्ति और ज्ञान प्रवाहित होता है। उनके चरण कमल दिव्य लोकों में देवगणों द्वारा पूजित हैं।

यह स्तवं स्कंद को परब्रह्म स्वरूप, शक्ति, करुणा, गुह्य तत्व, धर्म संस्थापकत्व और ज्ञान प्रदायकत्व के साथ प्रशंसा करता है। स्कंद सनातन, प्राचीन, देवताओं में श्रेष्ठ और आनंद, स्वास्थ्य, दीर्घायु, सफलता तथा मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्त भक्ति, ज्ञान, धैर्य और समृद्धि प्राप्त करते हैं। यह स्कंद लोक तक पहुँचने का साधन है, अंतिम मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

लाभ (Benefits):

  • ज्ञान और बुद्धि: चूंकि स्कंद ज्ञान के अधिपति हैं, इस स्तोत्र का पाठ करने से आध्यात्मिक और लौकिक ज्ञान तथा तीव्र बुद्धि प्राप्त होती है।
  • स्वास्थ्य और दीर्घायु: स्कंद स्वास्थ्य और जीवन शक्ति के दाता हैं, इस स्तवं का पाठ रोगों से मुक्ति दिलाता है और दीर्घायु प्रदान करता है।
  • शत्रु नाश और सुरक्षा: स्कंद देवताओं के सेनापति हैं, इस स्तोत्र का पाठ आंतरिक और बाहरी शत्रुओं का नाश करता है और सभी खतरों से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • मनोकामना पूर्ति और समृद्धि: भगवान सुब्रमण्यम भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करने वाले हैं। इस स्तवं के पाठ से धन, धान्य, संतान और समृद्धि प्राप्त होती है।
  • मोक्ष प्राप्ति: स्कंद प्रणव स्वरूप हैं, इस स्तोत्र का नियमित पाठ अंततः मोक्ष और स्कंद लोक की प्राप्ति में सहायक होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री स्कंद स्तवं क्या है?
श्री स्कंद स्तवं शिव महापुराण में महर्षि वामदेव द्वारा रचित भगवान स्कंद को समर्पित एक पवित्र स्तोत्र है। यह स्कंद को प्रणव स्वरूप, वेदांत के सार और परम आत्मा के रूप में महिमामंडित करता है।
श्री स्कंद स्तवं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तवं का पाठ मंगलवार, षष्ठी तिथि या कार्तिक मास में करना विशेष फलदायी होता है। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनकर, स्कंद की प्रतिमा या चित्र के समक्ष भक्ति और श्रद्धा से पाठ करना चाहिए।
श्री स्कंद स्तवं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस स्तवं के पाठ से ज्ञान, बुद्धि, उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, शत्रुओं से मुक्ति, मनोकामना पूर्ति, समृद्धि और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह मन को शांति और साहस प्रदान करता है।
श्री स्कंद स्तवं का पाठ किसे करना चाहिए?
ज्ञान, विवेक, साहस, उत्तम स्वास्थ्य, शत्रुओं से सुरक्षा और आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा रखने वाले कोई भी भक्त इस स्तवं का पाठ कर सकते हैं। विशेष रूप से बच्चों और छात्रों के लिए यह अत्यधिक लाभकारी है।
श्री स्कंद स्तवं का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
उत्तम परिणामों के लिए, इस स्तोत्र का प्रतिदिन 11, 21, 51 या 108 बार पाठ किया जा सकता है। भक्ति और श्रद्धा के साथ नियमित रूप से पाठ करना महत्वपूर्ण है।
श्री स्कंद स्तवं का मूल या उद्गम क्या है?
श्री स्कंद स्तवं शिव महापुराण का एक अंश है। इसे महान ज्ञानी महर्षि वामदेव ने लोक कल्याण के लिए रचा था।

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