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श्री स्कंद षट्कं

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स्तोत्र
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श्री स्कंद षट्कं

षण्मुखं पार्वतीपुत्रं क्रौंचशैलविमर्दनं |
देवसेनापतिं देवं स्कंदं वंदे शिवात्मजं || 1 ||

तारकासुरहंतारं मयूरासनसंस्थितं |
शक्तिपाणिं च देवेशं स्कंदं वंदे शिवात्मजं || 2 ||

विश्वेश्वरप्रियं देवं विश्वेश्वरतनूद्भवं |
कामुकं कामदं कांतं स्कंदं वंदे शिवात्मजं || 3 ||

कुमारं मुनिशार्दूलमानसानंदगोचरं |
वल्लीकांतं जगद्योनिं स्कंदं वंदे शिवात्मजं || 4 ||

प्रळयस्थितिकर्तारं आदिकर्तारमीश्वरं |
भक्तप्रियं मदोन्मत्तं स्कंदं वंदे शिवात्मजं || 5 ||

विशाखं सर्वभूतानां स्वामिनं कृत्तिकासुतं |
सदाबलं जटाधारं स्कंदं वंदे शिवात्मजं || 6 ||

स्कंदषट्कं स्तोत्रमिदं यः पठेच्छृणुयान्नरः |
वांछितान् लभते सद्यश्चांते स्कंदपुरं व्रजेत् || 7 ||

इति श्रीस्कंदषट्कं |

अर्थ

श्री स्कंद षट्कं छह श्लोकों का एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है जो भगवान स्कंद (कार्तिकेय, मुरुगन) की शक्ति, दिव्यता, अवतार लीला, करुणा, संरक्षण और भक्तवत्सलता का गुणगान करता है। स्कंद, जो भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं, क्रौंच पर्वत का भेदन करने वाले महाबली, देवों के सेनापति, मयूर वाहन पर आरूढ़ और शक्ति आयुध धारण करने वाले दिव्य स्वरूप हैं। यह स्तोत्र स्कंद के कई परमात्म रूपों का चित्रण करता है, उनकी वीरता, तेज और भक्तों के प्रति उनके प्रेम को उजागर करता है।

पहला श्लोक भगवान स्कंद को षण्मुख, पार्वती के पुत्र, क्रौंच पर्वत का मर्दन करने वाले, देवसेना के सेनापति और शिव के आत्मज के रूप में वंदन करता है। यह उनके मूल परिचय और उनके पराक्रमी कार्यों में से एक को दर्शाता है। दूसरा श्लोक उन्हें तारकासुर का संहार करने वाला, मयूर पर विराजमान, शक्ति आयुध धारण करने वाला और देवताओं का स्वामी बताता है, जो उनकी वीरता और दैवीय शक्ति को रेखांकित करता है। तीसरा श्लोक उन्हें विश्वेश्वर (शिव) के प्रिय, विश्वेश्वर के शरीर से उत्पन्न, कामनाएँ पूर्ण करने वाले और अत्यंत सुंदर कांति वाले देव के रूप में पूजता है, जो उनके सौंदर्य और भक्तों के मनोरथ पूर्ण करने की क्षमता को दर्शाता है।

चौथे श्लोक में, कुमार स्कंद को मुनि श्रेष्ठों के मन को आनंदित करने वाले, वल्ली के प्रिय और जगत के मूल कारण के रूप में वर्णित किया गया है। यह उनके बाल रूप के आकर्षण और ब्रह्मांड के सृजन में उनकी भूमिका को इंगित करता है। पाँचवाँ श्लोक उन्हें प्रलय और स्थिति के कर्ता, आदि कर्ता, भक्तों के प्रिय और मदोन्मत्त ईश्वर के रूप में स्तुति करता है। यह उनके सर्वोच्च ईश्वरत्व और भक्तों के प्रति उनके असीम प्रेम को उजागर करता है। अंतिम छठे श्लोक में, उन्हें विशाख, सभी प्राणियों के स्वामी, कृत्तिका देवियों के पुत्र, सदा बलवान और जटाधारी के रूप में वंदन किया गया है। यह उनके विविध नामों, संबंधों और उनके शक्तिशाली तपस्वी स्वरूप को प्रकट करता है।

यह स्तोत्र भगवान स्कंद के अनेक आयामों – उनकी दिव्य शक्ति, सुंदरता, ज्ञान और करुणा को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है। श्री स्कंद षट्कं का पाठ करना केवल एक स्तोत्र का उच्चारण नहीं है, बल्कि यह दिव्य शक्ति और संरक्षण का आह्वान है। जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, वे स्कंद की कृपा के पात्र बनते हैं और जीवन की बाधाओं को पार करने में सक्षम होते हैं। यह उन्हें साहस, आत्मविश्वास, इच्छाओं की पूर्ति, सुरक्षा और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • बाधाओं का निवारण: श्री स्कंद षट्कं का नियमित पाठ भक्तों के जीवन से सभी प्रकार की बाधाओं, विघ्नों और नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करता है, जिससे शुभ कार्यों में सफलता मिलती है।
  • साहस और आत्मविश्वास की वृद्धि: चूंकि स्कंद एक महान योद्धा हैं, इस स्तोत्र का पाठ भक्तों में साहस, धैर्य और आत्मविश्वास को बढ़ाता है, जिससे वे किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम होते हैं।
  • मनोकामना पूर्ति: स्कंद कामनाओं को पूर्ण करने वाले देव हैं। श्रद्धा और भक्ति से इस स्तोत्र का पाठ करने वालों की सभी सद् इच्छाएँ पूरी होती हैं, और उन्हें जीवन में समृद्धि तथा आनंद की प्राप्ति होती है।
  • संरक्षण और आध्यात्मिक उत्थान: स्कंद सभी प्राणियों के स्वामी हैं, यह षट्कं भक्तों को दैवीय संरक्षण प्रदान करता है और उन्हें आध्यात्मिक प्रगति, ज्ञान तथा आंतरिक शांति की ओर ले जाता है।
  • स्कंदलोक की प्राप्ति: स्तोत्र की फलश्रुति के अनुसार, जो व्यक्ति इस स्कंद षट्कं का पाठ करता है या सुनता है, वह अपनी सभी इच्छाओं को प्राप्त कर अंततः स्कंदलोक (भगवान कार्तिकेय का दिव्य निवास) को प्राप्त करता है, जो मोक्ष के समान है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री स्कंद षट्कं क्या है?
श्री स्कंद षट्कं भगवान स्कंद (कार्तिकेय, मुरुगन) को समर्पित छह श्लोकों का एक शक्तिशाली भक्ति स्तोत्र है। यह उनकी वीरता, दिव्य शक्ति, सौंदर्य, करुणा और भक्तों के प्रति प्रेम का गुणगान करता है।
श्री स्कंद षट्कं का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन मंगलवार को, षष्ठी तिथि पर या कार्तिकेय को समर्पित अन्य शुभ दिनों पर पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है। प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद पाठ करना उत्तम है।
श्री स्कंद षट्कं का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
स्कंद षट्कं का पाठ करने से बाधाएं दूर होती हैं, साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, दैवीय संरक्षण मिलता है और अंततः आध्यात्मिक उन्नति तथा स्कंदलोक की प्राप्ति होती है।
श्री स्कंद षट्कं का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान स्कंद के भक्त, बच्चे, परीक्षाओं में सफलता चाहने वाले, चिंता और भय से ग्रस्त व्यक्ति, या किसी भी शुभ कार्य में बाधाओं का सामना कर रहे लोग इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
श्री स्कंद षट्कं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः, इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन एक या तीन बार करना उत्तम होता है। विशेष मनोकामनाओं के लिए 11, 21, 108 बार पाठ किया जा सकता है या एक निश्चित अवधि के लिए संकल्प लेकर पाठ किया जा सकता है।
श्री स्कंद षट्कं का उद्भव या इतिहास क्या है?
श्री स्कंद षट्कं एक प्राचीन संस्कृत स्तोत्र है, जिसके विशिष्ट रचयिता के बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि, यह पुराणों और आगमिक परंपरा में स्कंद की महिमा का बखान करने वाले एक महत्वपूर्ण भाग के रूप में भक्तों द्वारा पढ़ा जाता है।

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