श्री षण्मुख स्तोत्रं
नारदादिदेवयोगिबृंदहृन्निकेतनं
बर्हिवर्यवाहमिंदुशेखरेष्टनंदनं |
भक्तलोकरोगदुःखपापसंघभंजनं
भावयामि सिंधुतीरवासिनं षडाननं || 1 ||
तारकारीमिंद्रमुख्यदेवबृंदवंदितं
चंद्रचंदनादि शीतलांकमात्मभावितं |
यक्षसिद्धकिन्नरादिमुख्यदिव्यपूजितं
भावयामि सिंधुतीरवासिनं षडाननं || 2 ||
चंपकाब्जमालतीसुमादिमाल्यभूषितं
दिव्यषट्किरीटहारकुंडलाद्यलंकृतं |
कुंकुमादियुक्तदिव्यगंधपंकलेपितं
भावयामि सिंधुतीरवासिनं षडाननं || 3 ||
आश्रिताखिलेष्टलोकरक्षणामरांघ्रिपं
शक्तिपाणिमच्युतेंद्रपद्मसंभवाधिपं |
शिष्टलोकचिंतितार्थसिद्धिदानलोलुपं
भावयामि सिंधुतीरवासिनं षडाननं || 4 ||
वीरबाहु पूर्वकोटिवीरसंघसौख्यदं
शूरपद्ममुख्यलक्षकोटिशूरमुक्तिदं |
इंद्रपूर्वदेवसंघसिद्धनित्यसौख्यदं
भावयामि सिंधुतीरवासिनं षडाननं || 5 ||
जंबवैरिकामिनीमनोरथाभिपूरकं
कुंभसंभवाय सर्वधर्मसारदायकं |
तं भवाब्धिपोतमंबिकेयमाशु सिद्धिदं
भावयामि सिंधुतीरवासिनं षडाननं || 6 ||
पूर्णचंद्रबिंबकोटितुल्यवक्त्रपंकजं
वर्णनीयसच्चरित्रमिष्टसिद्धिदायकं |
स्वर्णवर्णगात्रमुग्रसिद्धलोकशिक्षकं
भावयामि सिंधुतीरवासिनं षडाननं || 7 ||
पूर्वजन्मसंचिताघसंघभंगतत्परं
सर्वधर्मदानकर्मपूर्वपुण्यसिद्धिदं |
सर्वशत्रुसंघभंगदक्षमिंद्रजापतिं
भावयामि सिंधुतीरवासिनं षडाननं || 8 ||
इति श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ तिरुचेंदूर् श्री षण्मुख स्तोत्रं |
अर्थ
श्री षण्मुख स्तोत्रम् एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है जो सिंधु तट पर निवास करने वाले छह मुख वाले भगवान श्री सुब्रह्मण्यम की भक्तिपूर्ण स्तुति करता है। यह स्तोत्र भगवान षण्मुख की दिव्य महिमा, शक्ति और करुणा का सुंदर वर्णन करता है। नारद आदि देवयोगी, सिद्ध, गंधर्व, किन्नर और सभी देवताओं द्वारा पूजित इस जगत के रक्षक बालसुब्रह्मण्यम के गुणों का गान इन श्लोकों में समाहित है। भक्तों के हृदय में ज्ञान के रूप में निवास करने वाले षण्मुख, समस्त रोगों, पापों और दुःखों का नाश करने वाले दयालु देवता हैं।
षण्मुख भगवान तारकासुर का संहार करने वाले पराक्रमी योद्धा हैं। अपनी चंद्र-शीतल कांति से वे भक्तों को शांति और संतोष प्रदान करते हैं। देवता, यक्ष, किन्नर, सिद्ध निरंतर इनकी स्तुति करते हैं। ये दिव्य स्वरूप वाले भगवान सुगंधित पुष्पमालाओं, कुमकुम, चंदन आदि दिव्य अलंकरणों से सुशोभित रहते हैं। भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले, कार्यसिद्धि और धर्मबल प्रदान करने वाले सर्वेश्वर हैं। वीर, शूर और देवता भी इनका आदर करते हैं।
भगवान षण्मुख शिव और पार्वती के प्रिय पुत्र हैं, जो सभी जीवों को संरक्षण और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। आश्रित भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करने वाले ये करुणामयी देवता हैं। अच्युत (विष्णु), इंद्र और पद्मसंभव (ब्रह्मा) जैसे देवताओं के भी अधिपति हैं। वे अपने शक्ति आयुध से दुष्ट शक्तियों का नाश कर शिष्टों की रक्षा करते हैं। पूर्वजन्म के पापों को क्षण भर में दूर करने वाले पुण्यस्वरूप षण्मुख आध्यात्मिक शक्ति, ज्ञान और आंतरिक शांति प्रदान करते हैं।
यह स्तोत्र शरणागति, भक्ति, रक्षा और करुणा के दिव्य भावों से ओतप्रोत है। इसका पाठ करने से भक्त मानसिक शांति, साहस और जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। षण्मुख के अनुग्रह से सभी बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।
लाभ (Benefits):
- पाप और पूर्वजन्म दोषों का निवारण: इस स्तोत्र के पाठ से पूर्वजन्म के पाप, दोष और जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं।
- शत्रु भय निवारण और विजय: शत्रुओं से उत्पन्न भय, बुरी नज़र और नकारात्मक ऊर्जाएँ नष्ट होती हैं, जिससे साहस, शौर्य और सभी कार्यों में विजय प्राप्त होती है।
- स्वास्थ्य और मानसिक शांति: रोगों, कष्टों और मानसिक भयों में कमी आती है, उत्तम स्वास्थ्य और आंतरिक शांति मिलती है।
- कार्यसिद्धि और नौकरी में सफलता: नौकरी, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे क्षेत्रों में सफलता और कार्यसिद्धि प्राप्त होती है।
- पारिवारिक शांति और धन-संपदा: परिवार में शांति, बच्चों की रक्षा और धन-संपदा में वृद्धि होती है, साथ ही शुभ कार्य संपन्न होते हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति और आत्मविश्वास: आध्यात्मिक शक्ति, ज्ञान और आत्मविश्वास बढ़ता है, ग्रह दोषों का निवारण होता है और आंतरिक विकास संभव होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री षण्मुख स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
श्री षण्मुख स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
श्री षण्मुख स्तोत्रं का उद्गम क्या है?
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