श्री षण्मुख षट्पदी स्तवः
मयूराचलाग्रे सदारं वसंतं
मुदारं ददानं नतेभ्यो वरांश्च |
दधानं करांभोजमध्ये च शक्तिं
सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे || 1 ||
गिरीशास्यवाराशिपूर्णेंदुबिंबं
कुरंगांकधिक्कारिवक्त्रारविंदं |
सुरेंद्रात्मजाचित्तपाथोजभानुं
सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे || 2 ||
नतानां हि राज्ञां गुणानां च षण्णां
कृपाभारतो यो द्रुतं बोधनाय |
षडास्यांबुजातान्यगृह्णात्परं तं
सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे || 3 ||
पुरा तारकं यो विजित्याजिमध्ये
सुरांदुःखमुक्तांश्चकाराशु मोदात् |
तमानंदकंदं कृपावारिराशिं
सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे || 4 ||
शराणां वने जातमेनं हि बालं
यतः कृत्तिकाः पाययंति स्म दुग्धं |
ततः कार्तिकेयं वदंतीह यं तं
सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे || 5 ||
हरंतं च बाढं तमो हार्दगाढं
गवानाद्यया चातिमोदेन लीढं |
सुरेंद्रस्य पुत्र्या च गाढोपगूढं
सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे || 6 ||
इयं षट्पदी यस्य वक्त्रारविंदे
विहारं करोत्यादरान्नित्यमेव |
षडास्यः कृपातः समस्ताश्च विद्या
वितीर्याशु तस्मै स्वभक्तिं ददाति || 7 ||
इति श्रीशृंगेरिजगद्गुरु श्रीसच्चिदानंद शिवाभिनवनृसिंहभारती स्वामिभिः विरचितं श्री षण्मुख षट्पदी स्तवः |
अर्थ
श्री षण्मुख षट्पदी स्तव भगवान षण्मुख को भक्तों के हृदय कमल में निवास करने के लिए आमंत्रित करने वाला एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। 'षट्पदी' शब्द का अर्थ है 'छह पद' या 'छह चरण', जो स्तोत्र के छह श्लोकों और भगवान षण्मुख के छह दिव्य गुणों को दर्शाता है। यह एक रूपक भी है, जैसे एक भौंरा कमल पर बैठकर उसका रसपान करता है, वैसे ही भक्त को अपने हृदय में भगवान षण्मुख का ध्यान करते हुए उनकी कृपा का अमृतपान करना चाहिए। यह स्तोत्र भगवान षण्मुख के सौंदर्य, करुणा, ज्ञान, शक्ति, पराक्रम और सुरक्षा जैसे छह दिव्य गुणों की महिमा का गान करता है, जो भक्तों को परम आनंद प्रदान करते हैं।
भगवान षण्मुख ज्ञान के अधिपति, देवताओं के सेनापति और अज्ञानता के विनाशक हैं। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त अपने मन के अंधकार को दूर करने और ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। भगवान षण्मुख के छह मुखों को छह गुणों - ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य का प्रतीक माना जाता है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भक्तों का मन शुद्ध होता है और उन्हें आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने में सहायता मिलती है, जिससे जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।
स्तोत्र का प्रत्येक पद्य भगवान षण्मुख के विभिन्न आयामों को उजागर करता है। पहले पद्य में, मयूर पर आरूढ़ षण्मुख को भक्तों को वर प्रदान करने वाला और हृदय कमल में सदैव प्रकाशित होने वाली दिव्य ज्योति के रूप में वर्णित किया गया है। दूसरा पद्य उनके छह मुखों को शिव के मुखचंद्र के समान उज्ज्वल और ज्ञान के प्रकाश के प्रतीक के रूप में चित्रित करता है, जो देवसेना के मन को आनंदित करते हैं। तीसरा पद्य यह बताता है कि भगवान ने भक्तों को शीघ्र ज्ञान प्रदान करने के लिए कृपापूर्वक छह कमल जैसे मुख धारण किए हैं, जो उनकी सर्वज्ञता का प्रतीक है।
चौथा पद्य तारकासुर का वध करके देवताओं को दुःख से मुक्त करने वाले पराक्रमी और करुणा के सागर षण्मुख की स्तुति करता है, जिन्होंने सभी को आनंद प्रदान किया। पांचवां पद्य शरवण में उनके जन्म और कृत्तिका माताओं द्वारा उनके पालन-पोषण का वर्णन करता है, जिससे उन्हें 'कार्तिकेय' नाम मिला। छठा पद्य हृदय के गहन अज्ञान रूपी अंधकार को हरने वाले और देवसेना द्वारा आलिंगित भगवान षण्मुख की कृपा का वर्णन करता है, जो भक्तों को परम आनंद और आंतरिक शांति प्रदान करते हैं।
लाभ (Benefits):
- विद्या और ज्ञान की वृद्धि: यह स्तोत्र विद्यार्थियों को उत्कृष्ट बुद्धि, स्मरण शक्ति और एकाग्रता प्रदान करता है, जिससे उन्हें परीक्षाओं और शिक्षा में सफलता मिलती है और सीखने की क्षमता बढ़ती है।
- बाधाओं का निवारण: जीवन के सभी क्षेत्रों में आने वाली बाधाओं, ग्रह दोषों, नकारात्मक ऊर्जाओं और बुरी शक्तियों को दूर करता है, जिससे कार्य सुचारू रूप से संपन्न होते हैं।
- साहस और आत्मविश्वास में वृद्धि: भय, चिंता, मानसिक दुर्बलता और आत्मविश्वास की कमी को समाप्त कर साहस और आत्मविश्वास को बढ़ाता है, जिससे व्यक्ति चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनता है।
- स्वास्थ्य सुधार: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, रोगों से मुक्ति दिलाता है। मानसिक शांति और सुकून प्रदान करता है, जिससे एक स्वस्थ जीवन शैली प्राप्त होती है।
- पारिवारिक शांति और समृद्धि: परिवार में शांति, सद्भाव और समृद्धि लाता है। बच्चों की सुरक्षा, अच्छे संस्कार और उत्तम बुद्धि के लिए भी यह स्तोत्र अत्यंत लाभकारी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री षण्मुख षट्पदी स्तव क्या है?
श्री षण्मुख षट्पदी स्तव का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
श्री षण्मुख षट्पदी स्तव का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
श्री षण्मुख षट्पदी स्तव की उत्पत्ति या रचना किसने की?
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