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श्री प्रत्यंगिरा स्तवराजः

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स्तोत्र
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श्री प्रत्यंगिरा स्तवराजः

अस्य श्री प्रत्यंगिरा उग्रकृत्यादेवी महामंत्रस्य प्रत्यंगिरा ऋषिः अनुष्टुप्छंदः श्री शक्तिः प्रत्यंगिरा उग्रकृत्यादेवी देवता ह्रीं बीजं क्रों शक्तिः श्रीं कीलकं मम सर्वशत्रुसंहरणार्थे परमंत्र परयंत्र परतंत्र परकर्म परविद्याद्याभिचारिक विधान विनाशार्थे मम सहकुटुंबस्य सपुत्रकस्य सबांधवस्य सपरिवारस्य क्षेम स्थैर्यायुरारोग्यैश्वराभिवृद्ध्यर्थे श्री प्रत्यंगिरा महादेवी प्रसाद सिद्ध्यर्थे प्रत्यंगिरा मंत्र जपे विनियोगः |

करन्यासः –
ॐ अं ह्रां ह्रीं सहस्रवदनायै आं अंगुष्ठाभ्यां नमः |
ॐ इं ह्रीं ह्रीं अष्टादशभुजायै ईं तर्जनीभ्यां नमः |
ॐ उं ह्रूं ह्रीं त्रिनेत्रायै ऊं मध्यमाभ्यां नमः |
ॐ एं ह्रैं ह्रीं रक्तमाल्यांबरधरायै ऐं अनामिकाभ्यां नमः |
ॐ ॐ ह्रौं ह्रीं सर्वाभरणभूषितायै औं कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
ॐ अं ह्रः ह्रीं महाभयनिवारणायै अः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |

हृदयादिन्यासः –
ॐ अं ह्रां ह्रीं सहस्रवदनायै आं हृदयाय नमः |
ॐ इं ह्रीं ह्रीं अष्टादशभुजायै ईं शिरसे स्वाहा |
ॐ उं ह्रूं ह्रीं त्रिनेत्रायै ऊं शिखायै वषट् |
ॐ एं ह्रैं ह्रीं रक्तमाल्यांबरधरायै ऐं कवचाय हुम् |
ॐ ॐ ह्रौं ह्रीं सर्वाभरणभूषितायै औं नेत्रत्रयाय वौषट् |
ॐ अं ह्रः ह्रीं महाभयनिवारणायै अः अस्त्राय फट् |

ध्यानम् –
सहस्रवदनां देवीं शतबाहूं त्रिलोचनां
रक्तमाल्यांबरधरां सर्वाभरणभूषिताम् |
शक्तिं प्रत्यंगिरां ध्यायेत् सर्वकामार्थसिद्धये
नमः प्रत्यंगिरां देवी प्रतिकूलनिवारिणीम् |
मंत्रसिद्धिं च तां देवीं चिंतयामि हृदंबुजे |
प्रत्यंगिरां शापहरं भूतप्रेतविनाशिनीम् |
चिंतयेदुग्रकृत्यां तां परमैश्वर्यदायिनीम् ||

मनुः –
ॐ ह्रीं ईं ग्लौं श्रीं सौं ऐं हुं नमः कृष्णवाससे शतसहस्रसिंहवदने अष्टादशभुजे महाबले शतपराक्रमपूजिते अजिते अपराजिते देवि प्रत्यंगिरे परसैन्य परकर्म विध्वंसिनि परमंत्रच्छेदिनी परयंत्रपरतंत्रोच्चाटनि परविद्याग्रासकरे सर्वभूतदमनि क्षं ग्लौं सौं ईं ह्रीं क्रीं क्रां एह्येहि प्रत्यंगिरे चिदचिद्रूपे सर्वोपद्रवेभ्यः सर्वग्रहदोषेभ्यः सर्वरोगेभ्यः प्रत्यंगिरे मां रक्ष रक्ष ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः ग्लां ग्लीं ग्लूं ग्लैं ग्लौं ग्लः प्रत्यंगिरे परब्रह्ममहिषि परमकारुणिके एहि मम शरीरे आवेशय आवेशय मम हृदये स्फुर स्फुर ममांसे प्रस्फुर प्रस्फुर सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय स्तंभय जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं विनाशय विनाशय प्रत्यंगिरे महाकुंडलिनि चंद्रकळावतंसिनि भेताळवाहने प्रत्यंगिरे कपालमालाधारिणि त्रिशूल वज्रांकुश बाण बाणासन पाणिपात्रपूरितं मम शत्रु शोणितं पिब पिब मम शत्रु मांसं खादय खादय मम शत्रून् ताडय ताडय मम वैरिजनान् दह दह मम विद्वेषकारिणः शीघ्रमेव भक्षय भक्षय श्रीप्रत्यंगिरे भक्तकारुणिके शीघ्रमेव दयां कुरु कुरु सद्यो ज्वरजाड्यमुक्तिं कुरु कुरु भेताळब्रह्मराक्षसादीन् जहि जहि मम शत्रून् ताडय ताडय प्रारब्धसंचितक्रियमानान् दह दह दूषकान् सद्यो दीर्घरोगयुक्तान् कुरु कुरु प्रत्यंगिरे प्राणशक्तिमये मम वैरिजनप्राणान् हन हन मर्दय मर्दय नाशय नाशय ॐ श्रीं ह्रीं क्रीं सौं ग्लौं प्रत्यंगिरे महामाये देवि देवि मम वांछितं कुरु कुरु मां रक्ष रक्ष प्रत्यंगिरे स्वाहा ||

अथ स्तवराज स्तोत्रम् –
मंत्रयंत्रसुखासीनं चंद्रचूडं महेश्वरम् |
सहसागत्य चरणे पार्वती परिपृच्छति ||

ईश्वर उवाच |
धारणीं परमां विद्यां प्रत्यंगिरां महोत्तमाम् |
यो जानाति स्वहस्तेन सर्वं साध्यं हि जिह्वया ||

अमृतं पिबते तस्य मृत्युर्नास्ति कदाचन |
त्रिपुरां च समायातां सेमां विद्यां च बिभ्रतीम् ||

निर्जिताश्चामराः सर्वे देवी विद्याभिमानिनी |
गोळकं संप्रवक्ष्यामि भैषज्यमिव धारणात् ||

त्रिवृतं धारयेन्मंत्रं प्रत्यंगिरः सुभाषितम् |
हरिचंदनमिश्रेण रोचनैः कुंकुमेन च ||

लिखित्वा भूर्जपत्रेण धारणीयं सदा नृपैः |
पुष्पधूपविचित्रैश्च भक्ष्यभोज्यैर्निवेदनम् ||

पूजयित्वा यथान्यायं सप्तकुंभेन वैष्णवीम् |
य इमां धारयेद्विद्यां लिखित्वा रिपुनाशिनीम् |
विलयं यांति रिपवः प्रत्यंगिरा सुधारणात् ||

अथ मंत्रपदानि भवंति –
ॐ नमः सूर्यसहस्रेक्षणाय, ॐ अनादिरूपाय, ॐ पुरुहूताय, ॐ महेश्वराय, ॐ जगच्छांतिकारिणे, ॐ शांताय, ॐ महाघोराय, ॐ अतिघोराय, ॐ प्रभव प्रभव, ॐ दर्शय दर्शय, ॐ मर्दय मर्दय, ॐ हिलि हिलि हिलि, ॐ किलि किलि किलि, ॐ ज्वल ज्वल ज्वल, ॐ ग्रस ग्रस ग्रस, ॐ पिब पिब पिब, ॐ नाशय नाशय नाशय, ॐ जनय जनय जनय, ॐ विदारय विदारय विदारय, देवि देवि मां रक्ष रक्ष रक्ष, ह्रीं देवि देवि पिशाच किन्नर किंपुरुष उरग विद्याधर रुद्र गरुड गंधर्व यक्ष राक्षस लोकपालान् स्तंभय स्तंभय स्तंभय, ये च शत्रवश्चाभिचार कर्तारस्तेषां शत्रूणां मंत्र यंत्र तंत्राणि चूर्णय चूर्णय चूर्णय, घातय घातय घातय, विश्वमूर्तिं महामूर्तिं जय जय जय, मम शत्रूणां मुखं स्तंभय स्तंभय स्तंभय, मम शत्रूणां पादं स्तंभय स्तंभय स्तंभय, मम शत्रूणां गुह्यं स्तंभय स्तंभय स्तंभय, मम शत्रूणां जिह्वां स्तंभय स्तंभय स्तंभय, मम शत्रूणां स्थानं कीलय कीलय कीलय, मम शत्रूणां ग्रामं कीलय कीलय कीलय, मम शत्रूणां देशं कीलय कीलय कीलय, ये च पाठकस्य परिवारकास्तेषां शांतिं कुरु कुरु स्वाहा ||

ॐ नमो भगवति उच्छिष्टचांडालि त्रिशूलवज्रांकुशधारिणि नररुधिरमांसभक्षिणि कपालखट्वांगधारिणि मम शत्रून् दह दह ग्रस ग्रस पिब पिब खाहि खाहि नाशय नाशय हूं फट् स्वाहा ||

ॐ ब्रह्माणि मम नेत्रे रक्ष रक्ष स्वाहा |
ॐ कौमारि मम वक्षःस्थलं रक्ष रक्ष स्वाहा |
ॐ वाराहि मम हृदयं रक्ष रक्ष स्वाहा |
ॐ इंद्राणि मम नाभिं रक्ष रक्ष स्वाहा |
ॐ चंडिके मम गुह्यं रक्ष रक्ष स्वाहा |
ॐ मेघवाहने मम ऊरुं रक्ष रक्ष स्वाहा |
ॐ चामुंडि मम जंघे रक्ष रक्ष स्वाहा |
ॐ वसुंधरे मम पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा ||

ॐ झः झः झः ॐ थः थः थः ॐ स्फ्रैं स्फ्रैं ॐ स्तंभय स्तंभय क्षोभय क्षोभय हूं फट् स्वाहा ||

शक्तिध्यानम् –
स्तंभिनीं मोहिनीं चैवोच्चाटनीं क्षोभिणीं तथा |
जृंभिणीं द्राविणीं रौद्रीं तथा संहारिणीं शुभाम् ||

शक्तयः क्रम योगेन शत्रुपक्षे नियोजिताः |
धारिताः साधकेंद्रेण सर्वशत्रुनिवारिणी ||

ॐ स्तंभिनि ष्वेग्निं ष्वेग्निं मम शत्रून् स्तंभय स्तंभय हूं फट् स्वाहा |
ॐ मोहिनि ष्वेग्निं ष्वेग्निं मम शत्रून् मोहय मोहय हूं फट् स्वाहा |
ॐ उच्चाटनि ष्वेग्निं ष्वेग्निं मम शत्रून् उच्चाटय उच्चाटय हूं फट् स्वाहा |
ॐ क्षोभिणि ष्वेग्निं ष्वेग्निं मम शत्रून् क्षोभय क्षोभय हूं फट् स्वाहा |
ॐ जृंभिणि ष्वेग्निं ष्वेग्निं मम शत्रून् जृंभय जृंभय हूं फट् स्वाहा |
ॐ द्राविणि ष्वेग्निं ष्वेग्निं मम शत्रून् द्रावय द्रावय हूं फट् स्वाहा |
ॐ रौद्रि ष्वेग्निं ष्वेग्निं मम शत्रून् संतापय संतापय हूं फट् स्वाहा |
ॐ संहारिणि ष्वेग्निं ष्वेग्निं मम शत्रून् संहारय संहारय हूं फट् स्वाहा |
ॐ सर्वसंहारकारिणि महाप्रत्यंगिरे सर्वशस्त्रोन्मूलनि स्वाहा ||

इति श्रीरुद्रयामळे श्रीशूलपाणि विरचित सर्वशक्ति श्री प्रत्यंगिरा स्तवराजः ||

अर्थ

श्री प्रत्यंगिरा स्तवराज देवी प्रत्यंगिरा के उग्र रूप "उग्रकृत्या" को समर्पित एक अत्यंत रहस्यमयी और शक्तिशाली स्तोत्र है। तंत्रशास्त्र में इसे "महाशक्ति-स्तवराज" के नाम से जाना जाता है। रुद्र यामल तंत्र से उत्पन्न यह स्तोत्र मंत्र, कवच और स्तोत्र के रूपों को समाहित करता है, जो सभी दुष्ट शक्तियों को नष्ट कर पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। साधक स्वयं को और अपने परिवार को सभी प्रकार के भय, दुष्ट शक्तियों और शत्रुओं के उत्पीड़न से बचाने के लिए इस देवी से प्रार्थना करते हैं। यह शत्रु संहार, तंत्र-मंत्र-यंत्र दोष निवारण, अघोराभिचार परिहार, दीर्घायु, धन-संपदा, स्वास्थ्य और परिवार की रक्षा के लिए पाठ किया जाता है।

यह स्तवराज आध्यात्मिक रूप से गहन अर्थ रखता है। प्रत्यंगिरा देवी न केवल बाहरी शत्रुओं से रक्षा करती हैं, बल्कि हमारे भीतर के अज्ञान, नकारात्मकता और दुर्गुणों को भी नष्ट करती हैं। उनका उग्र रूप अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना का प्रतीक है। इस स्तोत्र का पाठ साधक के मन में साहस, स्थिरता और आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह केवल सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और आंतरिक शुद्धि के लिए भी सहायक है। देवी की शक्ति बाधाओं को दूर करती है और जीवन में सफलता व समृद्धि लाती है।

स्तोत्र की संरचना अत्यंत व्यवस्थित है। इसमें करन्यास और हृदय न्यास जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं, जो शरीर के प्रत्येक भाग में मंत्र बीजों को स्थापित करके एक सुरक्षा कवच का निर्माण करती हैं। यहाँ प्रत्यंगिरा देवी का ध्यान सहस्र वदना, अष्टादश भुजा, त्रिनेत्रा, रक्ताम्बरधरा और सर्वाभरणभूषिता रूप में किया जाता है। स्तोत्र के मुख्य भाग में 'हूँ, फट्, स्तम्भय, कीलय, दह दह, पिब पिब' जैसे शक्तिशाली बीज मंत्र हैं, जो आध्यात्मिक शस्त्रों के रूप में कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्त, स्तम्भिनी, मोहिनी, उच्चाटनी, क्षोभिनी, जृम्भिणी, द्राविणी, रौद्री, संहारिणी नामक आठ प्रमुख शक्तियों (अष्टशक्ति ध्यान) को शत्रु पक्ष पर नियुक्त करके साधक सुरक्षा प्राप्त करते हैं। ये शक्तियाँ दुष्टवाक्य स्तम्भन, दुष्टकर्म विनाश और तांत्रिक प्रभावों के निवारण में सहायता करती हैं।

इस स्तवराज का नियमित पाठ साधक के जीवन में स्थिरता, शांति और समृद्धि लाता है। यह सभी दुष्ट, शत्रु, रोग, ग्रह और मंत्र-यंत्र पीड़ाओं को नष्ट करता है। यह कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है और सभी ऐश्वर्य तथा सौभाग्य प्रदान करता है। विशेष रूप से, जो लोग जीवन में लगातार शत्रुओं के कष्ट, तांत्रिक परेशानियों या अप्रत्याशित बाधाओं का सामना कर रहे हैं, उनके लिए यह स्तोत्र एक वरदान है। यह न केवल रक्षात्मक है, बल्कि आक्रामक शक्ति के रूप में भी कार्य करता है, दुष्ट शक्तियों का पूर्णतः उन्मूलन करता है।

लाभ (Benefits):

  • शत्रु संहार और रक्षा: यह स्तोत्र शत्रुओं से उत्पन्न होने वाली सभी प्रकार की पीड़ाओं को नष्ट करता है और साधक को दिव्य सुरक्षा प्रदान करता है। यह बाहरी और आंतरिक शत्रुओं का उन्मूलन करता है।
  • तांत्रिक दोष निवारण: जादू-टोना, तंत्र-मंत्र-यंत्र दोषों और अभिचारिक क्रियाओं के दुष्परिणामों को पूरी तरह से समाप्त कर सुरक्षित वातावरण बनाता है।
  • स्वास्थ्य और दीर्घायु: रोगों से मुक्ति दिलाकर, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करता है। यह शरीर और मन को मजबूत बनाता है।
  • धन और समृद्धि: आर्थिक बाधाओं को दूर कर, धन-संपदा, ऐश्वर्य और समृद्धि लाता है, जीवन में स्थिरता प्रदान करता है।
  • मानसिक शांति और साहस: भय, चिंता और अनिश्चितता को दूर कर, मन को शांति, साहस और आत्मविश्वास प्रदान करता है। यह मानसिक स्पष्टता और शक्ति को बढ़ाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री प्रत्यंगिरा स्तवराज क्या है?
यह देवी प्रत्यंगिरा के उग्र रूप, उग्रकृत्या देवी को समर्पित एक शक्तिशाली और रहस्यमयी स्तोत्र है, जिसे तंत्र शास्त्र में "स्तवराज" (स्तोत्रों का राजा) के रूप में पूजा जाता है। यह दुष्ट शक्तियों के विरुद्ध रक्षात्मक और विनाशकारी शक्तियों से युक्त है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इसका पाठ शुद्ध स्नान के बाद, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके, एक स्वच्छ और पवित्र स्थान पर करना चाहिए। इसे अक्सर विशिष्ट ग्रह संरेखणों के दौरान या गहन सुरक्षा की तलाश में किया जाता है।
इस स्तोत्र का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इसके पाठ से शत्रुओं से रक्षा, काले जादू और तांत्रिक प्रभावों का निवारण, रोगों से मुक्ति, भय से राहत और शक्ति, समृद्धि तथा समग्र कल्याण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
जो कोई भी गंभीर बाधाओं, शत्रु खतरों, काले जादू का सामना कर रहा हो, या मजबूत सुरक्षा और आध्यात्मिक शक्ति की तलाश में हो, वह इसका पाठ कर सकता है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए फायदेमंद है जिन्हें शक्तिशाली दिव्य हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
पाठ की संख्या विशिष्ट उद्देश्य और गुरु के मार्गदर्शन पर निर्भर कर सकती है। हालांकि, निरंतर लाभ के लिए नियमित दैनिक पाठ (जैसे 11, 21, या 108 बार) अक्सर अनुशंसित किया जाता है।
इस स्तोत्र का मूल या स्रोत क्या है?
श्री प्रत्यंगिरा स्तवराज प्राचीन तंत्र शास्त्र में गहराई से निहित है, विशेष रूप से रुद्र यामल तंत्र जैसे ग्रंथों में इसका उल्लेख है, जो विभिन्न उग्र देवी-देवताओं को समर्पित शक्तिशाली स्तोत्रों और अनुष्ठानों का विवरण देते हैं।

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