श्री प्रत्यंगिरा मालामंत्रः
अस्य श्री प्रत्यंगिरा मालामंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः अनुष्टुप् छंदः प्रत्यंगिरा देवता ॐ बीजं ह्रीं शक्तिः कृत्यानाशने जपे विनियोगः |
करन्यासः –
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः |
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः |
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः |
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः |
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |
हृदयादिन्यासः –
ॐ ह्रां हृदयाय नमः |
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा |
ॐ ह्रूं शिखायै वषट् |
ॐ ह्रैं कवचाय हुं |
ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् |
ॐ ह्रः अस्त्राय फट् |
ध्यानं –
सिंहारुढाऽतिकृष्णा त्रिभुवनभयकृद्रूपमुग्रं वहंती
ज्वालावक्त्रावसाना नववसनयुगं नीलमण्याभकांतिः |
शूलं खड्गं वहंती निजकरयुगळे भक्तरक्षैकदक्षा
सेयं प्रत्यंगिरा संक्षपयतुरिपुभिर्मंत्रितं वोऽभिचारं ||
मालामंत्रः –
ॐ ह्रीं नमः कृष्णवाससे शतसहस्रहिंसिनि सहस्रवदने महाबले अपराजिते प्रत्यंगिरे परसैन्य परकर्म विध्वंसिनि परमंत्रोत्सादिनि सर्वभूतदमनि सर्वदेवान् बंध बंध सर्वविद्याश्छिंधि छिंधि क्षोभय क्षोभय परयंत्राणि स्फोटय स्फोटय सर्वशृंखलान् त्रोटय त्रोटय ज्वलज्ज्वालाजिह्वे कराळवदने प्रत्यंगिरे ह्रीं नमः || 1 ||
ॐ नमः कृष्णांबरशोभिते सकलसेवकजनोपद्रवकारक दुष्टग्रहगजघोट संघट्टसंहारिणि अनेकसिंहकोटिचारिणि कलांतकि नमोऽस्तु ते | ॐ दुर्गे सहस्रवदने अष्टादशभुजमालाविभूषिते महाबलपराक्रमे अत्यद्भुते अपराजिते देवि प्रत्यंगिरे सर्वातिशायिनि परकर्मविध्वंसिनि भयविध्वंसिनि सर्वशत्रूच्चाटनि परयंत्र परतंत्र परमंत्र चूर्णघुटिकादि परप्रयोगकृतवशीकरण स्तंभन जृंभणादि दोषनिचयभेदिनि मारणि मोहिनी वशीकरणि स्तंभिनि जृंभिणि आकर्षिणि उच्चाटिनि अंधकारिणि सर्वदेवताग्रह योगग्रह योगिनीग्रह ब्रह्मराक्षसग्रह सिद्धग्रह यक्षग्रह गुह्यग्रह विद्याधरग्रह किन्नरग्रह गंधर्वग्रह अप्सरोग्रह भूतग्रह प्रेतग्रह पिशाचग्रह कूष्मांडग्रह पूतिनीग्रह मातृग्रह पितृग्रह भेताळग्रह राजग्रह चोरग्रह गोत्रदेवताग्रह अश्वदेवताग्रह भूदेवताग्रह आकशदेवताग्रह आधिग्रह व्याधिग्रह अपस्मारग्रह उन्मादग्रह गलग्रह कलहग्रह याम्यग्रह डामरग्रह उदकग्रह विद्याग्रह रतिग्रह छायाग्रह बालग्रह शल्यग्रह विशल्यग्रह कालग्रह सर्वदोषग्रह विद्राविणि सर्वदुष्टभक्षिणि सर्वपापानिषूदिनि सर्वयंत्रस्फोटिनि सर्वशृंखलात्रोटिनि सर्वमुद्राविदारिणि ज्वालाजिह्वे कराळवक्त्रे रौद्रमूर्ते देवी प्रत्यंगिरे महदेवि महाविद्ये महाशांतिं कुरु कुरु तुष्टिं कुरु कुरु पुष्टिं कुरु कुरु श्रियं देहि यशो देहि सर्वं देहि पुत्रान् देहि आरोग्यं देहि भुक्तिमुक्ती देहि मम परिवारं रक्ष रक्ष मम पूजा जप होम दानार्चनादिकं न्यूनमाधिकं वा संपूर्णं कुरु कुरु स्वाभिमुखीभव मां रक्ष रक्ष मम सर्वापराधान् क्षमस्व क्षमस्व || 2 ||
ॐ आं ह्रीं क्रों क्षां क्रां प्रत्यंगिरे ॐ कांतिवदने ॐ कामाक्षी ॐ भंडनमातंगि ॐ जनरंजनि ॐ महाभीषणि आत्म मंत्र तंत्र यंत्र संरक्षणि महाप्रत्यंगिरे ह्रूं कामरूपिणि काकिनि शिरखंडिके कुरु कुरु महाभैरवि डाकिनी नासिकां छेदय छेदय रक्तलोचनि भूतप्रेतपिशाचदानवांश्छिंदि छिंदि मारय मारय त्रासय त्रासय भंजय भंजय ॐ प्रत्यंगिरे सहस्रकोटिसिंहवाहने सहस्रपदे महाबलपराक्रमे पूजिते अजते अपराजिते देवि परसैन्यविध्वंसिनि परकर्मछेदिनि परविद्याभेदिनि परमंत्रान् स्फोटय स्फोटय गजमुखि व्याघ्रमुखि वराहमुखि अनेकमुखार्बुदानंतसंख्याक परप्रयोगबंधछेदिनि शिरोबंधं खंडय खंडय मुखबंधं छेदय छेदय गलबंधं खंडय खंडय हस्तबंधं मर्दय मर्दय महद्बंधं मधनय मधनय बाहुबंधं भंजय भंजय पार्श्वबंधं भग्नय भग्नय कुक्षिबंधं कृंतय कृंतय कटिबंधं कार्शय कार्शय जानुबंधं जंभय जंभय पादबंधं भंजय भंजय ॐ नमो भगवति प्रत्यंगिरे भद्रकृत्ये मम शिरो ललाट कर्ण भ्रू नासिका चक्षुर्वदनाधर गल हस्त बाहु शाखांगुल्यवयवोदरांबरबंधान् छेदय छेदय परप्रयोगसर्व प्रतिबंधकान् खंडय खंडय परप्रयोग मंत्र तंत्र यंत्रात्मक सर्वप्रयोगान् मारय मारय छेदय छेदय त्रासय त्रासय अमरप्रयोगान् मारय मारय नरप्रयोगान् नाशय नाशय बंधय बंधय भ्रामय भ्रामय ह्रीं ह्रीं ह्रीं ठां ठां ठां द्रां द्रां द्रां फट् स्वाहा || 3 ||
ॐ प्रत्यंगिरे कृत्ये तव साधकस्य सर्वशत्रून् दाराय दारय हन हन मथ मथ पच पच धम धम सर्वदुष्टान् ग्रस ग्रस पिब पिब ॐ टं टं हुं हुं दंष्ट्राकराळिके मया कृत मंत्र तंत्र रक्षणं कुरु कुरु परकृत मंत्र तंत्र यंत्र विषं निर्विषं कुरु कुरु शस्त्रास्त्राद्यभिचारिकसर्वोपद्रवादिकं येन कृतं कारितं कारयितं कुरुते कारयते करिष्यति कारयिष्यति च तान् सर्वान् हन हन प्रत्यंगिरे कृत्ये त्वं रक्ष रक्ष तव साधकं मां सपरिवारकं रक्ष रक्ष स्वाहा || 4 ||
ॐ ह्रीं खें फ्रें भक्ष ज्वालाजिह्वे कराळवदने कालरात्रि प्रत्यंगिरे क्षों क्षौं ह्रीं नमस्तुभ्यं हन हन मां रक्ष रक्ष मम शत्रून् भक्षय भक्षय हुं फट् स्वाहा || 5 ||
ॐ आं ह्रीं क्रों कृष्णवाससे शतसहस्रसिंहवदने महाभैरवि ज्वलज्वल ज्वालाजिह्वे कराळवदने प्रत्यंगिरे ह्रीं क्ष्रौं ॐ नमो नारायणाय ॐ घृणिः सूर्य आदित्यों सहस्रार हुं फट् स्वाहा || 6 ||
ॐ ॐ ओं ॐ ओं कुं कुं कुं मां सां खां चां लां क्षां ॐ ह्रीं ह्रीं ॐ ओं ह्रीं वां धां मां सां रक्षां कुरु | ॐ ह्रीं ह्रीं ॐ सः हुं ॐ क्षौं वां लां धां मां सां रक्षां कुरु | ॐ ओं हुं प्लुं रक्षां कुरु | ॐ नमो विपरीत प्रत्यंगिरायै विद्याराज्ञि त्रैलोक्यवशंकरि सर्वपीडापहारिणी सर्वापन्नाशिनी सर्वमंगळ्यमांगळ्ये शिवे सर्वार्थसाधिनी मोदिनी सर्वशस्त्राणां भेदिनी क्षोभिणि तथा परमंत्र तंत्र यंत्र विषचूर्ण सर्वप्रयोगादीनन्येषां निवर्तयित्वा यत्कृतं तन्मेऽस्तु कपालिनी सर्वहिंसा मा कारयति अनुमोदयति मनसा वाचा कर्मणा ये देवासुर राक्षसाः तिर्यग्योनि सर्वहिंसका विरूपकं कुर्वंति मम मंत्र तंत्र यंत्र विषचूर्ण सर्वप्रयोगादीन् आत्महस्तेन यः करोति करिष्यति कारयिष्यति तान् सर्वान् येषां निवर्तयित्वा पातय कारय मस्तके स्वाहा || 7 ||
अयुतं प्रजपेन्मंत्रं सहस्रं तिलराजिकाः |
हुत्वा सिद्धमनुर्मंत्री प्रयोगेषु शतं जपेत् ||
ग्रहभूतादिकाविष्टं सिंचेन्मंत्रं जपन् जलैः |
विनाशयेत्परकृतं यंत्रमंत्रादि साधनं ||
इति श्री प्रत्यंगिरा मालामंत्रः ||
अर्थ
श्री प्रत्यंगिरा माला मंत्र, देवी प्रत्यंगिरा (जो भद्रकाली / उग्रकृत्या के रूप में भी जानी जाती हैं) को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और सुरक्षात्मक मंत्र है। यह शत्रु बाधाओं, तांत्रिक प्रयोगों (मंत्र-यंत्र), गुप्त शत्रुता और अन्य नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करने का एक अचूक साधन है। ब्रह्मा ऋषि, अनुष्टुप् छंद और प्रत्यंगिरा देवता के साथ, यह माला मंत्र 'ओम' बीज और 'ह्रीं' शक्ति के साथ कृत्यानाशन (दुष्ट प्रभावों का विनाश) के लिए विनियोजित है। यह केवल एक सुरक्षा कवच नहीं, बल्कि भक्तों को पूर्ण अभय प्रदान करने वाला एक दिव्य अस्त्र है।
इस माला मंत्र की शक्ति इसके बीजाक्षरों और न्यास विधि में निहित है। 'ह्रां', 'ह्रीं', 'ह्रूं' जैसे बीज अक्षरों को करन्यास (उंगलियों पर) और हृदयादि न्यास (हृदय तथा शरीर के अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं पर) के माध्यम से स्थापित किया जाता है। ये न्यास शरीर के चारों ओर एक अभेद्य कवच का निर्माण करते हैं, जो बाहरी नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव को रोकते हैं। ये बीज मंत्र देवी की सूक्ष्म ऊर्जाओं का आह्वान करते हैं, जिससे साधक की आंतरिक और बाहरी शुद्धि होती है।
मंत्र में प्रयुक्त क्रियात्मक शब्द जैसे 'स्तंभय' (स्थिर करना), 'खंडय' (विखंडित करना), 'छेदय' (काटना), 'स्फोटय' (विस्फोट करना) शत्रु के दुष्ट प्रयोगों और तांत्रिक हमलों को पूर्णतः निष्क्रिय करने की क्षमता दर्शाते हैं। यह मंत्र केवल रक्षा ही नहीं, बल्कि आक्रामक रूप से नकारात्मक शक्तियों का नाश करने की भी शक्ति रखता है। ध्यान श्लोक देवी के उग्र रूप का वर्णन करता है: सिंह पर आरूढ़, श्यामवर्णी, भयावह रूप वाली, ज्वालामुख सदृश मुख वाली, शूल और खड्ग धारण करने वाली, भक्तों की रक्षा में निपुण। इस रूप का ध्यान मंत्र में और अधिक शक्ति भरता है और साधक को भयमुक्त करता है।
इस मंत्र का नियमित जप अज्ञात भय, बुरी नज़र, जादू-टोना, शत्रुओं की चालों और मानसिक कष्टों से मुक्ति प्रदान करता है। यह घर में शांति, सुख और सकारात्मक वातावरण का निर्माण करता है। यह केवल बाहरी सुरक्षा ही नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि और आध्यात्मिक प्रगति में भी सहायक है। गुरु के मार्गदर्शन में इस मंत्र का जप करना सर्वोत्तम परिणाम देता है, क्योंकि यह अत्यंत शक्तिशाली है और इसे सावधानी व श्रद्धा के साथ जपना चाहिए।
लाभ (Benefits):
- शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा: यह मंत्र शत्रुओं द्वारा उत्पन्न बाधाओं, जादू-टोना, बुरी नज़र और सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं से साधक की रक्षा करता है।
- तांत्रिक प्रयोगों का विनाश: दूसरों द्वारा किए गए बुरे प्रयोगों, यंत्र-मंत्र के दुष्प्रभावों को निष्क्रिय करता है और उन्हें नष्ट करता है।
- स्वास्थ्य और समृद्धि में वृद्धि: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करता है, साथ ही धन और समृद्धि लाता है।
- परिवार की रक्षा और शांति: परिवार के सदस्यों को सभी आपदाओं से बचाता है और घर में शांति व सद्भाव बनाए रखता है।
- भय निवारण और आत्मविश्वास: अज्ञात भयों को दूर करता है और साधक में साहस व आत्मविश्वास की वृद्धि करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री प्रत्यंगिरा माला मंत्र क्या है?
इस मंत्र का जप कब और कैसे करना चाहिए?
श्री प्रत्यंगिरा माला मंत्र के जप से क्या लाभ मिलते हैं?
इस मंत्र का जप कौन कर सकता है?
इस मंत्र का कितनी बार जप करना चाहिए?
इस मंत्र का उद्गम क्या है?
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