श्री प्रत्यंगिरा दंडकं
ॐ नमः प्रत्यंगिरायै||
प्रार्थना –
निवसति करवीरे सर्वदा या श्मशाने
विनतजनहिताय प्रेतरूढे महेशि |
हिमकर हिमशुभ्रां पंचवक्त्रां त्वमाद्यां
दिशतु दशभुजाया सा श्रियं सिद्धिलक्ष्मीः||
दंडकम् –
ऐं ख्फ्रेम् | जय जय जगदंब प्रणत हरिहरहिरण्यगर्भ प्रमुख सुरमुकुट मंदारमाला परिमलदतिपटल वाचाल चरण पुंडरीकेषु पुंडरीकाक्ष प्रमुख कर कंबु विमल मंदाकिनी शरदेंदु कुंदारविंदसंदोह सुंदरशरीरप्रभे | जय जय महाकाळि कालनाशिनि समयचक्रे मेलापकाशिनि सिद्धिगणयोगिनी वीरविद्याधरी जननिकर मुनिकुरुंबिनी तुंबिनी कदंब किन्नरवाराध्यमाने कराळो विधाने सिद्धिलक्ष्मीप्रदे विरूपाक्षचक्षुसंवासे आनंदरसदायिके त्रिभुवननायिके स्फुरदनर्घमणि मुक्तबलीकलापमध्यस्थिता चक्षुत्रवाभरण झणझणायमान तरुवल्लरीवहल प्रभा पटल पालीकृत सकल दिङ्मंडल गंडस्थलोल्लसित रविशशिकुंडले पीत कठिन कुच कलश युगळांतनुवालकुलित नर मुंडावली मंडिते, चंडि रुधिरपानप्रमत्ते प्रेतकलोत्ताल वेताल करतालिका ताडन तांडव प्रमुखा नट डाकिनी चक्र चंक्रमण चकितविताय चमत्कार विस्फुरित पिशाच प्रलय चित्कार ध्वनि मुखरकनवीर श्मशानाधिनिवासिनी रुद्रस्कंधाधिरुढे, षडाधारमध्यारविंद मंदिरोदरांकुचोन्नत प्रसूतजगाममनायमानकुल कुंडलिनी शक्तिप्रभा प्रदीपिका सखमनासवलेरिगमदाकाश शशिमंडलामृतधारा पयोनिधिगमन मानसैरुदित हसैरखिल साधकैरविभाव्यते मातृकाचक्र संभाविते मृगांक कुंकुमागुरु मृगमदांगराग परिमलवासितावास मणिमंडपे खंडेंदु मंडितोरुजटाकलापकलित करवीरोदार करहार कनक केतकी नवमालिका तालिका मदयंतिका माधवी विविध गंधबंधुर गंधवाह वहदरुणसवनाचले ध्यानाकार चकित त्रिनयनाचले ॐ जय जय जगज्जननि जय जय ||1||
ख्फ्रें ऐम् | जय जय नवाक्षरी नवत्यधिकशताक्षर मंत्रमालाधिदैवते काळि कात्यायनि कपालिनि नररुधिरवशापिशित परिपूर्ण कपाल करवाल त्रिशूल खट्वांग घंटा मुंड पाशांकुश वराऽभय शोभितकरे सुकरे बद्धवीरासने सिद्धेश्वरि सिद्धविद्याधरोरगेंद्रका ध्यायमानांघ्रि लयेशांभवावेश विभवे देवदेवि महादेवि अनाख्ये उमाख्ये सदापूर्णिमारख्ये लसत्तारकाख्ये अकाराक्षरदोस्फुरदंबराकारे महाव्योम्नि व्योमवामेश्वरी कुंडिके खेचरी गोचरी दिक्चरि शांबरी शक्ति चक्र क्रियेच्छाज्ञानरुप गुणातीत नित्यामृते नित्यभोगप्रदे संध्यावसानसमये लास्यविलासे टटमहानट जटाजूटापगारि रसदलंकार सकलकाव्यकलाकलाप वहलधी त्रिगुण प्रबंध विविधबंधु सुंदर कविता सिद्धिदे ऋद्धिदे बुद्धिदे ज्ञानदे मानदे शारदे षोडशाक्षराधिरूढ सकलसिद्धि चतुर्वर्गफलविधायिनि प्रणतजनहितकारिणि
जय जय जगदंब प्रत्यंगिरे ख्फ्रें ऐं ओम् ||2||
मम सकलदुरितानपनुद अपनुद जय जय प्रत्यंगिरे जय जय जय हे ऐं ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ख्फ्रें ओम् ||3||
इति श्री प्रत्यंगिरा दंडकम् |
अर्थ
श्री प्रत्यंगिरा दंडकं देवी प्रत्यंगिरा (भद्रकाली का एक उग्र रूप) को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और युद्ध शैली का स्तोत्र है। दंडक छंद में रचित यह स्तोत्र, देवी की भयंकर सुरक्षात्मक ऊर्जाओं का आह्वान करता है। यह दुश्मनों का नाश करने, काले जादू और दुर्भावनापूर्ण तांत्रिक हमलों को दूर करने, तथा एक मजबूत आध्यात्मिक कवच प्रदान करने के लिए शक्तिशाली बीज-मंत्रों (जैसे 'ख्फ्रेम् ऐम्...') और तीव्र बिंबों (तलवार, गदा, पाश) का उपयोग करता है। यह भक्तों को अभेद्य सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया है।
यह दंडकं केवल बाहरी शत्रुओं के विनाश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह साधक के भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे आंतरिक शत्रुओं को भी नष्ट करता है, जिससे आध्यात्मिक उत्थान होता है। देवी का उग्र स्वरूप अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। ऐसी मान्यता है कि प्रत्यंगिरा देवी का प्राकट्य अंगिरस और प्रतीरस ऋषियों की तपस्या के फल स्वरूप हुआ था, इसीलिए उन्हें प्रत्यंगिरा कहा जाता है। वे पापों का नाश कर धर्म की स्थापना करती हैं और अपने भक्तों को समृद्धि तथा विजय प्रदान करती हैं।
स्तोत्र 'ॐ नमः प्रत्यंगिरायै' के प्रारंभिक प्रणाम के साथ शुरू होता है, जो देवी का आह्वान करता है। इसमें 'ख्फ्रेम् ऐम्' जैसे प्रमुख और शक्तिशाली बीज-मंत्र शामिल हैं, जो देवी की शक्ति को सीधे आकर्षित करने में सहायक होते हैं। दंडक की शैली में पुनरावृत्ति और एक लय है, जो पाठ करने वाले में एक प्रकार की युद्ध जैसी ऊर्जा और दृढ़ता भर देती है। स्तोत्र में देवी के ध्यान रूप, उनके आभूषणों, आयुधों और उनके सुरक्षात्मक कवच का विस्तृत वर्णन है। इसमें शरीर के विभिन्न अंगों के लिए सुरक्षा प्रदान करने वाले मंत्र भी शामिल हैं।
इस दंडकं का पाठ करने से पहले शुद्धि, ध्यान (देवी के स्वरूप का मन में ध्यान करना), और न्यास (मंत्र ऊर्जाओं को शरीर के विभिन्न अंगों पर स्थापित करना) जैसी प्रारंभिक अनुष्ठानिक क्रियाओं का पालन करना चाहिए। देवी को पुष्पांजलि, दीप, धूप आदि पंचोपचार पूजा अर्पित करना श्रेष्ठ माना जाता है। बीज मंत्रों के सही उच्चारण के लिए गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है। नियमित रूप से भक्ति और श्रद्धा के साथ पाठ करने से देवी की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सकारात्मक बदलावों का अनुभव होता है।
लाभ (Benefits):
- शत्रु संहार: बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार के शत्रुओं से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है, विरोधियों के कुचक्रों को विफल करता है।
- बुरी शक्तियों का निवारण: तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, नकारात्मक ऊर्जाओं और पिशाचों के प्रभाव से मुक्ति दिलाता है।
- भय निवारण: मानसिक भय, चिंता और असुरक्षा की भावनाओं को दूर कर, भक्तों में अपार साहस और आत्म-विश्वास प्रदान करता है।
- स्वास्थ्य और समृद्धि: गंभीर रोगों से रक्षा कर उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है और जीवन में समृद्धि तथा ऐश्वर्य लाता है।
- आध्यात्मिक शक्ति: साधकों को आध्यात्मिक प्रगति, मानसिक शांति और आत्म-विश्वास में वृद्धि कर, मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री प्रत्यंगिरा दंडकं क्या है?
इस दंडकं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री प्रत्यंगिरा दंडकं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
श्री प्रत्यंगिरा दंडकं का पाठ कौन कर सकता है?
इस दंडकं का पाठ कितनी बार करना उचित है?
श्री प्रत्यंगिरा दंडकं का उद्भव या स्रोत क्या है?
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