न

श्री नवनारसिंह मंगळश्लोकाः

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रनरसिंह स्वामी
0 व्यूज़

श्री नवनारसिंह मंगळश्लोकाः

श्रीपरांकुशयोगींद्र शठारिप्रमुखान् गुरून् |
मंगळाशासनपरान् महिताननिशं भजे ||

जगज्जन्मादिलीलाय जगदानंदहेतवे |
जगच्चक्षुर्निवासाय श्रीनृसिंहाय मंगळं ||
नवनारसिंह मूर्तयः –
ज्वालाऽहोबल मालोल क्रोड कारंज भार्गवाः |
योगानंद च्छत्रवट पावना नवमूर्तयः ||

1। ज्वाला नरसिंह –
हिरण्यस्तंभसंभूति प्रख्यात परमात्मने |
प्रह्लादार्तिमुषे ज्वालानरसिंहाय मंगळं || 1 ||

2। अहोबल नरसिंह –
श्रीशठारियतींद्रादि योगिहृत्पद्मभानवे |
सर्वत्र परिपूर्णायाऽहोबिलेशाय मंगळं || 2 ||

3। मालोल नरसिंह –
वारिजावारितभयैर्वाणीपतिमुखैः सुरैः |
महिताय महोदार मालोलायाऽस्तु मंगळं || 3 ||

4। क्रोड नरसिंह –
वराहकुंडे मेदिन्यै वाराहार्थप्रदायिने |

दंतलग्न हिरण्याक्ष दंष्ट्रसिंहाय मंगळं || 4 ||

5। कारंज नरसिंह –
गोभूहिरण्यनिर्विण्णगोभिलज्ञानदायिने |
प्रभंजन शुनासीर कारंजायाऽस्तु मंगळं || 5 ||

6। भार्गव नरसिंह –
भार्गवाख्य तपस्वीश भावनाभावितात्मने |
अक्षय्यतीर्थतीरस्थ भार्गवायाऽस्तु मंगळं || 6 ||

7। योगानंद नरसिंह –
चतुराननचेतोऽब्जचित्रभानुस्वरूपिणे |
वेदाद्रिगह्वरस्थाय योगानंदाय मंगळं || 7 ||

8। छत्रवट नरसिंह –
हाहाहूह्वाख्यगंधर्वनृत्तगीतहृतात्मने |
भवहंतृ तटच्छत्र वटसिंहाय मंगळं || 8 ||

9। पावन नरसिंह –
भारद्वाज महायोगि महापातकहारिणे |
तापनीयरहस्यार्थ पावनायाऽस्तु मंगळं || 9 ||

मंगळाशासनमिदं मानिवास मुनीरितं |
महनीयं पठन् शृण्वन् मंगळायतनं भवेत् ||

इति श्री नवनारसिंह मंगळश्लोकाः |

अर्थ

श्री नवनारसिंह मंगळश्लोकाः श्री परांकुश योगीन्द्र द्वारा रचित एक पवित्र स्तोत्र है, जो अहोबिलम में विराजमान भगवान नरसिंह के नौ दिव्य रूपों (नवनारसिंह) की स्तुति करता है। प्रत्येक रूप भक्तों को विशिष्ट आशीर्वाद, सुरक्षा, ज्ञान और पापों से मुक्ति प्रदान करने वाले दैवीय गुणों का प्रतिनिधित्व करता है। ये मंगल श्लोक भगवान के कल्याणकारी गुणों का गुणगान करते हैं और पढ़ने तथा सुनने वालों के लिए शुभता लाते हैं। यह स्तोत्र महान आचार्यों, यतियों और नरसिंह भक्तों को नमन करके शुरू होता है, जो आध्यात्मिक परंपरा के प्रति सम्मान दर्शाता है।

यह स्तोत्र भगवान नरसिंह की अनंत करुणा और शक्ति को उजागर करता है। नरसिंह केवल हिरण्यकशिपु का वध करने वाले उग्र रूप ही नहीं, बल्कि भक्तों के कष्टों को दूर करने वाले, उन्हें ज्ञान, शांति और मोक्ष प्रदान करने वाले करुणामयी देवता भी हैं। इन श्लोकों का मुख्य उद्देश्य उस परब्रह्म को मंगलमय कहना है जो जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय के कर्ता हैं और जो समस्त लोकों को आनंद प्रदान करते हैं। 'जगत् के सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता, जगत् को आनंद देने वाले भगवान नरसिंह को मंगल हो' - यह प्रार्थना उनकी सर्वोच्चता को दर्शाती है।

नवनारसिंह रूपों की स्तुतियाँ इस प्रकार हैं:

  • ज्वाला नरसिंह: हिरण्यकशिपु का संहार करने के लिए स्तंभ से प्रकट हुए अग्नि ज्वालाओं के रूप। प्रह्लाद के कष्टों को दूर करने वाले परमात्मा — उस ज्वाला नरसिंह को मंगल हो।
  • अहोबिल नरसिंह: अहोबिलम में विराजमान यह रूप भक्तों के हृदय में सूर्य के समान चमकता है। योगियों के हृदय में साक्षात्कार होने वाले परमपूर्ण स्वरूप — उस अहोबिलश्वर को मंगल हो।
  • मालोल नरसिंह: देवी लक्ष्मी द्वारा आलिंगित, सभी देवताओं द्वारा पूजित सौम्य स्वरूप। भय को दूर करने वाले और करुणा प्रदान करने वाले मालोल नरसिंह को मंगल हो।
  • क्रोड नरसिंह: वराह रूप में पृथ्वी की रक्षा करने वाले, अपने दाँतों से हिरण्याक्ष का संहार करने वाले दंष्ट्रसिंह। वराह कुंड में विराजमान इस क्रोड नरसिंह को मंगल हो।
  • कारंज नरसिंह: ज्ञान प्रदान करने वाले, ब्रह्मज्ञान देने वाले और पृथ्वी तथा गौमाता के रक्षक। वायुदेव (प्रभंजन) की सन्निधि में स्थित कारंज नरसिंह को मंगल हो।
  • भार्गव नरसिंह: परशुराम महर्षि द्वारा यज्ञ किए गए स्थान पर प्रकट हुए तपस्वी रूप। अक्षय तीर्थ के तट पर भक्तों को करुणा और कृपा प्रदान करते हैं — उस भार्गव नरसिंह को मंगल हो।
  • योगानंद नरसिंह: चतुर्मुख ब्रह्मादेव द्वारा ध्याए गए, वेदाद्रि की गुफाओं में योगानंद स्वरूप में निवास करने वाले नरसिंह। योग के माध्यम से आनंद प्रदान करते हैं — उस योगानंद नरसिंह को मंगल हो।
  • छत्रवट नरसिंह: देव-गंधर्वों द्वारा नृत्य-गान किए जाने वाले क्षेत्र में विराजमान, संसार के भय को दूर करने वाले देवता। भवबंधन से मुक्ति प्रदान करने वाले छत्रवट नरसिंह को मंगल हो।
  • पावन नरसिंह: भारद्वाज महर्षि द्वारा पूजित, महापापों का नाश करने वाले और उपनिषदों का सार सिखाने वाले शुद्धिकरण का रूप। पावन नरसिंह को मंगल हो।

मणिवास ऋषि द्वारा प्रकट किया गया यह पवित्र स्तोत्र जहाँ भी पढ़ा या सुना जाता है, वहाँ शुभता लाता है। यह हृदय को शांति और भक्ति के मंदिर में बदल देता है, भक्तों के लिए अंतिम मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

लाभ (Benefits):

  • समस्त पापों का निवारण: नवनारसिंह के स्मरण से बड़े से बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं और मन शुद्ध होता है, जिससे आंतरिक शांति प्राप्त होती है।
  • शत्रु भय से मुक्ति: भगवान नरसिंह का उग्र रूप सभी शत्रुओं, अनिष्टों और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे भयमुक्त जीवन मिलता है।
  • ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति: कारंज नरसिंह और योगानंद नरसिंह के अनुग्रह से ज्ञान में वृद्धि होती है, आध्यात्मिक प्रगति संभव होती है और विवेक जागृत होता है।
  • स्वास्थ्य और समृद्धि: नरसिंह की कृपा से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है, समृद्धि और धन-संपदा में वृद्धि होती है, जिससे जीवन सुखमय बनता है।
  • मोक्ष की प्राप्ति: संसार के बंधनों से मुक्ति मिलती है और शांति तथा परमानंद की प्राप्ति में सहायक होता है, अंततः भगवान के सामीप्य की ओर अग्रसर करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री नवनारसिंह मंगळश्लोकाः क्या हैं?
यह श्री परांकुश योगीन्द्र द्वारा रचित पवित्र स्तोत्र हैं, जो अहोबिलम में विराजमान भगवान नरसिंह के नौ दिव्य रूपों (नवनारसिंह) की स्तुति करते हैं। प्रत्येक श्लोक नरसिंह के विशिष्ट रूप के महत्व और उनके आशीर्वाद का वर्णन करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी शुभ दिन या प्रतिदिन भक्तिभाव से किया जा सकता है। विशेष रूप से नरसिंह जयंती, शनिवार या संकट के समय इसका पाठ अत्यधिक फलदायी होता है। स्वच्छ मन से, भगवान के चित्र के सामने बैठकर पाठ करना उत्तम है।
श्री नवनारसिंह मंगळश्लोकाः के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से समस्त पापों का निवारण होता है, शत्रु भय दूर होता है, ज्ञान और बुद्धि की वृद्धि होती है, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होती है, और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह मन को शांति और सुकून प्रदान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान नरसिंह में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से जो संकट में हैं, सुरक्षा चाहते हैं, ज्ञान की तलाश में हैं, और आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा रखते हैं, वे इसका पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कम से कम एक बार किया जा सकता है। अधिक फल के लिए, प्रतिदिन 11, 21, 51 या 108 बार पाठ किया जा सकता है। भक्ति और श्रद्धा संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है।
इस स्तोत्र का मूल या रचयिता कौन हैं?
इन श्री नवनारसिंह मंगळश्लोकाः की रचना श्री परांकुश योगीन्द्र ने की है। यह माना जाता है कि मणिवास ऋषि द्वारा इस पवित्र स्तोत्र को प्रकट किया गया था।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...