श्री नरहर्यष्टकं
यद्धितं तव भक्तानामस्माकं नृहरे हरे |
तदाशु कार्यं कार्यज्ञ प्रळयार्कायुतप्रभ || 1 ||
रटत्सटोग्र भ्रुकुटीकठोरकुटिलेक्षण |
नृपंचास्य ज्वलज्ज्वालोज्ज्वलास्यारीन् हरे हर || 2 ||
उन्नद्धकर्णविन्यास विवृतानन भीषण |
गतदूषण मे शत्रून् हरे नरहरे हर || 3 ||
हरे शिखिशिखोद्भास्वदुरः क्रूरनखोत्कर |
अरीन् संहर दंष्ट्रोग्रस्फुरज्जिह्व नृसिंह मे || 4 ||
जठरस्थ जगज्जाल करकोट्युद्यतायुध |
कटिकल्पतटित्कल्पवसनारीन् हरे हर || 5 ||
रक्षोध्यक्षबृहद्वक्षोरूक्षकुक्षिविदारण |
नरहर्यक्ष मे शत्रुपक्षकक्षं हरे दह || 6 ||
विधिमारुतशर्वेंद्रपूर्वगीर्वाणपुंगवैः |
सदा नतांघ्रिद्वंद्वारीन् नरसिंह हरे हर || 7 ||
भयंकरोर्वलंकार वरहुंकारगर्जित |
हरे नरहरे शत्रून् मम संहर संहर || 8 ||
वादिराजयतिप्रोक्तं नरहर्यष्टकं नवं |
पठन्नृसिंहकृपया रिपून् संहरति क्षणात् || 9 ||
इति श्रीमद्वादिराज पूज्यचरण विरचितं श्री नरहर्यष्टकं |
अर्थ
श्री नरहर्यष्टकम् स्तोत्र की रचना श्री वदिराज तीर्थ स्वामीजी ने की है। यह भगवान नृसिंह स्वामी को 'नरहरि' के रूप में संबोधित करते हुए एक पराक्रमी स्तुति है, जो भक्तों की रक्षा, शत्रुओं के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए भगवान की करुणा का आह्वान करती है। यह अष्टक केवल बाहरी शत्रुओं को ही नहीं, बल्कि भय, द्वेष और अहंकार जैसे आंतरिक शत्रुओं को भी नष्ट करने की शक्ति रखता है। यह भगवान नृसिंह के अद्वितीय पराक्रम और भक्तों के प्रति उनके असीम प्रेम को उजागर करता है।
इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक भगवान नृसिंह के उग्र रूप के माध्यम से भी भक्तों के प्रति उनकी असीम करुणा को दर्शाता है। 'हरे नरहरे' का आह्वान भक्त के अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण को प्रतिध्वनित करता है। यह इस दृढ़ विश्वास पर आधारित है कि भगवान अपने भक्तों की पुकार पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं और क्षण भर में उनके दुखों को दूर करते हैं। यह पाठ भक्तों को साहस, आत्मविश्वास और जीवन की बाधाओं का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है।
पहले श्लोक में, 'हे नृहरे, हरे!' कहकर भगवान से प्रार्थना की जाती है कि वे भक्तों के लिए जो कुछ भी शुभ है, उसे तुरंत करें, क्योंकि वे सर्वज्ञ और प्रलयकाल के सूर्य के समान तेजस्वी हैं। दूसरा श्लोक भगवान की भयंकर भौंहों, अग्नि-समान नेत्रों और प्रज्वलित मुख का वर्णन करता है, और दुष्टों का संहार करने की प्रार्थना करता है। तीसरे और चौथे श्लोक में, उठे हुए कान, विस्तृत मुख, क्रूर नाखूनों और प्रज्वलित दाँतों वाले नृसिंह रूप से शत्रुओं को नष्ट करने का आग्रह किया जाता है। पाँचवाँ श्लोक ब्रह्मांड को अपने उदर में धारण करने वाले परमेश्वर की स्तुति करता है और वज्र-समान वक्षस्थल से शत्रुओं का संहार करने की प्रार्थना करता है।
छठा श्लोक हिरण्यकशिपु के वक्षस्थल को फाड़ने वाली शक्ति को याद दिलाते हुए, हमारे आंतरिक शत्रुओं - अभिमान, क्रोध और अज्ञान - को नष्ट करने की प्रार्थना करता है। सातवां श्लोक ब्रह्मा, वायु, शिव, इंद्र और अन्य देवताओं द्वारा पूजित नृसिंह देव से सभी बाधाओं को दूर करने का आग्रह करता है। अंतिम श्लोक गर्जना करने वाले धर्म के सिंह को स्तुति करता है, जिनकी गर्जना में वेद का स्वरूप है और हुंकार में धर्म की गर्जना है, और सभी दुष्ट शक्तियों का संहार करने की प्रार्थना करता है। इस प्रकार, श्री नरहर्यष्टकम् भगवान नृसिंह की शक्ति, करुणा और न्याय को प्रकट करने वाला एक अद्भुत स्तोत्र है। इसका पाठ करने से न केवल बाहरी शत्रुओं से मुक्ति मिलती है, बल्कि आंतरिक दुर्गुणों से भी छुटकारा मिलता है, जिससे जीवन में शांति, समृद्धि और विजय प्राप्त होती है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ इसका पाठ करते हैं, भगवान नृसिंह सदैव उनके रक्षक के रूप में खड़े रहते हैं।
लाभ (Benefits):
- शत्रु संहार: श्री नरहर्यष्टकम् स्तोत्र का पाठ करने से बाहरी शत्रुओं के साथ-साथ अहंकार, भय और क्रोध जैसे आंतरिक शत्रुओं से भी सुरक्षा मिलती है। यह जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने में सहायक है।
- दुःख निवारण: भगवान नृसिंह की कृपा से जीवन के सभी दुखों, कष्टों और चिंताओं का नाश होता है। यह मन को शांति और संतोष प्रदान करता है।
- साहस और आत्मविश्वास: इस स्तोत्र का नियमित पाठ भक्तों को अपार साहस और आत्मविश्वास प्रदान करता है। यह किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए मानसिक शक्ति और दृढ़ता प्रदान करता है।
- सकारात्मक ऊर्जा: यह नकारात्मक शक्तियों, बुरी नज़र और ईर्ष्या से रक्षा करता है। यह चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का वातावरण बनाता है, जिससे सौभाग्य और समृद्धि आकर्षित होती है।
- आध्यात्मिक उन्नति: भगवान नृसिंह के प्रति भक्ति बढ़ती है और आध्यात्मिक प्रगति में सहायता मिलती है। यह मोक्ष की ओर मार्गदर्शन करता है और अंतिम सत्य की समझ को बढ़ावा देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री नरहर्यष्टकम् क्या है?
श्री नरहर्यष्टकम् स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र के पाठ से क्या प्रमुख लाभ प्राप्त होते हैं?
श्री नरहर्यष्टकम् स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
श्री नरहर्यष्टकम् स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या रचयिता कौन हैं?
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