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श्री लक्ष्मीनृसिंह सहस्रनाम स्तोत्रं

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सहस्रनामनरसिंह स्वामी
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ॐ अस्य श्री लक्ष्मीनृसिंह दिव्य सहस्रनामस्तोत्रमहामंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः अनुष्टुप्छंदः श्रीलक्ष्मीनृसिंह देवता क्ष्रौं इति बीजं श्रीं इति शक्तिः नखदंष्ट्रायुधायेति कीलकं मंत्रराज श्रीलक्ष्मीनृसिंह प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः |

ध्यानं |
सत्यज्ञानसुखस्वरूपममलं क्षीराब्धिमध्यस्थितं
योगारूढमतिप्रसन्नवदनं भूषासहस्रोज्ज्वलं |
त्र्यक्षं चक्रपिनाकसाभयकरान्बिभ्राणमर्कच्छविं
छत्रीभूतफणींद्रमिंदुधवळं लक्ष्मीनृसिंहं भजे || 1

लक्ष्मी चारुकुचद्वंद्वकुंकुमांकितवक्षसे |
नमो नृसिंहनाथाय सर्वमंगळमूर्तये || 2

उपास्महे नृसिंहाख्यं ब्रह्म वेदांतगोचरं |
भूयोल्लासितसंसारच्छेदहेतुं जगद्गुरुं || 3

ब्रह्मोवाच |
ॐ नमो नारसिंहाय वज्रदंष्ट्राय वज्रिणे |
वज्रदेहाय वज्राय नमो वज्रनखाय च || 1 ||

वासुदेवाय वंद्याय वरदाय वरात्मने |
वरदाभयहस्ताय वराय वररूपिणे || 2 ||

वरेण्याय वरिष्ठाय श्रीवराय नमो नमः |
प्रह्लादवरदायैव प्रत्यक्षवरदाय च || 3 ||

परात्पराय पाराय पवित्राय पिनाकिने |
पावनाय प्रसन्नाय पाशिने पापहारिणे || 4 ||

पुरुष्टुताय पुण्याय पुरुहूताय ते नमः |
तत्पूरुषाय तथ्याय पुराणपुरुषाय च || 5 ||

पुरोधसे पूर्वजाय पुष्कराक्षाय ते नमः |
पुष्पहासाय हासाय महाहासाय शार्ङ्गिणे || 6 ||

सिंहराजाय सिंहाय जगद्वंद्याय ते नमः |
अट्टहासाय रोषाय ज्वालाहासाय ते नमः || 7 ||

भूतावासाय वासाय श्रीनिवासाय खड्गिने |
खड्गजिह्वाय सिंहाय खड्गवासाय ते नमः || 8 ||

नमो मूलाधिवासाय धर्मवासाय धर्मिणे |
धनंजयाय धन्याय नमो मृत्युंजयाय च || 9 ||

शुभंजयाय सूत्राय नमः शत्रुंजयाय च |
निरंजनाय नीराय निर्गुणाय गुणात्मने || 10 ||

निष्प्रपंचाय निर्वाणप्रदाय निबिडाय च |
निरालंबाय नीलाय निष्कळाय कळात्मने || 11 ||

निमेषाय निबंधाय निमेषगमनाय च | [** निबद्धाय **]
निर्द्वंद्वाय निराशाय निश्चयाय निजाय च || 12 ||

निर्मलाय निदानाय निर्मोहाय निराकृते |
नमो नित्याय सत्याय सत्कर्मनिरताय च || 13 ||

सत्यध्वजाय मुंजाय मुंजकेशाय केशिने |
हरिकेशाय केशाय गुडाकेशाय वै नमः || 14 ||

सुकेशायोर्ध्वकेशाय केशिसंहारकाय च |
जलेशाय स्थलेशाय पद्मेशायोग्ररूपिणे || 15 ||

पुष्पेशाय कुलेशाय केशवाय नमो नमः |
सूक्तिकर्णाय सूक्ताय रक्तजिह्वाय रागिणे || 16 ||

दीप्तरूपाय दीप्ताय प्रदीप्ताय प्रलोभिने |
प्रसन्नाय प्रबोधाय प्रभवे विभवे नमः || 17 ||

प्रभंजनाय पांथाय प्रमायप्रतिमाय च |
प्रकाशाय प्रतापाय प्रज्वलायोज्ज्वलाय च || 18 ||

ज्वालामालास्वरूपाय ज्वालजिह्वाय ज्वालिने |
महाज्वालाय कालाय कालमूर्तिधराय च || 19 ||

कालांतकाय कल्पाय कलनाय कलाय च |
कालचक्राय चक्राय षट्चक्राय च चक्रिणे || 20 ||

अक्रूराय कृतांताय विक्रमाय क्रमाय च |
कृत्तिने कृत्तिवासाय कृतघ्नाय कृतात्मने || 21 ||

संक्रमाय च क्रुद्धाय क्रांतलोकत्रयाय च |
अरूपाय सरूपाय हरये परमात्मने || 22 ||

अजयायादिदेवाय ह्यक्षयाय क्षयाय च |
अघोराय सुघोराय घोरघोरतराय च || 23 ||

नमोऽस्तु घोरवीर्याय लसद्घोराय ते नमः |
घोराध्यक्षाय दक्षाय दक्षिणार्हाय शंभवे || 24 ||

अमोघाय गुणौघाय ह्यनघायाघहारिणे |
मेघनादाय नादाय तुभ्यं मेघात्मने नमः || 25 || [** नाथाय **]

मेघवाहनरूपाय मेघश्यामाय मालिने |
व्यालयज्ञोपवीताय व्याघ्रदेहाय ते नमः || 26 ||

व्याघ्रपादाय ते व्याघ्रकर्मणे व्यापकाय च |
विकटास्याय वीर्याय विष्टरश्रवसे नमः || 27 ||

विकीर्णनखदंष्ट्राय नखदंष्ट्रायुधाय च |
विश्वक्सेनाय सेनाय विह्वलाय बलाय च || 28 ||

विरूपाक्षाय वीराय विशेषाक्षाय साक्षिणे |
वीतशोकाय वित्ताय विस्तीर्णवदनाय च || 29 ||

विधानाय विधेयाय विजयाय जयाय च |
विबुधाय विभावाय नमो विश्वंभराय च || 30 ||

वीतरागाय विप्राय विटंकनयनाय च |
विपुलाय विनीताय विश्वयोने नमो नमः || 31 ||

विडंबनाय वित्ताय विश्रुताय वियोनये |
विह्वलाय विवादाय नमो व्याहृतये नमः || 32 ||

विरासाय विकल्पाय महाकल्पाय ते नमः |
बहुकल्पाय कल्पाय कल्पातीताय शिल्पिने || 33 ||

कल्पनाय स्वरूपाय फणितल्पाय वै नमः |
तटित्प्रभाय तार्क्ष्याय तरुणाय तरस्विने || 34 ||

रसनायांतरिक्षाय तापत्रयहराय च |
तारकाय तमोघ्नाय तत्त्वाय च तपस्विने || 35 ||

तक्षकाय तनुत्राय तटिते तरलाय च |
शतरूपाय शांताय शतधाराय ते नमः || 36 ||

शतपत्राय तार्क्ष्याय स्थितये शांतमूर्तये |
शतक्रतुस्वरूपाय शाश्वताय शतात्मने || 37 ||

नमः सहस्रशिरसे सहस्रवदनाय च |
सहस्राक्षाय देवाय दिशश्रोत्राय ते नमः || 38 ||

नमः सहस्रजिह्वाय महाजिह्वाय ते नमः |
सहस्रनामधेयाय सहस्रजठराय च || 39 ||

सहस्रबाहवे तुभ्यं सहस्रचरणाय च |
सहस्रार्कप्रकाशाय सहस्रायुधधारिणे || 40 ||

नमः स्थूलाय सूक्ष्माय सुसूक्ष्माय नमो नमः |
सुक्षीणाय सुभिक्षाय सूराध्यक्षाय शौरिणे || 41 ||

धर्माध्यक्षाय धर्माय लोकाध्यक्षाय वै नमः |
प्रजाध्यक्षाय शिक्षाय विपक्षक्षयमूर्तये || 42 ||

कालाध्यक्षाय तीक्ष्णाय मूलाध्यक्षाय ते नमः |
अधोक्षजाय मित्राय सुमित्रवरुणाय च || 43 ||

शत्रुघ्नाय ह्यविघ्नाय विघ्नकोटिहराय च |
रक्षोघ्नाय मधुघ्नाय भूतघ्नाय नमो नमः || 44 ||

भूतपालाय भूताय भूतावासाय भूतिने |
भूतभेतालघाताय भूताधिपतये नमः || 45 ||

भूतग्रहविनाशाय भूतसंयमिने नमः |
महाभूताय भृगवे सर्वभूतात्मने नमः || 46 ||

सर्वारिष्टविनाशाय सर्वसंपत्कराय च |
सर्वाधाराय सर्वाय सर्वार्तिहरये नमः || 47 ||

सर्वदुःखप्रशांताय सर्वसौभाग्यदायिने |
सर्वज्ञायाप्यनंताय सर्वशक्तिधराय च || 48 ||

सर्वैश्वर्यप्रदात्रे च सर्वकार्यविधायिने |
सर्वज्वरविनाशाय सर्वरोगापहारिणे || 49 ||

सर्वाभिचारहंत्रे च सर्वोत्पातविघातिने |
पिंगाक्षायैकशृंगाय द्विशृंगाय मरीचये || 50 ||

बहुशृंगाय शृंगाय महाशृंगाय ते नमः |
मांगल्याय मनोज्ञाय मंतव्याय महात्मने || 51 ||

महादेवाय देवाय मातुलुंगधराय च |
महामायाप्रसूताय मायिने जलशायिने || 52 ||

महोदराय मंदाय मदनाय मदाय च |
मधुकैटभहंत्रे च माधवाय मुरारये || 53 ||

महावीर्याय धैर्याय चित्रवीर्याय ते नमः |
चित्रकर्माय चित्राय नमस्ते चित्रभानवे || 54 ||

मायातीताय मायाय महावीराय ते नमः |
महातेजाय बीजाय तेजोधाम्ने च बीजिने || 55 ||

तेजोमय नृसिंहाय तेजसांनिधये नमः |
महादंष्ट्राय दंष्ट्राय नमः पुष्टिकराय च || 56 ||

शिपिविष्टाय पुष्टाय तुष्टये परमेष्ठिने |
विशिष्टाय च शिष्टाय गरिष्ठायेष्टदायिने || 57 ||

नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय तुष्टायामिततेजसे |
अष्टांगन्यस्तरूपाय सर्वदुष्टांतकाय च || 58 ||

वैकुंठाय विकुंठाय केशिकंठाय कंठिने |
कंठीरवाय लुंठाय निश्शठाय हठाय च || 59 ||

सत्त्वोद्रिक्ताय कृष्णाय रजोद्रिक्ताय वेधसे |
तमोद्रिक्ताय रुद्राय ऋग्यजुस्साममूर्तये || 60 ||

ऋतुध्वजाय कालाय मंत्रराजाय मंत्रिणे | [** राजाय **]
त्रिनेत्राय त्रिवर्गाय त्रिधाम्ने च त्रिशूलिने || 61 ||

त्रिकालज्ञानरूपाय त्रिदेहाय त्रिधात्मने |
नमस्त्रिमूर्तिवंद्याय त्रितत्त्वज्ञानिने नमः || 62 ||

अक्षोभ्यायानिरुद्धाय ह्यप्रमेयाय भानवे |
अमृताय ह्यनंताय ह्यमितायामराय च || 63 ||

अपमृत्युविनाशाय ह्यपस्मारविघातिने |
अन्नदायान्नरूपाय ह्यन्नायान्नभुजे नमः || 64 ||

आद्याय निरवद्याय वेद्यायाद्भुतकर्मणे |
सद्योजाताय संध्याय वैद्युताय नमो नमः || 65 ||

विद्यातीताय शुद्धाय रागतीताय रागिणे |
योगीश्वराय योगाय गोहिताय गवांपते || 66 ||

गंधर्वाय गभीराय गर्जितायोर्जिताय च |
पर्जन्याय प्रवृद्धाय प्रधानपुरुषाय च || 67 ||

पद्माभाय सुनाभाय पद्मनाभाय भासिने |
पद्मनेत्राय पद्माय पद्मायाः पतये नमः || 68 ||

पद्मोदराय पूताय पद्मकल्पोद्भवाय च |
नमो हृत्पद्मवासाय भूपद्मोद्धरणाय च || 69 ||

शब्दब्रह्मस्वरूपाय ब्रह्मरूपधराय च |
ब्रह्मणे ब्रह्मरूपाय ब्रह्मनेत्रे नमो नमः || 70 ||

ब्रह्मादये ब्राह्मणाय ब्रह्मब्रह्मात्मने नमः |
सुब्रह्मण्याय देवाय ब्रह्मण्याय त्रिवेदिने || 71 ||

परब्रह्मस्वरूपाय पंचब्रह्मात्मने नमः |
नमस्ते ब्रह्मशिरसे तदाऽश्वशिरसे नमः || 72 ||

अथर्वशिरसे नित्यमशनिप्रमिताय च |
नमस्ते तीक्ष्णदंष्ट्राय लोलाय ललिताय च || 73 ||

लावण्याय लवित्राय नमस्ते भासकाय च | [** लावकाय **]
लक्षणज्ञाय लक्षाय लक्षणाय नमो नमः || 74 ||

रसद्वीपाय दीप्ताय विष्णवे प्रभविष्णवे |
वृष्णिमूलाय कृष्णाय श्रीमहाविष्णवे नमः || 75 || [** दृष्णिमूलाय **]

पश्यामि त्वां महासिंहं हारिणं वनमालिनं |
किरीटिनं कुंडलिनं सर्वगं सर्वतोमुखं || 76 ||

सर्वतः पाणिपादोरुं सर्वतोऽक्षि शिरोमुखं |
सर्वेश्वरं सदातुष्टं सत्त्वस्थं समरप्रियं || 77 ||

बहुयोजनविस्तीर्णं बहुयोजनमायतं |
बहुयोजनहस्तांघ्रिं बहुयोजननासिकं || 78 ||

महारूपं महावक्त्रं महादंष्ट्रं महाभुजं |
महानादं महारौद्रं महाकायं महाबलं || 79 ||

आनाभेर्ब्रह्मणोरूपामागलाद्वैष्णवं वपुः |
आशीर्षाद्रुद्रमीशानं तदग्रे सर्वतः शिवं || 80 ||

नमोऽस्तु नारायण नारसिंह
नमोऽस्तु नारायण वीरसिंह |
नमोऽस्तु नारायण क्रूरसिंह
नमोऽस्तु नारायण दिव्यसिंह || 81 ||

नमोऽस्तु नारायण व्याघ्रसिंह
नमोऽस्तु नारायण पुच्छसिंह |
नमोऽस्तु नारायण पूर्णसिंह
नमोऽस्तु नारायण रौद्रसिंह || 82 ||

नमो नमो भीषणभद्रसिंह
नमो नमो विज्ज्वलनेत्रसिंह |
नमो नमो बृंहितभूतसिंह
नमो नमो निर्मलचित्तसिंह || 83 ||

नमो नमो निर्जितकालसिंह
नमो नमः कल्पितकल्पसिंह |
नमो नमः कामदकामसिंह
नमो नमस्ते भुवनैकसिंह || 84 ||

भविष्णुस्त्वं सहिष्णुस्त्वं भ्राजिष्णुर्विष्णुरेव च |
पृथ्वीत्वमंतरिक्षस्त्वं पर्वतारण्यमेव च || 85 ||

कलाकाष्ठादिलिप्तिस्त्वं मुहूर्तप्रहरादिकं |
अहोरात्रं त्रिसंध्यं च पक्षमासस्तुवत्सरं || 86 ||

युगादिर्युगभेदस्त्वं संयोगो युगसंधयः |
नित्यं नैमित्तिकं काम्यं महाप्रलयमेव च || 87 ||

करणं कारणं कर्ता भर्ता हर्ता हरिस्स्वराट् |
सत्कर्ता सत्कृतिर्गोप्ता सच्चिदानंदविग्रहः || 88 ||

प्राणस्त्वं प्राणिनांप्रत्यगात्म त्वं सर्वदेहिनां |
सुज्योतिस्त्वं परंज्योतिरात्मज्योतिः सनातनः || 89 ||

ज्योतिर्लोकस्वरूपस्त्वं ज्योतिर्ज्ञो ज्योतिषांपतिः |
स्वाहाकारः स्वधाकारो वषट्कारः कृपाकरः || 90 ||

हंताकारो निराकारो वेदाकारश्च शंकरः |
अकारादिक्षकारांतः ओंकारो लोककारकः || 91 ||

एकात्मा त्वमनेकात्मा चतुरात्मा चतुर्भुजः |
चतुर्मूर्तिश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्वेदमयोत्तमः || 92 ||

लोकप्रियो लोकगुरुर्लोकेशो लोकनायकः |
लोकसाक्षी लोकपतिः लोकात्मा लोकलोचनः || 93 ||

लोकाधारो बृहल्लोको लोकालोकमयो विभुः |
लोककर्ता महाकर्ता कृताकर्ता कृतागमः || 94 ||

अनादिस्त्वमनंतस्त्वमभूतोभूतविग्रहः |
स्तुतिः स्तुत्यः स्तवप्रीतः स्तोता नेता नियामकः || 95 ||

त्वं गतिस्त्वं मतिर्मह्यं पिता माता गुरुस्सखा |
सुहृदश्चात्तरूपस्त्वं त्वां विना नात्र मे गतिः || 96 ||

नमस्ते मंत्ररूपाय ह्यस्त्ररूपाय ते नमः |
बहुरूपाय रूपाय पंचरूपधराय च || 97 ||

भद्ररूपाय रूढाय योगरूपाय योगिने |
समरूपाय योगाय योगपीठस्थिताय च || 98 ||

योगगम्याय सौम्याय ध्यानगम्याय ध्यायिने |
ध्येयगम्याय धाम्ने च धामाधिपतये नमः || 99 ||

धराधराय धर्माय धारणाभिरताय च |
नमो धात्रे विधात्रे च संधात्रे च धराय च || 100 ||

दामोदराय दांताय दानवांतकराय च |
नमः संसारवैद्याय भेषजाय नमोऽस्तु ते || 101 ||

सीरध्वजाय सीराय वातायाप्रमिताय च |
सारस्वताय संसारनाशनायाक्ष मालिने || 102 ||

असिचर्मधरायैव षट्कर्मनिरताय च |
विकर्माय सुकर्माय परकर्मविघातिने || 103 ||

सुकर्मणे मन्मथाय नमो मर्माय मर्मिणे |
करिचर्मवसानाय कराळवदनाय च || 104 ||

कवये पद्मगर्भाय भूगर्भाय कृपानिधे |
ब्रह्मगर्भाय गर्भाय बृहद्गर्भाय धूर्जटे || 105 ||

नमस्ते विश्वगर्भाय श्रीगर्भाय जितारये |
नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यकवचाय च || 106 ||

हिरण्यवर्णदेहाय हिरण्याक्षविनाशिने |
हिरण्यकनिहंत्रे च हिरण्यनयनाय च || 107 ||

हिरण्यरेतसे तुभ्यं हिरण्यवदनाय च |
नमो हिरण्यशृंगाय निःशृंगाय च शृंगिणे || 108 ||

भैरवाय सुकेशाय भीषणायांत्रमालिने |
चंडाय तुंडमालाय नमो दंडधराय च || 109 ||

अखंडतत्त्वरूपाय कमंडलुधराय च | [** श्रीखंड **]
नमस्ते दंडसिंहाय सत्यसिंहाय ते नमः || 110 ||

नमस्ते श्वेतसिंहाय पीतसिंहाय ते नमः |
नीलसिंहाय नीलाय रक्तसिंहाय ते नमः || 111 ||

नमो हरिद्रसिंहाय धूम्रसिंहाय ते नमः |
मूलसिंहाय मूलाय बृहत्सिंहाय ते नमः || 112 ||

पातालस्थितसिंहाय नमः पर्वतवासिने |
नमो जलस्थसिंहाय ह्यंतरिक्षस्थिताय च || 113 ||

कालाग्निरुद्रसिंहाय चंडसिंहाय ते नमः |
अनंतजिह्वसिंहाय अनंतगतये नमः || 114 ||

नमोऽस्तु वीरसिंहाय बहुसिंहस्वरूपिणे |
नमो विचित्रसिंहाय नारसिंहाय ते नमः || 115 ||

अभयंकरसिंहाय नरसिंहाय ते नमः |
सप्ताब्धिमेखलायैव सप्तसामस्वरूपिणे || 116 ||

सप्तधातुस्वरूपाय सप्तच्छंदोमयाय च |
सप्तलोकांतरस्थाय सप्तस्वरमयाय च || 117 ||

सप्तार्चीरूपदंष्ट्राय सप्ताश्वरथरूपिणे |
स्वच्छाय स्वच्छरूपाय स्वच्छंदाय नमो नमः || 118 ||

श्रीवत्साय सुवेषाय श्रुतये श्रुतमूर्तये |
शुचिश्रवाय शूराय सुभोगाय सुधन्विने || 119 ||

शुभ्राय सुरनाथाय सुलभाय शुभाय च |
सुदर्शनाय सूक्ताय निरुक्ताय नमो नमः || 120 ||

सुप्रभावस्वभावाय भवाय विभवाय च |
सुशाखाय विशाखाय सुमुखाय सुखाय च || 121 ||

सुनखाय सुदंष्ट्राय सुरथाय सुधाय च |
नमः खट्वांगहस्ताय खेटमुद्गरपाणये || 122 ||

सांख्याय सुरमुख्याय प्रख्यातप्रभवाय च |
खगेंद्राय मृगेंद्राय नगेंद्राय धृवाय च || 123 ||

नागकेयूरहाराय नागेंद्रायाघमर्दिने |
नदीवासाय नागाय नानारूपधराय च || 124 ||

नागेश्वराय नग्नाय नमितायामिताय च |
नागांतकरथायैव नरनारायणाय च || 125 ||

नमो मत्स्यस्वरूपाय कच्छपाय नमो नमः |
नमो यज्ञवराहाय श्री नृसिंहाय ते नमः || 126 ||

विक्रमाक्रांतलोकाय वामनाय महौजसे |
नमो भार्गवरामाय रावणांतकराय च || 127 ||

नमस्ते बलरामाय कंसप्रध्वंसकारिणे |
बुद्धाय बुद्धरूपाय तीक्ष्णरूपाय कल्किने || 128 ||

आत्रेयायाग्निनेत्राय कपिलाय द्विजाय च |
क्षेत्राय पशुपालाय पशुवक्त्राय ते नमः || 129 ||

गृहस्थाय वनस्थाय यतये ब्रह्मचारिणे |
स्वर्गापवर्गदात्रे च तद्भोक्त्रे च मुमुक्षवे || 130 ||

सालग्रामनिवासाय क्षीराब्धिनिलयाय च |
श्रीशैलाद्रिनिवासाय शैलवासाय ते नमः || 131 ||

योगिहृत्पद्मवासाय महाहंसाय ते नमः |
गुहावासाय गुह्याय गुप्ताय गुरवे नमः || 132 ||

नमो मूलाधिवासाय नीलवस्त्रधराय च |
पीतवस्त्रधरायैव रक्तवस्त्रधराय च || 133 ||

रक्तमालाविभूषाय रक्तगंधानुलेपिने |
धुरंधराय धूर्ताय दुर्गमाय धुराय च || 134 ||

दुर्मदाय दुरंताय दुर्धराय नमो नमः |
दुर्निरीक्ष्याय दीप्ताय दुर्दर्शाय द्रुमाय च || 135 ||

दुर्भेदाय दुराशाय दुर्लभाय नमो नमः |
दृप्ताय दीप्तवक्त्राय उधृर्ताय नमो नमः || 136 ||

उन्मत्ताय प्रमत्ताय नमो दैत्यारये नमः |
रसज्ञाय रसेशाय ह्याकर्णनयनाय च || 137 ||

वंद्याय परिवेषाय रथ्याय रसिकाय च |
ऊर्ध्वास्यायोर्ध्वदेहाय नमस्ते चोर्ध्वरेतसे || 138 ||

पद्मप्रध्वंसिकांताय शंखचक्रधराय च |
गदापद्मधरायैव पंचबाणधराय च || 139 ||

कामेश्वराय कामाय कामरूपाय कामिने |
नमः कामविहाराय कामरूपधराय च || 140 ||

सोमसूर्याग्निनेत्राय सोमपाय नमो नमः |
नमः सोमाय वामाय वामदेवाय ते नमः || 141 ||

सामस्वराय सौम्याय भक्तिगम्याय ते नमः |
कूष्मांडगणनाथाय सर्वश्रेयस्कराय च || 142 ||

भीष्माय भीकरायैव भीम विक्रमणाय च |
मृगग्रीवाय जीवाय जिताय जितकाशिने || 143 ||

जटिने जामदग्न्याय नमस्ते जातवेदसे |
जपाकुसुमवर्णाय जप्याय जपिताय च || 144 ||

जरायुजायांडजाय स्वेदजायोद्भिदाय च |
जनार्दनाय रामाय जाह्नवीजनकाय च || 145 ||

जराजन्मविदूराय प्रद्युम्नाय प्रबोधिने |
रौद्रजिह्वाय रुद्राय वीरभद्राय ते नमः || 146 ||

चिद्रूपाय समुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे |
इंद्रियायेंद्रियज्ञाय नम इंद्रानुजाय च || 147 ||

अतींद्रियाय सांद्राय इंदिरापतये नमः |
ईशानाय च हीड्याय हीप्सिताय त्विनाय च || 148 ||

व्योमात्मने च व्योम्ने च नमस्ते व्योमकेशिने |
व्योमोद्धराय च व्योमवक्त्रायासुरघातिने || 149 ||

नमस्ते व्योमदंष्ट्राय व्योमवासाय ते नमः |
सुकुमाराय माराय शिंशुमाराय ते नमः || 150 ||

विश्वाय विश्वरूपाय नमो विश्वात्मकाय च |
ज्ञानात्मकाय ज्ञानाय विश्वेशाय परात्मने || 151 ||

एकात्मने नमस्तुभ्यं नमस्ते द्वादशात्मने |
चतुर्विंशतिरूपाय पंचविंशतिमूर्तये || 152 ||

षड्विंशकात्मने नित्यं सप्तविंशतिकात्मने |
धर्मार्थकाममोक्षाय विमुक्ताय नमो नमः || 153 ||

भावशुद्धाय साध्याय सिद्धाय शरभाय च |
प्रबोधाय सुबोधाय नमो बुद्धिप्रदाय च || 154 ||

स्निग्धाय च विदग्धाय मुग्धाय मुनये नमः |
प्रियश्रवाय श्राव्याय सुश्रवाय श्रवाय च || 155 ||

ग्रहेशाय महेशाय ब्रह्मेशाय नमो नमः |
श्रीधराय सुतीर्थाय हयग्रीवाय ते नमः || 156 ||

उग्राय चोग्रवेगाय उग्रकर्मरताय च |
उग्रनेत्राय व्यग्राय समग्रगुणशालिने || 157 ||

बालग्रहविनाशाय पिशाचग्रहघातिने |
दुष्टग्रहनिहंत्रे च निग्रहानुग्रहाय च || 158 ||

वृषध्वजाय वृष्ण्याय वृषभाय वृषाय च |
उग्रश्रवाय शांताय नमः श्रुतिधराय च || 159 ||

नमस्ते देवदेवेश नमस्ते मधुसूदन |
नमस्ते पुंडरीकाक्ष नमस्ते दुरितक्षय || 160 ||

नमस्ते करुणासिंधो नमस्ते समितिंजय |
नमस्ते नारसिंहाय नमस्ते गरुडध्वज || 161 ||

यज्ञध्वज नमस्तेऽस्तु कालध्वज जयध्वज |
अग्निनेत्र नमस्तेऽस्तु नमस्ते ह्यमरप्रिय || 162 ||

सिंहनेत्र नमस्तेऽस्तु नमस्ते भक्तवत्सल |
धर्मनेत्र नमस्तेऽस्तु नमस्ते करुणाकर || 163 ||

पुण्यनेत्र नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽभीष्टदायक |
नमो नमस्ते जयसिंहरूप नमो नमस्ते नरसिंहरूप || 164 ||

नमो नमस्ते गुरुसिंहरूप नमो नमस्ते रणसिंहरूप |
नमो नमस्ते गुरुसिंहरूप नमो नमस्ते लघुसिंहरूप || 165 ||

ब्रह्म उवाच –
उद्वृत्तं गर्वितं दैत्यं निहत्याजौ सुरद्विषं |
देवकार्यं महत्कृत्वा गर्जसे स्वात्मतेजसा || 166 ||

अतिरौद्रमिदं रूपं दुस्सहं दुरतिक्रमं |
दृष्ट्वैता देवताः सर्वाः शंकितास्त्वामुपागताः || 167 ||

एतान्पश्य महेशानं ब्रह्माणं मां शचीपतिं |
दिक्पालान् द्वादशादित्यान् रुद्रानुरगराक्षसान् || 168 ||

सर्वान् ऋषिगणान्सप्तमातृर्गौरीं सरस्वतीं |
लक्ष्मीं नदीश्च तीर्थानि रतिं भूतगाणनपि || 169 ||

प्रसीद त्वं महासिंह ह्युग्रभावमिमं त्यज |
प्रकृतिस्थो भव त्वं हि शांतभावं च धारय || 170 ||

इत्युक्त्वा दंडवद्भूमौ पपात स पितामहः |
प्रसीद त्वं प्रसीद त्वं प्रसीदेति पुनः पुनः || 171 ||

मार्कंडेय उवाच-
दृष्ट्वा तु देवताः सर्वाः श्रुत्वा तां ब्रह्मणो गिरं |
स्तोत्रेणानेन संतुष्टः सौम्यभावमधारयत् || 172 ||

अब्रवीन्नारसिंहस्तान् वीक्ष्य सर्वान्सुरोत्तमान् |
संत्रस्तान् भयसंविग्नान् शरणं समुपागतान् || 173 ||

श्रीनृसिंह उवाच-
भो भो देवगणाः सर्वे पितामहपुरोगमाः |
शृणुध्वं मम वाक्यं च भवंतु विगतज्वराः || 174 ||

यद्धितं भवतां मानं तत्करिष्यामि सांप्रतं |
सुरा नामसहस्रं मे त्रिसंध्यं यः पठेत् शुचिः || 175 ||

शृणोति श्रावयति वा पूजां ते भक्तिसंयुतः |
सर्वान्कामानवाप्नोति जीवेच्च शरदां शतं || 176 ||

यो नामभिर्नृसिंहाद्यैरर्चयेत्क्रमशो मम |
सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वयज्ञेषु यत्फलं || 177 ||

सर्वपूजासु यत्प्रोक्तं तत्सर्वं लभते नरः |
जातिस्मरत्वं लभते ब्रह्मज्ञानं सनातनं || 178 ||

सर्वपापविनिर्मुक्तः तद्विष्णोः परमं पदं |
यो नामकवचं बध्वा विचरेद्विगतज्वरः || 179 ||

भूतभेतालकूष्मांड पिशाचब्रह्मराक्षसाः |
शाकिनीडाकिनीज्येष्ठा सिनी बालग्रहादयः || 180 ||

दुष्टग्रहाश्च नश्यंति यक्षराक्षसपन्नगाः |
ये च संध्याग्रहाः सर्वे चंडालग्रहसंज्ञिकाः || 181 ||

निशाचरग्रहाः सर्वे प्रणश्यंति च दूरतः |
कुक्षिरोगश्च हृद्रोगः शूरापस्मार एव च || 182 ||

एकाहिकं द्व्याहिकं च चातुर्धिकमहाज्वरं |
अथ यो व्याधयश्चैव रोगा रोगाधिदेवताः || 183 ||

शीघ्रं नश्यंति ते सर्वे नृसिंहस्मरणाकुलाः |
राजानो दासतां यांति शत्रवो यांति मित्रतां || 184 ||

जलानि स्थलतां यांति वह्नयो यांति शीततां |
विषान्यमृततां यांति नृसिंहस्मरणात्सुराः || 185 ||

राज्यकामो लभेद्राज्यं धनकामो लभेद्धनं |
विद्याकामो लभेद्विद्यां बद्धो मुच्येत बंधनात् || 186 ||

व्यालव्याघ्रभयं नास्ति चोरसर्पादिकं तथा |
अनुकूला भवेद्भार्या लोकैश्च प्रतिपूज्यते || 187 ||

सुपुत्रां धनधान्यं च पशूंश्च विविधानपि |
एतत्सर्वमवाप्नोति नृसिंहस्य प्रसादतः || 188 ||

जलसंतरणे चैव पर्वतारोहणे तथा |
वनेऽपि विचिरन्मर्त्यो व्याघ्रादि विषमे पथि || 189 ||

बिलप्रवेशे पाताले नारसिंहमनुस्मरेत् |
ब्रह्मघ्नश्च पशुघ्नश्च भ्रूणहा गुरुतल्पकः || 190 ||

मुच्यते सर्वपापेभ्यः कृतघ्न स्त्रीविघातकः |
वेदानां दूषकश्चापि मातापितृ विनिंदकः || 191 ||

असत्यस्तु सदा यज्ञनिंदको लोकनिंदकः |
स्मृत्वा सकृन्नृसिंहं तु मुच्यते सर्वकिल्बषैः || 192 ||

बहुनात्र किमुक्तेन स्मृत्वा तं शुद्धमानसः |
यत्र यत्र चरेन्मर्त्यः नृसिंहस्तत्र गच्छति || 193 ||

गच्छन् तिष्ठन् श्वपन्मर्त्यः जाग्रच्छापि प्रसन्नपि |
नृसिंहेति नृसिंहेति नृसिंहेति सदा स्मरन् || 194 ||

पुमान्नलिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विंदति |
नारी सुभगतावेति सौभाग्यं च सुरूपतां || 195 ||

भर्तुः प्रियत्वं लभते न वैधव्यं च विंदति |
न सपत्नीं च जन्मांते सम्यक् ज्ञानी द्विजो भवेत् || 196 ||

भूमिप्रदक्षिणान्मर्त्यो यत्फलं लभते चिरात् |
तत्फलं लभते नारसिंहमूर्तिप्रदक्षिणात् || 197 ||

मार्कंडेय उवाच –
इत्युक्त्वा देवदेवेशो लक्ष्मीमालिंग्य लीलया |
प्रह्लादस्याभिषेकस्तु ब्रह्मणे चोपदिष्टवान् || 198 ||

श्रीशैलस्य प्रदेशे तु लोकानां हितकाम्यया |
स्वरूपं स्थापयामास प्रकृतिस्थोऽभवत्तदा || 199 ||

ब्रह्मापि दैत्यराजानं प्रह्लादमभिषिच्य च |
दैवतैः सह सुप्रीतो ह्यात्मलोकं ययौ स्वयं || 200 ||

हिरण्यकशिपोर्भीत्या प्रपलाय शचीपतिः |
स्वर्गराज्यपरिभ्रष्टो युगानामेकसप्ततिः || 201 ||

नृसिंहेन हते दैत्ये तथा स्वर्गमवाप सः |
दिक्पालकाश्च संप्राप्तस्त्वं स्वस्थानमनुत्तमं || 202 ||

धर्मे मतिः समस्तानां जनानामभवत्तदा |
एतन्नामसहस्रस्तु ब्रह्मणा निर्मितं पुरा || 203 ||

पुत्रानध्यापयामास सनकादीन्महामुनीन् |
ऊचुस्ते तद्गतः सर्वे लोकानां हितकाम्यया || 204 ||

देवता ऋषयः सिद्धा यक्षविद्याधरोरगाः |
गंधर्वाश्च मनुष्याश्च इहामुत्रफलैषिणः || 205 ||

अस्य स्तोत्रस्य पाठनात्विशुद्ध मनसोभवन् |
सनत्कुमारात्संप्राप्तौ भरद्वाजो मुनिस्तदा || 206 ||

तस्मादांगीरसः प्राप्तस्तस्मात्प्राप्तो महामतिः |
जग्राह भार्गवस्तस्मादग्निमित्राय सोऽब्रवीत् || 207 ||

जैगीषव्याय सप्राह ऋतुकर्णाय संयमी |
विष्णुमित्राय सप्राह सोऽब्रवीच्छ्यवनाय च || 208 ||

तस्मादवाप शांडिल्यो गर्गाय प्राह वै मुनिः |
कृतुंजयाय स प्राह सोऽपि बोधायनाय च || 209 ||

क्रमात्स विष्णवे प्राह स प्राहोद्धामकुक्षये |
सिंह तेजास्तु तस्माच्च शिवप्रियायनै ददौ || 212 ||

उपदिष्टोस्म्यहं तस्मादिदं नामसहस्रकं |
तत्प्रसादादमृत्युर्मे यस्मात्कस्माद्भयं न च || 213 ||

मया च कथितं नारसिंहस्तोत्रमिदं तव |
त्वं हि नित्यं शुचिर्भूत्वा तमाराधय शाश्वतं || 214 ||

सर्वभूताश्रयं देवं नृसिंहं भक्तवत्सलं |
पूजयित्वा स्तवं जप्त्वा हुत्वा निश्चलमानसः || 215 ||

प्राप्यसे महतीं सिद्धिं सर्वांकामान्नरोत्तम |
अयमेव परोधर्मस्त्विदमेव परं तपः || 216 ||

इदमेव परं ज्ञानमिदमेव महद्व्रतं |
अयमेव सदाचारो ह्ययमेव महामखः || 217 ||

इदमेव त्रयो वेदाः शास्त्राण्यागमानि च |
नृसिंहमंत्रादन्यत्र वैदिकस्तु न विद्यते || 218 ||

यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् |
कथितं नारसिंहस्य चरितं पापनाशनं || 219 ||

सर्वमंत्रमयं तापत्रयोपशमनं परं |
सर्वार्थसाधनं दिव्यं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि || 220 ||

ॐ नम इति श्रीनृसिंहपुराणे स्तोत्ररत्नाकरे श्रीनरसिंहप्रादुर्भावे आपदुद्धार घोर वीर लक्ष्मीनृसिंह दिव्य सहस्रनामस्तोत्रमंत्रराजः सर्वार्थसाधनं नाम द्विशततमोध्यायः समाप्तः ||

अर्थ

श्री लक्ष्मीनृसिंह सहस्रनाम स्तोत्र भगवान नृसिंह के हजार दिव्य नामों का स्तुतिगान करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र स्तोत्र है। इस स्तोत्र के दिव्य महामंत्र के ब्रह्मा ऋषि हैं, अनुष्टुप् छंद है, और श्री लक्ष्मीनृसिंह देवता हैं। 'क्ष्रौं' इसका बीज मंत्र है, 'श्रीं' इसकी शक्ति है, और नखदंष्ट्रायुधाय इसका कीलक है। यह माना जाता है कि इस स्तोत्र का जप करने से श्री लक्ष्मीनृसिंह की प्रसन्नता प्राप्त होती है। यह केवल नामों का संग्रह नहीं है, बल्कि भगवान के अनंत गुणों, पराक्रम और करुणा का वर्णन करने वाला एक गहन आध्यात्मिक अनुभव है।

इस स्तोत्र का ध्यान श्लोक भगवान नृसिंह के दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है। वे सत्य, ज्ञान और सुख के स्वरूप हैं, निर्मल हैं, क्षीरसागर के मध्य में स्थित हैं, योगासीन हैं, अत्यंत प्रसन्न मुख वाले हैं, हजारों आभूषणों से उज्ज्वल हैं, तीन नेत्रों वाले हैं, चक्र, पिनाक और अभय मुद्रा धारण किए हुए हाथों वाले हैं, सूर्य के समान तेजस्वी हैं, छत्र के समान फण फैलाए हुए शेषनाग से आच्छादित हैं, और चंद्रमा के समान श्वेत हैं। ऐसे लक्ष्मीनृसिंह का मैं भजन करता हूँ। स्तोत्र के प्रारंभ में ही भगवान के मनमोहक रूप का स्मरण किया जाता है, जो लक्ष्मी देवी के कमल जैसे स्तनों के कुमकुम से अंकित वक्षस्थल वाले, सभी मंगलों के मूर्तिमान स्वरूप, नृसिंहनाथ को नमस्कार करते हैं।

यह स्तोत्र इस बात पर जोर देता है कि हम नृसिंह नामक उस ब्रह्म की उपासना करते हैं जो वेदों का अंतिम लक्ष्य है, संसार के चक्र को तोड़ने का कारण है, और जगद्गुरु है। ब्रह्माजी इस सहस्रनाम को प्रारंभ करते हुए, वज्र जैसे दांतों वाले, वज्र के समान शरीर वाले, वज्र के समान नाखूनों वाले नारसिंह को नमस्कार करते हैं। यह इंगित करता है कि भगवान का प्रत्येक अंग वज्र के समान दृढ़ और शक्तिशाली है। वासुदेव, वंदनीय, वर देने वाले, श्रेष्ठ आत्मा वाले, वरदाभय हस्त वाले, श्रेष्ठ रूप वाले नृसिंह को बार-बार नमस्कार है, ऐसा कहकर भगवान की वरदान देने की शक्ति और उनके परम स्वरूप की स्तुति की जाती है।

यह स्तोत्र प्रह्लाद को वरदान देने वाले, वरेण्य (श्रेष्ठतम), और वरिष्ठ (अत्यंत श्रेष्ठ) लक्ष्मीनृसिंह का महिमामंडन करता है। प्रत्येक नाम भगवान के एक विशेष गुण, लीला या स्वरूप को प्रकट करता है। यह भक्तों को भगवान के साथ गहरा संबंध स्थापित करने, उनके अंतःकरण को शुद्ध करने और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करता है। इस सहस्रनाम का पाठ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है, बल्कि भगवान की दिव्य चेतना का मन में ध्यान करना है।

लाभ (Benefits):

  • शत्रु भय से मुक्ति: लक्ष्मीनृसिंह उग्र रूप वाले हैं, और इस स्तोत्र का पाठ करने से सभी प्रकार के शत्रुओं और बुरी शक्तियों से रक्षा मिलती है। यह बाधाओं को दूर कर जीवन में विजय दिलाता है।
  • धन और समृद्धि: लक्ष्मी देवी के साथ विराजमान नृसिंह की पूजा करने से ऐश्वर्य, समृद्धि और स्थायी धन की प्राप्ति होती है। आर्थिक समस्याएँ दूर होती हैं और सुख-शांति आती है।
  • स्वास्थ्य और दीर्घायु: नियमित रूप से इस स्तोत्र का पाठ करने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। रोगों से मुक्ति मिलती है और दीर्घायु प्राप्त होती है।
  • भय और चिंता का निवारण: भगवान नृसिंह भक्तों के भय को हरने वाले हैं। इस स्तोत्र का पाठ मन की चिंता, भय और अनिश्चितताओं को दूर कर साहस और आत्मविश्वास प्रदान करता है।
  • मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति: यह सहस्रनाम भगवान के परम स्वरूप का वर्णन करता है, इसलिए इसका भक्तिपूर्वक पाठ करने से आध्यात्मिक ज्ञान, वैराग्य और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री लक्ष्मीनृसिंह सहस्रनाम स्तोत्रं क्या है?
यह भगवान लक्ष्मीनृसिंह के एक हजार दिव्य नामों का स्तुतिगान करने वाला एक पवित्र स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान के विभिन्न गुणों, पराक्रमों और लीलाओं का विस्तृत वर्णन करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम स्नान के बाद, शुद्ध मन और भक्ति के साथ किया जा सकता है। नृसिंह जयंती या शनिवार को इसका पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।
श्री लक्ष्मीनृसिंह सहस्रनाम स्तोत्रं पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इसके पाठ से शत्रु भय से मुक्ति, धन और समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, भय व चिंता का निवारण तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह मन को शांति और साहस प्रदान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी भक्त जो अपने जीवन में सुरक्षा, समृद्धि और आध्यात्मिक प्रगति की इच्छा रखता है, वह इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से भय, कर्ज या रोगों से पीड़ित लोगों के लिए यह अत्यधिक लाभदायक है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः, पूरे स्तोत्र का पाठ दिन में एक बार करना उत्तम होता है। विशेष अवसरों पर या किसी विशिष्ट संकल्प के लिए इसे 11, 21 या 108 बार भी पढ़ा जा सकता है। भक्ति ही सबसे महत्वपूर्ण है।
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
इस स्तोत्र का मूल ब्रह्मांड पुराण में माना जाता है। स्तोत्र के प्रारंभिक श्लोक बताते हैं कि ब्रह्माजी ने ही इस सहस्रनाम का प्रारंभ किया था।

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