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श्री लक्ष्मीनृसिंहाष्टकं

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स्तोत्रनरसिंह स्वामी
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श्री लक्ष्मीनृसिंहाष्टकं

यं ध्यायसे स क्व तवास्ति देव
इत्युक्त ऊचे पितरं सशस्त्रं |
प्रह्लाद आस्तेखिलगो हरिः स
लक्ष्मीनृसिंहोऽवतु मां समंतात् || 1 ||

तदा पदाताडयदादिदैत्यः
स्तंभं ततोऽह्नाय घुरूरुशब्दं |
चकार यो लोकभयंकरं स
लक्ष्मीनृसिंहोऽवतु मां समंतात् || 2 ||

स्तंभं विनिर्भिद्य विनिर्गतो यो
भयंकराकार उदस्तमेघः |
जटानिपातैः स च तुंगकर्णो
लक्ष्मीनृसिंहोऽवतु मां समंतात् || 3 ||

पंचाननास्यो मनुजाकृतिर्यो
भयंकरस्तीक्ष्णनखायुधोऽरिं |
धृत्वा निजोर्वोर्विददार सोऽसौ
लक्ष्मीनृसिंहोऽवतु मां समंतात् || 4 ||

वरप्रदोक्तेरविरोधतोऽरिं
जघान भृत्योक्तमृतं हि कुर्वन् |
स्रग्वत्तदंत्रं निदधौ स्वकंठे
लक्ष्मीनृसिंहोऽवतु मां समंतात् || 5 ||

विचित्रदेहोऽपि विचित्रकर्मा
विचित्रशक्तिः स च केसरीह |
पापं च तापं विनिवार्य दुःखं
लक्ष्मीनृसिंहोऽवतु मां समंतात् || 6 ||

प्रह्लादः कृतकृत्योऽभूद्यत्कृपालेशतोऽमराः |
निष्कंटकं स्वधामापुः श्रीनृसिंहः स पातु मां || 7 ||

दंष्ट्राकरालवदनो रिपूणां भयकृद्भयं |
इष्टदो हरति स्वस्य वासुदेवः स पातु मां || 8 ||

इति श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीवासुदेवानंदसरस्वती विरचितं श्री लक्ष्मीनृसिंहाष्टकं |

अर्थ

श्री लक्ष्मीनृसिंहाष्टकं भगवान नृसिंह के अद्भुत लीलाओं और अपने भक्तों के प्रति उनकी अपार करुणा का वर्णन करने वाला एक श्रेष्ठ स्तोत्र है। यह भक्त प्रह्लाद की रक्षा और दुष्ट हिरण्यकशिपु का संहार करने के लिए भगवान विष्णु के नृसिंह रूप में अवतार लेने की पवित्र गाथा को दर्शाता है। इस अष्टकम का पाठ करने से भक्तों को साहस, सुरक्षा और मानसिक शांति प्राप्त होती है, यह हिंदू धर्म में एक दृढ़ विश्वास है। प्रत्येक श्लोक नृसिंह देव की शक्ति, उनके विस्मयकारी रूप और भक्त-वात्सल्य को उजागर करता है।

इस स्तोत्र का गहरा आध्यात्मिक महत्व भगवान की सर्वव्यापकता और भक्तों के प्रति उनके अटूट प्रेम को प्रतिपादित करता है। पहले श्लोक में, जब हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा, "तुम्हारा भगवान कहाँ है?", तो प्रह्लाद ने साहसपूर्वक उत्तर दिया, "हरि हर जगह हैं।" इसी बात को सत्य करने के लिए, भगवान नृसिंह स्तंभ से प्रकट हुए। यह दर्शाता है कि भक्त का विश्वास कितना भी छोटा क्यों न हो, भगवान उसे सच करने के लिए किसी भी रूप में आने को तैयार रहते हैं। नृसिंह देव का उग्र रूप दुष्टों में भय उत्पन्न करता है, लेकिन उनके भक्तों के लिए यह सुरक्षा और आशीर्वाद का प्रतीक है। यह स्तोत्र भक्तों को अपने सभी कष्टों को दूर करने और बाधाओं को पार करने के लिए नृसिंह देव का आश्रय लेने के लिए प्रेरित करता है।

अष्टक का प्रत्येक श्लोक नृसिंह देव की लीलाओं का विस्तार से वर्णन करता है। दूसरा श्लोक हिरण्यकशिपु द्वारा स्तंभ पर प्रहार करने पर उत्पन्न हुई भयानक ध्वनि को याद दिलाता है, जिसने लोकों में भय फैला दिया था। तीसरा श्लोक स्तंभ को चीर कर निकले नृसिंह देव के मेघ के समान रूप, उनकी उठी हुई जटाओं और भयानक नेत्रों का वर्णन करता है। चौथा श्लोक पंचानन मुख और तीक्ष्ण नखों से हिरण्यकशिपु को विदीर्ण करने के दृश्य को चित्रित करता है। पाँचवाँ श्लोक भगवान द्वारा दिए गए वरदान और भक्त के वचन का सम्मान करते हुए, हिरण्यकशिपु की आँतों को माला के रूप में धारण करने का उल्लेख करता है। छठा श्लोक नृसिंह देव के विचित्र रूप, अद्भुत शक्तियों और सिंह स्वरूप का वर्णन करता है, जो पापों और दुःखों को दूर करने की उनकी शक्ति को दर्शाता है। सातवाँ श्लोक बताता है कि उनकी कृपा से प्रह्लाद ने पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया और देवता भयमुक्त हुए। अंत में, आठवाँ श्लोक प्रार्थना करता है कि शत्रुओं के हृदय में भय भरने वाले और भक्तों को मनोवांछित फल देने वाले भगवान नृसिंह हमेशा हमारी रक्षा करें।

यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह विश्वास, साहस और भगवान की अटूट सुरक्षा का प्रतीक है। जैसे प्रह्लाद की अटूट भक्ति ने भगवान को प्रकट किया, वैसे ही इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने वालों पर नृसिंह देव सभी शुभ आशीर्वाद बरसाते हैं। यह जीवन की कठिनाइयों, भयों और बाधाओं से मुक्ति पाने का एक शक्तिशाली साधन है। नृसिंह देव दुष्ट शक्तियों का नाश कर धर्म की स्थापना करने वाले परमात्मा का रूप हैं। इस स्तोत्र का पाठ हमारे मन में भगवान की शक्ति और करुणा के भाव को भरता है, हमें चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • सभी दिशाओं से सुरक्षा: इस अष्टकम का पाठ करने से भगवान नृसिंह अपने भक्तों को सभी दिशाओं से, सभी प्रकार के खतरों से बचाते हैं।
  • भय निवारण और साहस वृद्धि: मन में व्याप्त भय, चिंताओं को दूर करके साहस और आत्मविश्वास बढ़ाता है।
  • पाप निवारण और दुख मुक्ति: भगवान की कृपा से पापों का निवारण होता है और जीवन में आने वाले दुख व कष्ट दूर होते हैं।
  • शत्रु संहार और बाधाओं का निवारण: शत्रुओं से होने वाली परेशानियाँ और जीवन की प्रगति में आने वाली सभी बाधाओं को नृसिंह देव दूर करते हैं।
  • इच्छापूर्ति और आध्यात्मिक उन्नति: भक्तिपूर्वक पाठ करने वालों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और आध्यात्मिक रूप से उन्नति प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री लक्ष्मीनृसिंहाष्टकं क्या है?
यह भगवान नृसिंह देव की स्तुति में आठ श्लोकों का एक पवित्र स्तोत्र है। यह भक्त प्रह्लाद की रक्षा और दुष्ट हिरण्यकशिपु का संहार करने के लिए नृसिंह रूप में अवतरित हुए भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन करता है।
इस अष्टकम का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस अष्टकम का पाठ प्रतिदिन, विशेष रूप से शाम को या नृसिंह देव की पूजा के समय किया जा सकता है। इसे शुद्ध मन से, भक्तिपूर्वक और स्पष्ट उच्चारण के साथ पढ़ना उत्तम होता है।
श्री लक्ष्मीनृसिंहाष्टकं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसका पाठ करने से सभी दिशाओं से सुरक्षा, भय निवारण, साहस की वृद्धि, पापों और दुखों से मुक्ति, शत्रु संहार, बाधाओं का निवारण और मनोकामनाओं की पूर्ति जैसे लाभ प्राप्त होते हैं।
यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए?
जो लोग भय, चिंता, शत्रु बाधा या जीवन में बाधाओं का सामना कर रहे हैं, वे इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। भगवान नृसिंह की सुरक्षा और करुणा चाहने वाला कोई भी भक्त इसका पाठ कर सकता है।
श्री लक्ष्मीनृसिंहाष्टकं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
पाठक की भक्ति और समय के अनुसार इसे प्रतिदिन कम से कम एक बार या 3, 5, 11, 21 या 108 बार पढ़ा जा सकता है। नियमित पाठ से सर्वोत्तम परिणाम मिलते हैं।
इस अष्टकम का मूल या पृष्ठभूमि क्या है?
यह अष्टकम भगवान नृसिंह के प्रसिद्ध अवतार की कथा पर आधारित है, जहाँ वे भक्त प्रह्लाद की रक्षा और दुष्ट हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए एक स्तंभ से प्रकट हुए थे। इसका वैष्णव परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान है।

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