अस्य श्रीनृसिंह द्वादशनामस्तोत्र महामंत्रस्य
वेदव्यासो भगवान् ऋषिः
अनुष्टुप्छंदः
लक्ष्मीनृसिंहो देवता
श्रीनृसिंह प्रीत्यर्थे विनियोगः |
ध्यानं |
स्वभक्त पक्षपातेन तद्विपक्ष विदारणम् |
नृसिंहमद्भुतं वंदे परमानंद विग्रहम् ||
स्तोत्रं |
प्रथमं तु महाज्वालो द्वितीयं तूग्रकेसरी |
तृतीयं वज्रदंष्ट्रश्च चतुर्थं तु विशारदः || 1 ||
पंचमं नारसिंहश्च षष्ठः कश्यपमर्दनः |
सप्तमो यातुहंता च अष्टमो देववल्लभः || 2||
नव प्रह्लादवरदो दशमोऽनंतहस्तकः |
एकादशो महारुद्रो द्वादशो दारुणस्तथा || 3 ||
द्वादशैतानि नामानि नृसिंहस्य महात्मनः |
मंत्रराजेति विख्यातं सर्वपापविनाशनम् || 4 ||
क्षयापस्मारकुष्ठादि तापज्वरनिवारणम् |
राजद्वारे महाघोरे संग्रामे च जलांतरे || 5 ||
गिरिगह्वार आरण्ये व्याघ्रचोरामयादिषु |
रणे च मरणे चैव शमदं परमं शुभम् || 6 ||
शतमावर्तयेद्यस्तु मुच्यते व्याधिबंधनात् |
आवर्तयेत्सहस्रं तु लभते वांछितं फलम् || 7 ||
इति श्री नृसिंह द्वादशनाम स्तोत्रं |
अर्थ
श्री नृसिंह द्वादशनाम स्तोत्रं भगवान नृसिंह के बारह शुभ नामों की स्तुति करने वाला एक शक्तिशाली स्तोत्र है। इस स्तोत्र की रचना महर्षि वेदव्यास भगवान ने की है। यह भक्तों के भय को दूर करने, सुरक्षा और शांति प्रदान करने में अत्यंत सक्षम है। भगवान नृसिंह विष्णु के उग्र अवतार हैं, जिन्होंने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने और दुष्ट हिरण्यकशिपु का संहार करने के लिए अवतार लिया था। ये द्वादशनाम उनके पराक्रम, करुणा और सर्वव्यापकता का बखान करते हैं।
इस स्तोत्र का प्रत्येक नाम भगवान नृसिंह के एक विशिष्ट गुण या कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। इन नामों का भक्तिपूर्वक पाठ करने से भक्त नृसिंह की दिव्य शक्ति के साथ जुड़ जाते हैं। यह केवल नामों का उच्चारण नहीं है, बल्कि भगवान की उपस्थिति, उनकी रक्षात्मक शक्ति को अपने हृदय में आह्वान करने की प्रक्रिया है। यह स्तोत्र भक्तों को किसी भी कठिन परिस्थिति में धैर्य, साहस और विश्वास प्रदान करता है। यह भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति सिखाता है और यह विश्वास दिलाता है कि उनकी कृपा से सभी बाधाओं को दूर किया जा सकता है।
स्तोत्र के पहले तीन नाम 'महाज्वालो', 'उग्रकेसरी' और 'वज्रदंष्ट्रश्च' नृसिंह के उग्र रूप, उनकी अग्निज्वाला के समान तेज, सिंह के समान घनी गर्दन के बाल और वज्र के समान दाँतों का वर्णन करते हैं। 'विशारदः' नामक चौथा नाम उनके ज्ञान और विवेक को इंगित करता है। 'नारसिंहश्च' और 'कश्यपमर्दनः' नाम उनके मानव-सिंह रूप और हिरण्यकशिपु (कश्यप के पुत्र) का वध करने के कार्य का स्मरण कराते हैं। 'यातुहंता च' यह दर्शाता है कि वे दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाले हैं, जबकि 'देववल्लभः' कहते हैं कि वे देवताओं को प्रिय हैं। 'प्रह्लादवरदो' नाम इस बात पर जोर देता है कि वे अपने भक्त प्रह्लाद को वरदान देने वाले करुणामय हैं। 'अनंतहस्तकः', 'महारुद्रो' और 'दारुणस्तथा' नाम उनकी अनंत शक्ति, भयंकर रूप और शत्रुओं को भयभीत करने की क्षमता का वर्णन करते हैं। ये बारह नाम नृसिंह के विभिन्न आयामों का समग्र परिचय देते हैं और उनकी सर्वोच्चता का उद्घोष करते हैं।
ये द्वादश नाम 'मंत्रराज' के नाम से प्रसिद्ध हैं और इनका भक्तिपूर्वक पाठ करने से अपार लाभ प्राप्त होते हैं। इन नामों का पाठ केवल तात्कालिक कष्टों से मुक्ति प्रदान नहीं करता, बल्कि आंतरिक शुद्धि और आध्यात्मिक प्रगति में भी सहायक होता है।
लाभ:
- सर्व पाप विनाश: इस स्तोत्र के निरंतर और भक्तिपूर्ण पाठ से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और भक्त शुद्ध हो जाते हैं। इसमें आत्मा को शुद्ध करने की शक्ति है।
- रोग निवारण: क्षय, अपस्मार, कुष्ठ रोग और विभिन्न प्रकार के ज्वर जैसे भयानक रोगों से मुक्ति मिलती है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है तथा शरीर को रोग प्रतिरोधक क्षमता प्राप्त होती है।
- संकटों से रक्षा: राजद्वार में (न्यायालय में), भयानक युद्धों में, जल में डूबने के खतरे से, पर्वतीय गुफाओं में, जंगल में, बाघों, चोरों और रोगों से उत्पन्न होने वाले सभी प्रकार के खतरों से भगवान नृसिंह भक्तों की रक्षा करते हैं।
- शांति और शुभ: युद्ध के समय या मृत्यु जैसी कठिन परिस्थितियों में इस स्तोत्र का पाठ करने से परम शांति और शुभता प्राप्त होती है। यह मन को धैर्य, साहस और निर्भयता प्रदान करता है।
- बंधनों से मुक्ति: जो व्यक्ति इस स्तोत्र का सौ बार (शतावर्तन) पाठ करता है, वह रोगों, बंधनों और सभी प्रकार की लौकिक परेशानियों से मुक्त हो जाता है। यह बंधनमुक्ति और स्वतंत्रता प्रदान करता है, आंतरिक और बाहरी बाधाओं को दूर करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री नृसिंह द्वादशनाम स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री नृसिंह द्वादशनाम स्तोत्रं का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या रचयिता कौन हैं?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
