श्री अंगारक स्तोत्रं
अंगारकः शक्तिधरो लोहितांगो धरासुतः |
कुमारो मंगलो भौमो महाकायो धनप्रदः || 1 ||
ऋणहर्ता दृष्टिकर्ता रोगकृद्रोगनाशनः |
विद्युत्प्रभो व्रणकरः कामदो धनहृत् कुजः || 2 ||
सामगानप्रियो रक्तवस्त्रो रक्तायतेक्षणः |
लोहितो रक्तवर्णश्च सर्वकर्मावबोधकः || 3 ||
रक्तमाल्यधरो हेमकुंडली ग्रहनायकः |
नामान्येतानि भौमस्य यः पठेत्सततं नरः || 4 ||
ऋणं तस्य च दौर्भाग्यं दारिद्र्यं च विनश्यति |
धनं प्राप्नोति विपुलं स्त्रियं चैव मनोरमाम् || 5 ||
वंशोद्द्योतकरं पुत्रं लभते नात्र संशयः |
योऽर्चयेदह्नि भौमस्य मंगलं बहुपुष्पकैः || 6 ||
सर्वा नश्यति पीडा च तस्य ग्रहकृता ध्रुवम् || 7 ||
इति श्री अंगारक स्तोत्रं
अर्थ
श्री अंगारक स्तोत्रम भगवान अंगारक, जिन्हें मंगल ग्रह के देवता के रूप में पूजा जाता है, को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र स्तोत्र है। वैदिक ज्योतिष में मंगल ग्रह को 'कुज' या 'भौम' भी कहा जाता है और यह साहस, ऊर्जा, इच्छाशक्ति, भूमि और भाई-बहनों का प्रतिनिधित्व करता है। यह स्तोत्र मंगल के नकारात्मक प्रभावों को कम करने और उसके शुभ आशीर्वाद को आकर्षित करने के लिए एक प्रभावी माध्यम माना जाता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तगण अपने जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकते हैं और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण कर सकते हैं।
यह स्तोत्र अंगारक देव के विभिन्न नामों और दिव्य गुणों का विस्तृत वर्णन करता है। प्रथम श्लोक में उन्हें 'शक्तिधर' (शक्ति धारण करने वाला), 'लोहितांग' (लाल रंग के शरीर वाला), 'धरासुत' (पृथ्वी का पुत्र), 'कुमार', 'मंगल', 'भौम' (भूमि से उत्पन्न), 'महाकाय' (विशाल शरीर वाला) और 'धनप्रद' (धन प्रदान करने वाला) कहा गया है। ये नाम उनकी शक्ति, स्वरूप और भक्तों को वरदान देने की क्षमता को दर्शाते हैं। दूसरे श्लोक में, उन्हें 'ऋणहर्ता' (ऋणों को हरने वाला), 'दृष्टिकर्ता' (दृष्टि प्रदान करने वाला या दोषों को दूर करने वाला), 'रोगकृत्' (रोग उत्पन्न करने वाला) और 'रोगनाशन' (रोगों का नाश करने वाला) बताया गया है। यह मंगल के दोहरे स्वभाव को दर्शाता है – यदि अप्रसन्न हो तो रोग और कष्ट दे सकता है, लेकिन प्रसन्न होने पर इन सभी को दूर करता है। 'विद्युत्प्रभो' (बिजली के समान तेजस्वी), 'व्रणकर' (घाव देने वाला), 'कामद' (इच्छाओं को पूर्ण करने वाला) और 'धनहृत्' (धन का हरण करने वाला, अर्थात कमजोर मंगल धन हानि का कारण बन सकता है) जैसे विशेषण मंगल के प्रभाव के विभिन्न पहलुओं को उजागर करते हैं।
तीसरे और चौथे श्लोक में अंगारक के शारीरिक लक्षणों और प्रिय वस्तुओं का वर्णन किया गया है। उन्हें 'सामगानप्रियो' (सामवेद के गानों को पसंद करने वाला), 'रक्तवस्त्रो' (लाल वस्त्र धारण करने वाला), 'रक्तायतेक्षणः' (लाल और लंबी आँखों वाला), 'लोहितो' (लाल), 'रक्तवर्णश्च' (लाल रंग का), 'सर्वकर्भावबोधकः' (सभी कार्यों का ज्ञान रखने वाला) और 'रक्तमाल्यधरो' (लाल फूलों की माला धारण करने वाला) बताया गया है। ये सभी मंगल ग्रह के लाल रंग से उनके संबंध को दर्शाते हैं। 'हेमकुण्डली' (सोने के कुंडल धारण करने वाला) और 'ग्रहनायकः' (ग्रहों का स्वामी) जैसे विशेषण उनकी महिमा और ग्रहों में उनकी प्रधानता को प्रकट करते हैं। स्तोत्र के अंतिम भाग में कहा गया है कि जो मनुष्य इन नामों का निरंतर पाठ करता है, उसे मंगल का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
लाभ (Benefits):
- ऋण मुक्ति: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से व्यक्ति को ऋणों से मुक्ति मिलती है और आर्थिक संकट दूर होते हैं।
- स्वास्थ्य लाभ: अंगारक देव की कृपा से रोग, चोट और शारीरिक कष्टों का निवारण होता है, जिससे उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
- धन और समृद्धि: यह स्तोत्र भक्तों को अपार धन, समृद्धि और भौतिक सुख प्रदान करता है, जिससे जीवन में खुशहाली आती है।
- सुंदर जीवनसाथी और संतान प्राप्ति: स्तोत्र के पाठ से मनोरम पत्नी (या पति) और वंश को प्रकाशित करने वाले पुत्र की प्राप्ति होती है, ऐसा विश्वास है।
- ग्रह दोष निवारण: मंगलवार के दिन अंगारक देव की लाल फूलों से पूजा करने और स्तोत्र का पाठ करने से मंगल ग्रह से उत्पन्न सभी प्रकार के कष्ट और दोष निश्चित रूप से दूर होते हैं।
- साहस और आत्मविश्वास: मंगल ग्रह साहस और ऊर्जा का प्रतीक है, इसलिए इस स्तोत्र के पाठ से आत्मविश्वास बढ़ता है और व्यक्ति चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री अंगारक स्तोत्रं क्या है?
श्री अंगारक स्तोत्रं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री अंगारक स्तोत्रं के पाठ के मुख्य लाभ क्या हैं?
किसे श्री अंगारक स्तोत्रं का पाठ करना चाहिए?
श्री अंगारक स्तोत्रं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या स्रोत क्या है?
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