शि

श्री शिव स्तोत्रं (असित कृतं)

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रशिव
0 व्यूज़

श्री शिव स्तोत्रं (असित कृतं)

असित उवाच –
जगद्गुरो नमस्तुभ्यं शिवाय शिवदाय च |
योगींद्राणां च योगींद्र गुरूणां गुरवे नमः || 1 ||

मृत्योर्मृत्युस्वरूपेण मृत्युसंसारखंडन |
मृत्योरीश मृत्युबीज मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 2 ||

कालरूपः कलयतां कालकालेश कारण |
कालादतीत कालस्थ कालकाल नमोऽस्तु ते || 3 ||

गुणातीत गुणाधार गुणबीज गुणात्मक |
गुणीश गुणिनां बीज गुणिनां गुरवे नमः || 4 ||

ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मज्ञ ब्रह्मभावनतत्परः |
ब्रह्मबीजस्वरूपेण ब्रह्मबीज नमोऽस्तु ते || 5 ||

इति स्तुत्वा शिवं नत्वा पुरस्तस्थौ मुनीश्वरः |
दीनवत्साऽश्रुनेत्रश्च पुलकांचितविग्रहः || 6 ||

असितेन कृतं स्तोत्रं भक्तियुक्तश्च यः पठेत् |
वर्षमेकं हविष्याशी शंकरस्य महात्मनः || 7 ||

स लभेद्वैष्णवं पुत्रं ज्ञानिनं चिरजीविनं |
भवेद्धनाढ्योऽदुःखी च मूको भवति पंडितः || 8 ||

अभार्यो लभते भार्यां सुशीलां च पतिव्रतां |
इह लोके सुखं भुक्त्वा यात्यंते शिवसन्निधिं || 9 ||

इदं स्तोत्रं पुरा दत्तं ब्रह्मणा च प्रचेतसे |
प्रचेतसा स्वपुत्रायासिताय दत्तमुत्तमं || 10 ||

इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्रीकृष्णजन्मखंडे असितकृत शिवस्तोत्रं |

अर्थ

श्री शिव स्तोत्रं (असित कृतं) महर्षि असित द्वारा भगवान शिव की स्तुति में रचा गया एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र ब्रह्माजी द्वारा प्रचेतस को और प्रचेतस द्वारा अपने पुत्र असित को प्रदान किया गया था। इसमें असित मुनि ने भगवान शिव को जगद्गुरु, योगियों के गुरु और काल से परे तत्व के रूप में महिमामंडित किया है, जो भक्तों को शिव की महिमा का अनुभव कराता है।

इस स्तोत्र में, मुनिवर असित परम शिव को जगद्गुरु, योगेश्वरों के भी योगेश्वर, और गुरुओं के गुरु के रूप में वर्णित करते हुए भक्ति, ज्ञान और कृतज्ञता के साथ उनकी स्तुति करते हैं। वे शिव को शुभदाता, शांति से परिपूर्ण और सृष्टि-स्थिति-लय के आंतरिक शक्ति के रूप में नमन करते हैं। शिव को 'मृत्योर्मृत्यु' — मृत्यु का भी मृत्यु कहा गया है। संसार के बंधनों को तोड़ने वाली महाशक्ति उन्हीं की है। वे मृत्यु के बीज को नष्ट करने वाले मृत्युंजय स्वरूप हैं, और असित उन्हें नमन करते हैं। यह श्लोक मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाने वाले शिव के महत्व को दर्शाता है।

इसके बाद, असित शिव को काल के भी काल, काल के कर्ता और काल के पालक के रूप में वर्णित करते हैं। काल से भी अतीत, शाश्वत तत्व शिव ही हैं। असित कहते हैं कि शिव ही काल को नियंत्रित करते हैं और काल के सभी बंधनों से परे हैं। शिव गुणातीत होते हुए भी गुणों के आधार हैं। गुणों से ही संसार उत्पन्न होता है, लेकिन गुणों से परे स्थित तत्व शिव तत्व ही है। गुणवानों के भी गुरु परमेश्वर शिव ज्ञान के मूल तत्व हैं और सभी के लिए आंतरिक ज्योति के समान प्रकाशित होते हैं।

असित भक्तिपूर्वक ब्रह्मास्वरूप शिव की स्तुति करते हैं, जो ब्रह्मज्ञानी हैं और ब्रह्म तत्व में नित्य स्थित रहते हैं। वे ब्रह्मबीज, सृष्टि के मूल कारण और परब्रह्म स्वरूप शिव को नमन करते हुए उनकी शरण ग्रहण करते हैं। अगले श्लोक में, असित ध्यानमग्न होकर, अश्रुपूर्ण नेत्रों और रोमांच से भरे शरीर के साथ शिव के सम्मुख खड़े होते हैं — यह उनकी गहरी भक्ति को दर्शाता है। यह स्तोत्र केवल स्तुति नहीं, बल्कि भक्त के आंतरिक अनुभव का भी प्रतिबिंब है।

फलश्रुति में कहा गया है कि जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक और हविष्य का सेवन करते हुए (सत्यशुद्धि से) एक वर्ष तक इस स्तोत्र का जाप करता है, उसे अनेक वरदान प्राप्त होते हैं। इनमें वैष्णव स्वरूप, ज्ञानी पुत्र, दीर्घायु, धनवान होना, दुःखरहित जीवन, मूर्ख व्यक्ति का भी पंडित बन जाना और अविवाहित को सुशील एवं पतिव्रता पत्नी का मिलना शामिल है। ये सभी शिव कृपा के फल हैं, जो न केवल सांसारिक सुख प्रदान करते हैं, बल्कि अंततः मोक्ष और शिव सायुज्य की ओर ले जाते हैं।

लाभ (Benefits):

  • मृत्युभय और संसार बंधन से मुक्ति: इस स्तोत्र के पाठ से मृत्युंजय शिव की कृपा प्राप्त होती है, जिससे मृत्यु का भय समाप्त होता है और संसार के बंधनों से मुक्ति मिलती है।
  • ज्ञान और शांति की प्राप्ति: चूंकि शिव ज्ञान के स्रोत और योगियों के गुरु हैं, उनकी स्तुति से आंतरिक ज्ञान, मन की शांति और धैर्य में वृद्धि होती है।
  • सद्गुणी संतान और दीर्घायु: भक्तिपूर्वक पाठ करने वाले को ज्ञानी और सद्गुणी पुत्र की प्राप्ति होती है, साथ ही दीर्घायु का वरदान भी मिलता है।
  • धन-संपत्ति और दुःख निवारण: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से आर्थिक समृद्धि आती है, सभी प्रकार के दुःख दूर होते हैं और जीवन में सुख-सौभाग्य प्राप्त होता है।
  • मोक्ष और शिव सान्निध्य: यह स्तोत्र भक्तों को इस लोक में सुख प्रदान करता है और अंततः परमपद, यानी भगवान शिव के सान्निध्य और मोक्ष की ओर अग्रसर करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री शिव स्तोत्रं (असित कृतं) क्या है?
यह महर्षि असित द्वारा भगवान शिव की स्तुति में रचा गया एक पवित्र स्तोत्र है। इसमें शिव को जगद्गुरु, मृत्युंजय, काल से परे और परब्रह्म स्वरूप में महिमामंडित किया गया है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन, विशेष रूप से सोमवार या शिवरात्रि जैसे शिव पर्वों पर, भक्ति और शुद्ध मन से करना चाहिए। फलश्रुति के अनुसार, एक वर्ष तक हविष्य का सेवन करते हुए (शुद्ध आहार) पाठ करना श्रेष्ठ है।
श्री शिव स्तोत्रं का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इसके पाठ से मृत्युभय से मुक्ति, संसार बंधन का नाश, ज्ञान, धन, दीर्घायु, सद्गुणी पुत्र की प्राप्ति और अंततः मोक्ष मिलता है। यह सभी प्रकार के दुखों का निवारण भी करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी भक्त जो मृत्युभय से मुक्ति, मानसिक शांति, ज्ञान, पारिवारिक सुख और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करना चाहता है, वह इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
प्रतिदिन कम से कम एक बार पाठ करना शुभ माना जाता है। फलश्रुति में एक वर्ष के निरंतर पाठ का महत्व बताया गया है, जो विशेष फल प्रदान करता है।
इस स्तोत्र का उद्गम क्या है?
शास्त्रों के अनुसार, यह स्तोत्र ब्रह्माजी द्वारा प्रचेतस को और प्रचेतस द्वारा अपने पुत्र महर्षि असित को प्रदान किया गया था।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...