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श्री महाविष्णु स्तोत्रं (गरुडगमन तव)

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स्तोत्रश्री महाविष्णु
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श्री महाविष्णु स्तोत्रं (गरुडगमन तव)

गरुडगमन तव चरणकमलमिह मनसि लसतु मम नित्यं |
मम तापमपाकुरु देव, मम पापमपाकुरु देव ||

जलजनयन विधिनमुचिहरणमुख विबुधविनुतपदपद्म |
मम तापमपाकुरु देव, मम पापमपाकुरु देव || 1 ||

भुजगशयन भव मदनजनक मम जननमरणभयहारि |
मम तापमपाकुरु देव, मम पापमपाकुरु देव || 2 ||

शंखचक्रधर दुष्टदैत्यहर सर्वलोकशरण |
मम तापमपाकुरु देव, मम पापमपाकुरु देव || 3 ||

अगणितगुणगण अशरणशरणद विदळितसुररिपुजाल |
मम तापमपाकुरु देव, मम पापमपाकुरु देव || 4 ||

भक्तवर्यमिह भूरिकरुणया पाहि भारतीतीर्थं |
मम तापमपाकुरु देव, मम पापमपाकुरु देव || 5 ||

इति जगद्गुरु श्रीभारतीतीर्थस्वामिना विरचितं श्रीमहाविष्णु स्तोत्रं ||

अर्थ

श्री महाविष्णु स्तोत्रं (गरुडगमन तव) जगद्गुरु श्री भारतीतीर्थ महास्वामीजी द्वारा रचित भगवान महाविष्णु को समर्पित एक अत्यंत हृदयस्पर्शी और भक्तिपूर्ण प्रार्थना है। इस स्तोत्र में भक्त बार-बार भगवान से प्रार्थना करता है: "हे प्रभु, मेरे दुखों को दूर करो, मेरे पापों को दूर करो।" यह केवल श्लोकों का संग्रह नहीं, बल्कि भक्त के हृदय से निकलने वाली एक तीव्र पुकार है जो परमात्मा के चरणों में पूर्ण समर्पण को दर्शाती है और उनकी अनंत महिमा का बखान करती है।

यह स्तोत्र भगवान की महिमा का वर्णन करते हुए प्रारंभ होता है, जो गरुड़ पर विराजमान हैं और जिनके कमल चरण भक्तों के हृदय में शाश्वत रूप से निवास करते हैं। भगवान विष्णु ब्रह्मा, शिव और सभी देवताओं द्वारा पूजित हैं; वे ब्रह्मांड के सृष्टिकर्ता और पाप तथा पीड़ा के विनाशक हैं। वे जो आदिशेष पर विश्राम करते हैं, प्रेम और करुणा के स्रोत हैं, तथा जन्म और मृत्यु के भय को दूर करते हैं। 'जलजनयन विधिनमुचिहरणमुख विबुधविनुतपदपद्म' यह श्लोकांश उनके कमल नयन, ब्रह्मादि देवताओं द्वारा पूजित उनके चरणों और नमुचि जैसे असुरों का संहार करने की उनकी शक्ति को दर्शाता है।

स्तोत्र के प्रत्येक पद में "मम तापमपाकुरु देव, मम पापमपाकुरु देव" (हे देव, मेरे संतापों को दूर करो, मेरे पापों को दूर करो) की भक्त की मार्मिक विनती दोहराई जाती है। यह भक्त की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पीड़ाओं (तापों) के साथ-साथ संचित और प्रारब्ध पापों को दूर करने के लिए भगवान से निरंतर प्रार्थना है। 'भुजगशयन भव मदनजनक मम जननमरणभयहरि' यह पंक्ति बताती है कि भगवान आदिशेष पर शयन करते हैं, वे कामदेव के जनक हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र के भय को हरने वाले हैं। शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान दुष्ट दैत्यों का संहार कर लोकों की रक्षा करते हैं। वे असंख्य सद्गुणों के सागर हैं, असहायों के शरणदाता हैं और देवताओं के सभी शत्रुओं का नाश करने वाले हैं।

अंत में, इस स्तोत्र के रचयिता, जगद्गुरु श्री भारतीतीर्थ महास्वामीजी, स्वयं को "भारतीतीर्थ" संबोधित करते हुए, असीम करुणा के साथ अपनी रक्षा के लिए भगवान से विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करते हैं। इस प्रकार, यह स्तोत्र क्षमा, आरोग्य, आंतरिक शांति और दिव्य आश्रय के लिए एक शक्तिशाली निवेदन बन जाता है। इसका पाठ करने से भक्तों को अपने जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए आध्यात्मिक शक्ति और स्पष्टता प्राप्त होती है। यह भगवान की कृपा प्राप्त करने का एक सरल और प्रभावी मार्ग है।

लाभ (Benefits):

  • मानसिक शांति और दुख-निवारण: इस स्तोत्र के निरंतर पाठ से मन के संताप, चिंताएं और भय दूर होते हैं, जिससे आंतरिक शांति प्राप्त होती है। यह मानसिक तनाव को कम करने में सहायक है।
  • पाप-निवारण और शुद्धि: "मम पापमपाकुरु देव" की प्रार्थना भक्त के संचित और प्रारब्ध पापों को हरती है और शरीर तथा मन को शुद्ध करती है, जिससे आत्मिक उन्नति होती है।
  • दिव्य सुरक्षा और साहस: भगवान विष्णु के शंख, चक्र, गदाधारी स्वरूप का स्मरण करने से दुष्ट शक्तियों से सुरक्षा मिलती है और जीवन की कठिनाइयों का सामना करने का साहस प्राप्त होता है। वे सभी लोकों के शरणदाता हैं।
  • आध्यात्मिक शक्ति और भक्ति वृद्धि: भगवान की महिमा का स्मरण करने से भक्ति बढ़ती है और आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने तथा जीवन की चुनौतियों का सामना करने की आंतरिक शक्ति मिलती है।
  • जन्म-मृत्यु भय का निवारण: भगवान विष्णु जन्म-मृत्यु के चक्र के भय को दूर करने वाले हैं, अतः यह स्तोत्र मोक्ष के मार्ग पर मार्गदर्शन प्रदान करता है और शाश्वत आनंद की प्राप्ति में सहायक होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह श्री महाविष्णु स्तोत्रं (गरुडगमन तव) क्या है?
यह श्री महाविष्णु स्तोत्रं (गरुडगमन तव) जगद्गुरु श्री भारतीतीर्थ महास्वामीजी द्वारा रचित भगवान महाविष्णु को समर्पित एक भक्तिपूर्ण प्रार्थना है। इसमें भक्त अपने दुखों और पापों को दूर करने के लिए भगवान से प्रार्थना करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम स्नान के बाद, स्वच्छ और शांत मन से करना चाहिए। भगवान के प्रति पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ पाठ करना सर्वोत्तम फल देता है।
इस स्तोत्र का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से मानसिक संताप, चिंताएं और भय कम होते हैं। पापों का निवारण होता है, शरीर और मन शुद्ध होते हैं, तथा दिव्य सुरक्षा, साहस और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान महाविष्णु में श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से दुख, पाप और भय से मुक्ति चाहने वाले इसका पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कम से कम दिन में एक बार या 3, 11, 21, 108 बार (अपनी क्षमता और समय के अनुसार) किया जा सकता है। निरंतर पाठ से अधिक लाभ प्राप्त होते हैं।
इस स्तोत्र का मूल या स्रोत क्या है?
यह श्री महाविष्णु स्तोत्रं (गरुडगमन तव) श्रृंगेरी शारदा पीठ के 35वें पीठाधीश्वर और जगद्गुरु श्री भारतीतीर्थ महास्वामीजी द्वारा रचा गया है।

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